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पटना। युवाओं और छात्रों को अपना "जिगर का टुकड़ा" कहने वाले पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा ने 1967 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजधानी पटना की जिस हाई-प्रोफाइल सीट (तत्कालीन पटना पश्चिम और वर्तमान बांकीपुर) से जीत दर्ज कर सत्ता परिवर्तन की ऐतिहासिक नींव रखी थी अब वही बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र नीट पेपर लीक विरोधी छात्र आंदोलन के बाद 30 जुलाई को होने वाले उपचुनाव के कारण एक बार फिर राजनीति के केंद्र में है जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तीन दशक पुराने गढ़ को बचाने, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की पहली चुनावी अग्निपरीक्षा और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। बांकीपुर का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां युवाओं की भूमिका कई अवसरों पर महत्वपूर्ण रही है। महामाया प्रसाद सिन्हा युवाओं और छात्रों के बीच लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते थे। वर्ष 1967 के चुनाव में पटना पश्चिम विधानसभा सीट से उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री के.बी. सहाय को हराकर सबको चौंका दिया था। यह वही चुनाव था, जिसने बिहार के सत्ता समीकरण को बदल दिया था। वे बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। लगभग छह दशक बाद एक बार फिर युवा, शिक्षा, रोजगार और पारदर्शिता जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में हैं। नीट पेपर लीक जैसे घटनाक्रमों के बाद छात्रों और युवाओं के बीच इन विषयों पर चर्चा तेज हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 30 जुलाई का जनादेश यह संकेत दे सकता है कि पारंपरिक जातीय समीकरणों के साथ-साथ युवा मतदाताओं के मुद्दों का चुनावी व्यवहार पर कितना प्रभाव पड़ता है। बिहार की राजनीति में बांकीपुर क्यों है खास अगर बिहार के चुनावी इतिहास के सबसे अहम मोड़ों की सूची बनाई जाए तो बांकीपुर का नाम सबसे ऊपर दिखाई देगा।आजादी के बाद यहां लंबे समय तक कांग्रेस का दबदबा रहा। साल 1957 में रामसरन साहू कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने जबकि 1962 में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन, 1967 में इस सीट ने ऐसा फैसला दिया, जिसने बिहार की राजनीति का चेहरा बदल दिया। जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा ने कृष्ण बल्लभ सहाय को हराया और पहली बार राज्य में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। श्री महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। राजनीतिक विश्लेषक आज भी मानते हैं कि बिहार में सत्ता परिवर्तन की पहली बड़ी कहानी बांकीपुर से ही शुरू हुई थी। इसके बाद भी इस सीट ने कई राजनीतिक रंग देखे। 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के ए.के. सेन , 1972 में भाकपा के ही सुनील मुखर्जी , 1977 में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद , 1980 में इंदिरा कांग्रेस के रंजीत सिन्हा जबकि 1985 और 1990 में निर्दलीय रामानंद यादव यहां से विधायक बने। फिर आया भाजपा का दौर बांकीपुर की राजनीति ने दूसरी बड़ी करवट वर्ष 1995 में ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने 1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 के चुनाव लगातार जीतकर तत्कालीन पटना पश्चिम सीट को भाजपा का अभेद्य किला बना दिया। व्यापारी वर्ग, शिक्षित मध्यम वर्ग और पारंपरिक भाजपा समर्थकों के बीच उन्होंने मजबूत जनाधार तैयार किया। श्री सिन्हा के निधन के बाद वर्ष 2006 के उपचुनाव में उनके बेटे नितिन नवीन पहली बार भाजपा के टिकट से ही चुनाव लड़े और जीत गए। 2008 के परिसीमन के बाद पटना पश्चिम का नाम बदलकर बांकीपुर हो गया। इसके बाद नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2020 और 2025 में लगातार जीत दर्ज कर भाजपा की पकड़ और मजबूत कर दी। अब उनके राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट खाली हुई है। इसलिए, भाजपा के सामने सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं बल्कि लगभग 30 साल पुराने अपने गढ़ को बचाने की चुनौती है। भाजपा की रणनीति बीच रास्ते में बदल गई भाजपा ने इस उपचुनाव के लिए पहले अभिषेक कुमार सिन्हा (बंटी) को उम्मीदवार बनाया। उन्होंने नामांकन भी दाखिल किया लेकिन अगले ही दिन पारिवारिक कारणों का हवाला देकर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया और नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद पार्टी ने नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया। श्री सिन्हा का कहना है कि भाजपा में एक सामान्य कार्यकर्ता भी मेहनत और समर्पण के दम पर उम्मीदवार बन सकता है। उनका दावा है कि जनता विकास और सुशासन के पक्ष में मतदान करेगी और भाजपा-राजग उम्मीदवार को विजयी बनाएगी। क्या रणनीतिकार पहली बार इतिहास बदल पाएंगे इस चुनाव का सबसे बड़ा आकर्षण प्रशांत किशोर हैं। देशभर में कई बड़े नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने वाले प्रशांत किशोर पहली बार खुद चुनाव लड़ रहे हैं। जन सुराज यात्रा के दौरान उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भ्रष्टाचार और बेहतर शासन को अपना मुख्य एजेंडा बनाया। अब बांकीपुर से चुनाव लड़कर वह यह साबित करना चाहते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों को चुनाव जिता सकता है, वह खुद भी जनता का भरोसा जीत सकता है। अगर वह जीतते हैं तो यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं होगी बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए विकल्प के उभरने का संकेत भी माना जाएगा। राजद भी तलाश रहा नई जमीन इस उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल ने रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। राजद का दावा है कि बांकीपुर की जनता बदलाव चाहती है। पार्टी महंगाई, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी को बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है और मानती है कि इस बार भाजपा को कड़ी चुनौती मिलेगी। तेज प्रताप के समर्थन से बदला समीकरण जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) ने पहले वीणा मानवी को उम्मीदवार बनाया था लेकिन उनका नामांकन रद्द हो गया। इसके बाद पार्टी प्रमुख तेज प्रताप यादव ने प्रशांत किशोर का खुलकर समर्थन कर दिया। इससे चुनावी मुकाबले को नया राजनीतिक आयाम मिला। 25 उम्मीदवार, लेकिन लड़ाई तीन की चुनाव मैदान में 25 उम्मीदवार हैं लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा, जन सुराज और राजद के बीच माना जा रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी ( रालोजपा) ने तनवीर आलम को उम्मीदवार बनाया है। भले संगठनात्मक आधार सीमित हो लेकिन उनके चुनाव मैदान में रहने से कुछ वर्गों के वोट प्रभावित हो सकते हैं। जाति से आगे बढ़ चुका है बांकीपुर बांकीपुर को कायस्थ बहुल सीट माना जाता है। यहां वैश्य, भूमिहार, ब्राह्मण, यादव, मुस्लिम, दलित, अतिपिछड़ा और अन्य समुदायों के मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं। लेकिन, राजधानी का इलाका होने के कारण यहां सिर्फ जातीय समीकरण नहीं चलते। सड़क, ट्रैफिक जाम, जल निकासी, पार्किंग, पेयजल, सीवर, स्वच्छता, कानून-व्यवस्था, व्यापारिक सुविधाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित करते हैं। सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, शिक्षक, डॉक्टर, वकील, छात्र और पेशेवर वर्ग की बड़ी मौजूदगी के कारण यहां उम्मीदवार की विश्वसनीयता और विकास का रिकॉर्ड भी अहम माना जाता है। बारिश में धुल जाते हैं विकास के दावे बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के विकास पर गौर करें तो मंदिरी नाला जैसी बड़ी परियोजनाओं के बावजूद बारिश होते ही बांकीपुर में विकास के दावों की परीक्षा शुरू हो जाती है। जलजमाव, नालों के ओवरफ्लो और सड़कों पर गंदा पानी आज भी आम समस्या है। वर्ष 2025 में भी तेज बारिश के बाद शहर के कई हिस्सों में जनजीवन प्रभावित हुआ। इससे साफ है कि बड़ी परियोजनाओं के बावजूद छोटी नालियों, सीवर और सफाई व्यवस्था की कमजोर कड़ी अब भी चुनौती बनी हुई है। जाम से नहीं मिली आजादी पटना जंक्शन, गांधी मैदान, डाकबंगला, एग्जीबिशन रोड, अशोक राजपथ और पीएमसीएच जैसे इलाके आज भी भारी ट्रैफिक दबाव झेल रहे हैं। पार्किंग की कमी, अतिक्रमण और ई-रिक्शा-ऑटो की अव्यवस्थित आवाजाही के कारण नई सड़कें और फ्लाईओवर भी लोगों को जाम से पूरी राहत नहीं दिला सके हैं। प्रदूषण भी बना बड़ी चुनौती घनी आबादी, लगातार निर्माण कार्य, ट्रैफिक जाम, डीजल वाहन और उड़ती धूल के कारण बांकीपुर वायु और ध्वनि प्रदूषण की समस्या से भी जूझ रहा है। भले ही विधानसभा स्तर के अलग आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन हालात बताते हैं कि इस मोर्चे पर अभी लंबा सफर तय करना बाकी है। पैदल चलना अब भी मुश्किल स्मार्ट सिटी के तहत कुछ प्रमुख सड़कों पर फुटपाथ बने हैं लेकिन अधिकांश बाजारों और अंदरूनी इलाकों में पैदल यात्रियों को आज भी सड़क पर चलना पड़ता है। अतिक्रमण और साइकिल ट्रैक का अभाव इस समस्या को और बढ़ाता है। मुख्य सड़कें चमकीं, मुहल्ले अब भी इंतजार में मुख्य सड़कें और प्रमुख इलाके जरूर बदले हैं लेकिन अंदरूनी मुहल्लों में टूटी सड़कें, जर्जर नालियां, सीवर ओवरफ्लो और कचरे की समस्या अब भी बनी हुई है। इससे साफ है कि विकास का लाभ अभी सभी वार्डों और बस्तियों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है। क्या बांकीपुर फिर इतिहास रचेगा 1967 में बांकीपुर ने बिहार की सत्ता की दिशा बदल दी थी। आज, लगभग छह दशक बाद यह सीट फिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां इसका फैसला सिर्फ एक विधायक का भविष्य तय नहीं करेगा। 30 जुलाई का जनादेश बताएगा कि क्या भाजपा अपना तीन दशक पुराना किला बचा पाएगी, क्या राजद राजधानी में नई जमीन बना पाएगा और क्या प्रशांत किशोर अपनी पहली चुनावी परीक्षा पास कर बिहार की राजनीति का नया अध्याय लिख पाएंगे। बांकीपुर का इतिहास गवाह है—यह सीट कई बार सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा तय करती रही है। अब देखना है कि इस बार मतदाता कौन-सी नई कहानी लिखते हैं।



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