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(सिविल सर्विसेज अभ्यर्थियों के लिए विशेष) नई दिल्ली। भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई रणनीतिक ऊंचाई देते हुए साझेदारी को ‘समग्र रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा देने, वर्ष 2030 तक व्यापार को मौजूदा एक अरब डॉलर से बढ़ाकर पांच अरब डॉलर करने और रक्षा, डिजिटल भुगतान, महत्वपूर्ण खनिज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वच्छ ऊर्जा तथा शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव के बीच ताशकंद में हुई वार्ता के बाद दोनों देशों ने 11 समझौतों और समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए। यह पहल भारत की मध्य एशिया नीति, क्षेत्रीय संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। 15 साल की रणनीतिक साझेदारी अब नए चरण में भारत और उज्बेकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी के 15 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दोनों देशों ने संबंधों को समग्र रणनीतिक साझेदारी में बदलने का निर्णय लिया। इसका अर्थ है कि अब संबंध केवल व्यापार या राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सुरक्षा, रक्षा उत्पादन, नई तकनीक, ऊर्जा, शिक्षा, संस्कृति और जन-संपर्क जैसे क्षेत्रों को भी एक साथ आगे बढ़ाया जाएगा।प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान की अपनी चौथी यात्रा को दोनों देशों के बीच बढ़ती निकटता, विश्वास और निरंतर संवाद का प्रमाण बताया। 2030 तक पांच अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य भारत और उज्बेकिस्तान का द्विपक्षीय व्यापार एक अरब डॉलर का स्तर पार कर चुका है। अब दोनों देशों ने इसे वर्ष 2030 तक पांच अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रमुख रूप से इन क्षेत्रों पर काम होगा— बाजार तक आसान पहुंच परिवहन और संपर्क मार्गों का विस्तार बैंकिंग सहयोग भुगतान व्यवस्था का सरलीकरण व्यापारिक बाधाओं में कमी निजी क्षेत्र और निवेशकों की भागीदारी यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी है क्योंकि मध्य एशिया तक भारत की सीधी स्थलीय पहुंच नहीं है इसलिए संपर्क व्यवस्था और भुगतान प्रणाली को मजबूत करना इस साझेदारी की सफलता की मुख्य शर्त होगी। उज्बेकिस्तान में यूपीआई से भुगतान होगा आसान भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया गया है। एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड और उज्बेकिस्तान के नेशनल इंटरबैंक प्रोसेसिंग सेंटर के बीच हुए समझौते के तहत भारतीय यूपीआई एप से उज्बेकिस्तान के राष्ट्रीय क्यूआर कोड को स्कैन कर व्यापारिक भुगतान किया जा सकेगा। इससे भारतीय पर्यटकों, छात्रों और व्यापारियों को भुगतान में सुविधा होगी। साथ ही यह भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने की नीति को भी मजबूती देगा। महत्वपूर्ण खनिज से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तक सहयोग दोनों देशों ने भविष्य की अर्थव्यवस्था से जुड़े कई रणनीतिक क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई है। इनमें शामिल हैं— डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा कृत्रिम बुद्धिमत्ता महत्वपूर्ण खनिज स्वच्छ ऊर्जा अंतरिक्ष परमाणु ऊर्जा बुनियादी ढांचा विकास महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग भारत के लिए विशेष रूप से अहम है क्योंकि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, बैटरी और रक्षा उत्पादन में इनकी बड़ी भूमिका है। उज्बेकिस्तान प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है इसलिए यह सहयोग भारत की आपूर्ति शृंखला को विविध बनाने और कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है। 11 क्षेत्रों में समझौते, साझेदारी का दायरा व्यापक दोनों देशों ने जिन 11 क्षेत्रों में समझौते किए हैं, वे द्विपक्षीय संबंधों की व्यापकता दिखाते हैं— 1. सांस्कृतिक आदान-प्रदान 2. प्राचीन बौद्ध स्थलों का संरक्षण 3. अभिलेखीय सहयोग 4. आयुर्वेद 5. भूविज्ञान और खनिज संसाधन 6. पर्यटन 7. राजनयिक प्रशिक्षण 8. आर्थिक और वित्तीय संवाद 9. पर्यावरण संरक्षण 10. उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान 11. गुजरात और समरकंद क्षेत्र के बीच साझेदारी इन समझौतों से केंद्र सरकारों के साथ-साथ राज्यों, शहरों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के बीच भी संपर्क बढ़ेगा। रक्षा सहयोग में सह-उत्पादन और सह-विकास भारत और उज्बेकिस्तान ने रक्षा उद्योगों के बीच सीधे संपर्क, रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन और सह-विकास को बढ़ावा देने पर सहमति जताई है। यह सहयोग भारत की रक्षा निर्यात नीति और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन के लक्ष्य से जुड़ा है। उज्बेकिस्तान के लिए भारतीय रक्षा तकनीक, प्रशिक्षण और उपकरण उपयोगी हो सकते हैं जबकि भारत को मध्य एशिया में भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार मिलेगा। आतंकवाद पर साझा ‘शून्य सहनशीलता’ दोनों देशों ने आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद को मध्य एशिया की शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बताया है। भारत और उज्बेकिस्तान ने इन चुनौतियों के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया। यह सहयोग विशेष रूप से अफगानिस्तान से जुड़े सुरक्षा जोखिमों, कट्टरपंथ, मादक पदार्थों की तस्करी और सीमा-पार आतंकवाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद और औषधीय पौधों में नए अवसर दोनों देशों ने कृषि, स्वास्थ्य, औषधीय जड़ी-बूटियों और आयुर्वेद के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह समझौता भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को मध्य एशिया में विस्तार देने के साथ-साथ शोध, औषधि उत्पादन और स्वास्थ्य सेवाओं में नए अवसर पैदा कर सकता है। कृषि सहयोग के जरिए दोनों देश खाद्य सुरक्षा और कृषि तकनीक में भी एक-दूसरे की मदद करेंगे। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए 100 छात्रवृत्तियां भारत ने उज्बेकिस्तान में हिंदी भाषा के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए लाल बहादुर शास्त्री छात्रवृत्ति के तहत 100 छात्रवृत्तियां देने की घोषणा की है। यह पहल दोनों देशों के युवाओं, छात्रों और शिक्षाविदों के बीच संपर्क बढ़ाएगी। भाषा और शिक्षा के माध्यम से बनने वाले संबंध दीर्घकालीन कूटनीतिक साझेदारी को सामाजिक आधार प्रदान करते हैं। बौद्ध विरासत बनेगी सांस्कृतिक सेतु भारत और उज्बेकिस्तान ने प्राचीन बौद्ध विरासत स्थलों के संरक्षण में मिलकर काम करने का फैसला किया है। मध्य एशिया ऐतिहासिक रूप से भारत और यूरोप के बीच व्यापार, धर्म और संस्कृति के संपर्क का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। बौद्ध विरासत का संरक्षण दोनों देशों के सभ्यतागत संबंधों को पुनर्जीवित करने का माध्यम बन सकता है। यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और ‘सॉफ्ट पावर’ को भी मजबूत करेगा। अरल सागर क्षेत्र के लिए 10 लाख डॉलर का अनुदान भारत ने अरल सागर क्षेत्र में वनीकरण के लिए 10 लाख डॉलर की सहायता देने की घोषणा की है। अरल सागर का सिकुड़ना दुनिया के सबसे गंभीर पर्यावरणीय संकटों में गिना जाता है। इस क्षेत्र में वनीकरण से धूल प्रदूषण, भूमि क्षरण और स्थानीय पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम करने में मदद मिल सकती है। यह सहायता भारत की पर्यावरणीय कूटनीति और जलवायु सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। गुजरात-समरकंद साझेदारी से उपराष्ट्रीय कूटनीति को बल भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों को केवल नई दिल्ली और ताशकंद तक सीमित न रखते हुए गुजरात और समरकंद क्षेत्र के बीच साझेदारी का निर्णय लिया गया है। ऐसी साझेदारियां व्यापार, पर्यटन, शिक्षा, शहरी विकास और सांस्कृतिक संपर्क को स्थानीय स्तर पर मजबूत करती हैं। इसे उपराष्ट्रीय कूटनीति का उदाहरण माना जा सकता है, जिसमें राज्य और क्षेत्र भी विदेश संबंधों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। ‘विकसित भारत 2047’ और ‘यांगी उज्बेकिस्तान’ का साझा विजन भारत का ‘विकसित भारत 2047’ और उज्बेकिस्तान का ‘यांगी उज्बेकिस्तान’ दृष्टिकोण युवा, नवाचार, आधुनिक तकनीक और समावेशी विकास को प्राथमिकता देता है। दोनों देशों का मानना है कि साझा विकास दृष्टि के आधार पर तकनीक, उद्यमिता, शिक्षा और कौशल विकास में सहयोग बढ़ाया जा सकता है। भारत के लिए उज्बेकिस्तान क्यों महत्वपूर्ण है उज्बेकिस्तान मध्य एशिया के केंद्र में स्थित है और क्षेत्र की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल है। भारत के लिए इसका महत्व कई कारणों से है। 1. मध्य एशिया तक रणनीतिक पहुंच: उज्बेकिस्तान के साथ मजबूत संबंध भारत की मध्य एशिया में राजनीतिक और आर्थिक मौजूदगी बढ़ाते हैं। 2. ऊर्जा और खनिज सुरक्षा: महत्वपूर्ण खनिज, परमाणु ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा में सहयोग भारत की दीर्घकालीन ऊर्जा सुरक्षा में सहायक हो सकता है। 3. आतंकवाद और कट्टरपंथ से मुकाबला: अफगानिस्तान के निकट होने के कारण उज्बेकिस्तान क्षेत्रीय सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 4. संपर्क और व्यापार: भारत मध्य एशिया के साथ संपर्क बढ़ाकर नए बाजार और वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग विकसित करना चाहता है। 5. चीन और रूस के प्रभाव के बीच संतुलन: मध्य एशिया में चीन और रूस की मजबूत उपस्थिति है। भारत अपनी स्वतंत्र साझेदारियों के जरिए क्षेत्र में संतुलित और बहुध्रुवीय व्यवस्था को समर्थन देना चाहता है। प्रमुख चुनौतियां समझौतों के बावजूद कुछ व्यावहारिक चुनौतियां बनी हुई हैं। सीधी स्थलीय पहुंच का अभाव: भारत और उज्बेकिस्तान के बीच सीधी भूमि सीमा नहीं है। पाकिस्तान से मार्ग उपलब्ध नहीं होने के कारण व्यापार महंगा और समय लेने वाला हो जाता है। कम व्यापारिक आधार: पांच अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करने के लिए मौजूदा व्यापार में तेजी से वृद्धि करनी होगी। संपर्क परियोजनाओं की धीमी प्रगति: ईरान के चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे जैसे मार्गों को अधिक प्रभावी बनाना आवश्यक होगा। क्षेत्रीय अस्थिरता: अफगानिस्तान की स्थिति और आतंकवाद का खतरा मध्य एशिया के व्यापार और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। समझौतों को जमीन पर उतारने की चुनौती: केवल समझौते पर्याप्त नहीं हैं। इनके लिए समयबद्ध परियोजनाएं, निवेश, निगरानी और निजी क्षेत्र की भागीदारी जरूरी होगी। आगे की राह भारत और उज्बेकिस्तान को व्यापार लक्ष्य हासिल करने के लिए परिवहन गलियारों, बैंकिंग संपर्क और स्थानीय मुद्रा में व्यापार की संभावनाओं पर काम करना चाहिए। यूपीआई समझौते को पर्यटन, खुदरा भुगतान और छोटे कारोबार तक विस्तारित किया जा सकता है। महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में संयुक्त खोज, प्रसंस्करण और दीर्घकालीन आपूर्ति समझौते उपयोगी होंगे। रक्षा सहयोग को प्रशिक्षण से आगे बढ़ाकर वास्तविक सह-उत्पादन तक ले जाना होगा। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और नवाचार केंद्रों के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है। यूपीएससी मेन्स के लिए महत्वपूर्ण विश्लेषण भारत-उज्बेकिस्तान साझेदारी भारत की ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति , ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के दृष्टिकोण से जुड़ी है। यह साझेदारी बताती है कि भारत अपनी विदेश नीति में केवल सामरिक संबंधों पर निर्भर नहीं है, बल्कि व्यापार, डिजिटल तकनीक, संस्कृति, शिक्षा और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों को जोड़कर एक बहुआयामी मॉडल विकसित कर रहा है। हालांकि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि घोषित लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाता है या नहीं। खासकर संपर्क की कमी, कम व्यापार और क्षेत्रीय अस्थिरता जैसी चुनौतियों का समाधान जरूरी होगा। निष्कर्ष भारत और उज्बेकिस्तान के बीच समग्र रणनीतिक साझेदारी मध्य एशिया में भारत की सक्रिय और दीर्घकालीन भूमिका का संकेत है। पांच अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य, यूपीआई विस्तार, रक्षा सह-उत्पादन, महत्वपूर्ण खनिज और सांस्कृतिक सहयोग इस संबंध को व्यापक आधार देते हैं। यह साझेदारी तभी वास्तविक बदलाव ला सकेगी, जब समझौते घोषणाओं से आगे बढ़कर निवेश, संपर्क, रोजगार और संयुक्त परियोजनाओं में बदलें। सफल क्रियान्वयन की स्थिति में भारत-उज्बेकिस्तान संबंध मध्य एशिया में शांति, स्थिरता और साझा समृद्धि के मजबूत स्तंभ बन सकते हैं। संभावित सैंपल प्रश्न 1. भारत की 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति में उज्बेकिस्तान की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। 2. भारत-उज्बेकिस्तान समग्र रणनीतिक साझेदारी के प्रमुख आयामों का उल्लेख करते हुए बताइए कि यह भारत की विदेश नीति और मध्य एशिया में रणनीतिक हितों को कैसे मजबूत करती है। 3. भारत की डिजिटल कूटनीति में यूपीआई की बढ़ती भूमिका का परीक्षण कीजिए। उज्बेकिस्तान के साथ हुआ समझौता इस दिशा में कितना महत्वपूर्ण है? 4. आतंकवाद, उग्रवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा के संदर्भ में भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। 5. भारत की 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति में आयुर्वेद, हिंदी, बौद्ध विरासत और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भूमिका स्पष्ट कीजिए।



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