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मुंबई। कुछ फनकार सिर्फ पर्दे पर किरदार नहीं निभाते बल्कि अपनी पूरी जिंदगी से लोगों के दिलों में ऐसी जगह बना लेते हैं, जो वक्त के साथ और भी गहरी होती चली जाती है, हिंदी सिनेमा के 'जुबली कुमार' राजेन्द्र कुमार भी ऐसे ही अजीम फनकार थे... जेब में महज 50 रुपये, आंखों में फिल्मों का ख्वाब और दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा लेकर वह मुंबई आए लेकिन फिर एक ऐसा दौर आया, जब उनकी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सिल्वर और गोल्डन जुबली की ऐसी दास्तान लिखी कि लोग उन्हें प्यार से 'जुबली कुमार' कहने लगे। ख्वाब के लिए नौकरी भी छोड़ दी सियालकोट (अब पाकिस्तान) में 20 जुलाई 1929 को जन्मे राजेन्द्र कुमार एक सादा परिवार से ताल्लुक रखते थे। बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत आ गया। इसी दौरान उनकी नौकरी पुलिस विभाग में लग गई लेकिन दिल में बस एक ही ख्वाहिश थी अभिनेता बनने की। उन्होंने ट्रेनिंग शुरू होने से दो दिन पहले ही नौकरी छोड़ दी और अपने ख्वाब को हकीकत बनाने मुंबई का रुख कर लिया। मुंबई आने के लिए उन्होंने अपने पिता की दी हुई घड़ी तक बेच दी। उसी पैसे और महज 50 रुपये के सहारे उन्होंने अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की। लंबा संघर्ष... लेकिन हौसला कभी नहीं टूटा मुंबई में शुरुआती दिनों में मशहूर गीतकार राजेन्द्र कृष्ण की मदद से उन्हें निर्देशक एच.एस. रवैल के साथ सहायक निर्देशक का काम मिला। 1950 में फिल्म 'जोगन' से अभिनय का पहला मौका मिला लेकिन कामयाबी इतनी आसान नहीं थी। कई साल तक लगातार मेहनत करने के बावजूद उनकी फिल्में खास कमाल नहीं दिखा सकीं। मगर राजेन्द्र कुमार ने कभी मायूसी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। 'मदर इंडिया' ने बदली किस्मत, फिर शुरू हुआ कामयाबी का सुनहरा सफर साल 1957 में आई 'मदर इंडिया' में उनका छोटा-सा किरदार भी लोगों के दिलों में उतर गया। इसके बाद गूंज उठी शहनाई , कानून , ससुराल , घराना , आस का पंछी , दिल एक मंदिर और मेरे महबूब जैसी फिल्मों ने उन्हें कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। साल 1963 से 1966 तक का दौर उनके करियर का सबसे सुनहरा दौर माना जाता है। मेरे महबूब , जिंदगी , संगम , आई मिलन की बेला , आरजू और सूरज जैसी फिल्मों ने एक के बाद एक सुपरहिट होकर नया इतिहास रच दिया। जब हर सिनेमाघर में सिर्फ राजेन्द्र कुमार का जलवा था एक वक्त ऐसा भी आया, जब मुंबई के बड़े-बड़े सिनेमाघरों में उनकी ही फिल्में लगी रहती थीं और हर फिल्म सिल्वर या गोल्डन जुबली मना रही थी। उनकी लगातार कामयाबी ने उन्हें वह शोहरत दी, जिसे आज भी लोग 'जुबली कुमार' के नाम से याद करते हैं। कामयाबी के शिखर पर भी रहे बेहद सादगी पसंद राजेन्द्र कुमार ने कभी अपने स्टारडम को अपने फन पर हावी नहीं होने दिया। जब वह अपने करियर के सबसे कामयाब दौर में थे तब भी उन्होंने फिल्म 'संगम' में राज कपूर के साथ सह-नायक का किरदार निभाया। यह उनकी बड़ी सोच और अपने फन पर भरोसे की मिसाल थी। बदलते दौर में उन्होंने चरित्र अभिनेता के तौर पर भी अपनी अलग पहचान बनाई। बेटे कुमार गौरव को लॉन्च करने के लिए उन्होंने 'लव स्टोरी' बनाई, जिसने बॉक्स ऑफिस पर शानदार कामयाबी हासिल की। बाद में उन्होंने नाम और फूल जैसी फिल्मों का भी निर्माण किया। पद्मश्री मिला, लेकिन सबसे बड़ा इनाम था लोगों का प्यार भारतीय सिनेमा में शानदार योगदान के लिए उन्हें 1969 में पद्मश्री से नवाजा गया। करीब चार दशक लंबे करियर में उन्होंने लगभग 85 फिल्मों में काम किया और अपनी संजीदा अदाकारी, मासूम मुस्कान और सादगी से करोड़ों दिलों में हमेशा के लिए जगह बना ली। 12 जुलाई... जब सिनेमा ने अपना 'जुबली कुमार' खो दिया 12 जुलाई 1999 को राजेन्द्र कुमार इस दुनिया से रुख्सत हो गए लेकिन उनकी फिल्में, उनके निभाए किरदार और उनकी मोहब्बत भरी मुस्कान आज भी हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की सबसे खूबसूरत यादों में शामिल हैं। 'जुबली कुमार' सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि उस दौर की पहचान हैं, जब मेहनत, सादगी और बेहतरीन अदाकारी ही किसी कलाकार की सबसे बड़ी पहचान हुआ करती थी।