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जेनेवा/नई दिल्ली। विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्ल्यूएचओ ) ने अपनी ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन कैंसर 2026 में चेतावनी दी है कि अगर अभी कैंसर की रोकथाम, समय पर जांच और इलाज की सुविधाओं को मजबूत करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो साल 2050 तक दुनिया में हर साल कैंसर के नए मरीजों की संख्या बढ़कर करीब 3.5 करोड़ हो जाएगी जबकि वर्तमान में हर वर्ष 2.06 करोड़ नए मामले सामने आ रहे हैं और करीब एक करोड़ लोगों की मौत इस बीमारी से होती है। हर दिन 26 हजार से ज्यादा लोगों की मौत डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक, कैंसर दुनिया में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। हर साल करीब 1 करोड़ (10 मिलियन) लोगों की कैंसर से मौत हो जाती है। यानी औसतन हर दिन 26 हजार से ज्यादा लोगों की जान इस बीमारी की वजह से चली जाती है। 25 साल में लगभग दोगुने हो जाएंगे नए मरीज रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि रोकथाम, जांच और इलाज की मौजूदा व्यवस्था में तेजी से सुधार नहीं हुआ तो अगले 25 वर्षों में कैंसर के नए मामलों में करीब 70 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। 2026 के 2.06 करोड़ मामलों का आंकड़ा 2050 तक बढ़कर करीब 3.5 करोड़ हो जाएगा। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि केवल इलाज बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकारों को ऐसी स्वास्थ्य नीति अपनानी होगी जिसमें रोकथाम, शुरुआती जांच, समय पर इलाज और मरीजों की सामाजिक व मानसिक सहायता को बराबर महत्व दिया जाए। गरीब देशों में इलाज की भारी असमानता रिपोर्ट बताती है कि कैंसर से बचने की संभावना किसी व्यक्ति की आय और उसके देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर काफी निर्भर करती है। उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर की 87% महिलाएं निदान के पांच साल बाद भी जीवित रहती हैं , जबकि कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा सिर्फ 42% है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनिया के तीन में से केवल एक से भी कम देशों ने कैंसर के इलाज को अपनी यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज ( यूएचसी ) योजना में शामिल किया है। इसका मतलब है कि करोड़ों लोगों को आज भी जरूरी कैंसर उपचार आसानी से उपलब्ध नहीं है। कैंसर मरीजों पर आर्थिक और मानसिक बोझ भी भारी डब्ल्यूएचओ के पहले वैश्विक सर्वे में सामने आया कि कैंसर केवल स्वास्थ्य की नहीं बल्कि आर्थिक और मानसिक संकट की भी बड़ी वजह है। 45 प्रतिशत मरीज आर्थिक परेशानी झेलते हैं, जबकि आधे से अधिक मरीज मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का सामना करते हैं। मरीजों की देखभाल करने वाले परिवारों पर भी भारी सामाजिक और आर्थिक दबाव पड़ता है। एशिया में सबसे ज्यादा कैंसर का बोझ रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024 में दुनिया के 50.7 प्रतिशत कैंसर मामले और 56.5 प्रतिशत मौतें एशिया में दर्ज की गईं। वहीं, दुनिया की केवल 9 प्रतिशत आबादी वाले यूरोप में 21 प्रतिशत कैंसर केस और 20 प्रतिशत मौतें दर्ज हुईं। फेफड़ों का कैंसर सबसे ज्यादा जानलेवा डब्ल्यूएचओ के अनुसार, फेफड़ों का कैंसर दुनिया में सबसे ज्यादा मौतों का कारण बना हुआ है। पुरुषों में फेफड़े, प्रोस्टेट और कोलोरेक्टल कैंसर सबसे अधिक पाए जाते हैं, जबकि महिलाओं में स्तन, फेफड़े और कोलोरेक्टल कैंसर सबसे आम हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के लगभग चार में से एक नहीं बल्कि चार में से लगभग दो (करीब 40%) कैंसर ऐसे कारणों से जुड़े हैं जिन्हें रोका जा सकता है। इनमें तंबाकू, शराब, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, अस्वस्थ खानपान, HPV और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमण तथा वायु प्रदूषण प्रमुख कारण हैं। तंबाकू नियंत्रण से मिला सकारात्मक परिणाम डब्ल्यूएचओ ने बताया कि वर्ष 2010 के बाद से दुनिया में तंबाकू सेवन में 27 प्रतिशत की कमी आई है। इसका असर कई देशों में फेफड़ों के कैंसर के मामलों और मौतों में कमी के रूप में देखने को मिला है। साथ ही, अब 82 प्रतिशत देशों के पास राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजना भी मौजूद है। जरूरी दवाएं अभी भी करोड़ों लोगों की पहुंच से बाहर रिपोर्ट के अनुसार, निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में प्राथमिक कैंसर दवाओं की उपलब्धता केवल 9 से 54 प्रतिशत तक है। इसके विपरीत, उच्च आय वाले देशों में यही उपलब्धता 68 से 94 प्रतिशत के बीच है, जिससे इलाज में बड़ी असमानता बनी हुई है। डब्ल्यूएचओ ने सरकारों से क्या करने को कहा? डब्ल्यूएचओ ने सभी देशों से कैंसर नियंत्रण को प्राथमिकता देने की अपील की है। संगठन ने कहा है कि सरकारें कैंसर उपचार को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का हिस्सा बनाएं, मरीजों और उनके परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा बढ़ाएं और नई चिकित्सा तकनीकों तथा शोध का लाभ सभी लोगों तक समान रूप से पहुंचाएं।



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