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नई दिल्ली। फरक्का बैराज और भारत-बांग्लादेश गंगा जल बंटवारा संधि एक बार फिर बहस के केंद्र में है। 12 दिसंबर 1996 को भारत और बांग्लादेश के बीच हुई गंगा जल बंटवारा संधि की तीस वर्ष की अवधि दिसंबर 2026 में पूरी हो रही है। इसलिए इसकी समीक्षा केवल पुरानी संधि को आगे बढ़ाने का प्रश्न नहीं है। यह तय करने का अवसर भी है कि बदलती जलवायु, बढ़ती आबादी, कृषि, उद्योग, पेयजल, नौवहन और पर्यावरणीय जरूरतों के बीच गंगा के पानी को लेकर अगली व्यवस्था कैसी होगी। बिहार की जल जरूरतों पर नई बहस जनता दल (यू) के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य संजय कुमार झा ने मांग की है कि 1996 की संधि को उसी रूप में आगे बढ़ाने के बजाय गंगा बेसिन पर निर्भर राज्यों की वर्ष 2050 तक की जल जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। दूसरी ओर बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए बिहार की पुरानी शिकायतों और 24 जनवरी 1997 की सचिव-स्तरीय बैठक के दस्तावेज का हवाला दिया है। दोनों पक्षों की राजनीतिक भाषा अलग है, लेकिन उनके बीच एक साझा प्रश्न है—गंगा के जल पर बिहार की वर्तमान और भविष्य की जरूरतों का आकलन किस आधार पर होगा? यही प्रश्न फरक्का की पूरी बहस का केंद्र होना चाहिए। फरक्का बैराज और नदी के प्रवाह का प्रभाव फरक्का बैराज का निर्माण मूलतः हुगली नदी में पर्याप्त जल प्रवाह बनाए रखने और कोलकाता बंदरगाह में गाद की समस्या कम करने के उद्देश्य से किया गया था। 1975 में इसके चालू होने के बाद गंगा के पानी को फीडर नहर के माध्यम से भागीरथी-हुगली तंत्र की ओर मोड़ा गया। लेकिन नदी पर बना कोई बड़ा अवरोध केवल पानी के बंटवारे को प्रभावित नहीं करता। नदी पानी के साथ गाद, पोषक तत्व, मछलियां और जलीय जीवन भी बहाती है। प्रवाह में परिवर्तन नदी की आकृति, तलछट के वितरण और जलीय पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकता है। मछुआरों ने सबसे पहले महसूस किया बदलाव फरक्का के दुष्परिणामों को सबसे पहले भांपने वालों में नदी के मछुआरे थे। गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े अनिल प्रकाश बताते हैं कि करीब 35 वर्ष पहले जब वे मछुआरों को गंगा पर जमींदारों के कब्जे के खिलाफ संगठित करने के लिए गांव-गांव घूम रहे थे, तो मछुआरे उनसे फरक्का को तोड़ने की मांग करते थे। तब उन्हें समझ नहीं आता था कि मछुआरे ऐसा क्यों कह रहे हैं। बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक के. एस. बिलग्रामी और जे. एस. दत्ता मुंशी के शोध का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मछुआरों की आशंका निराधार नहीं थी। उनके अनुसार इन वैज्ञानिकों ने गंगा की पारिस्थितिकी पर शोध किया था। आजीविका पर असर के दावे अनिल प्रकाश का दावा है कि फरक्का के बाद गंगा और उसकी सहायक नदियों में मछलियों की उपलब्धता में भारी कमी आई और इसके कारण लाखों मछुआरों की आजीविका प्रभावित हुई। इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच जरूरी है, लेकिन मछुआरों के अनुभव को महज लोकविश्वास कहकर खारिज करना भी उचित नहीं। नदी में होने वाला बदलाव सबसे पहले वही समुदाय महसूस करता है जिसकी रोजी-रोटी सीधे उसके प्रवाह और जलीय जीवन से जुड़ी होती है। पलायन और बदलती सामाजिक तस्वीर कहलगांव के योगेन्द्र सहनी बताते हैं कि कागजी टोला मछुआरा बस्ती से करीब चालीस प्रतिशत लोग रोजगार की तलाश में पलायन कर चुके हैं। अगर यह अनुभव व्यापक क्षेत्र में भी दिखाई देता है तो यह केवल मत्स्य उत्पादन का नहीं, बल्कि ग्रामीण रोजगार और सामाजिक संरचना का प्रश्न है। गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े उदय की बात इस बहस को और स्पष्ट करती है—“नदी पर पहला हक मछुआरों का है। उसके बाद किसान और आस्थावानों का।” उनका कहना है कि मछुआरे नदी को जिस रूप में देखते हैं, वह दूसरे लोगों के नदी-बोध से अलग है। फरक्का पर आज की बहस में यही आवाज सबसे कम सुनाई देती है। लोकगीत में दर्ज नदी का दर्द मछुआरों का लोकगीत भी बदलती नदी की पीड़ा को दर्ज करता है—“गंगा जी में मिले न मछरिया, केना के दिनमा जयते हो भाय...।” यह गीत वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, लेकिन नदी के साथ सदियों से रहने वाले समाज की स्मृति और अनुभव का दस्तावेज जरूर है। गंगा की पारिस्थितिकी में मछलियों के साथ गांगेय डॉल्फिन जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियां भी हैं। हिलसा जैसी मछलियों का प्रवास भी नदी की पारिस्थितिक निरंतरता से जुड़ा है। इसलिए भविष्य की जल नीति में पर्यावरणीय प्रवाह को केंद्रीय स्थान देना होगा। नदी में केवल न्यूनतम मात्रा में पानी छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। मौसम के अनुरूप प्राकृतिक प्रवाह, मछलियों के प्रजनन और प्रवास, डॉल्फिन के आवास तथा भूजल पुनर्भरण के लिए आवश्यक जल भी सुरक्षित रखना होगा। कटाव का बढ़ता संकट फरक्का की बहस का दूसरा बड़ा पक्ष है—जमीन निगलती गंगा। भागलपुर और गंगा किनारे के दूसरे इलाकों में लोगों का अनुभव है कि नदी की धारा में बदलाव के साथ कटाव की समस्या गंभीर हुई है। नदी जब उथली होती है तो उसका प्रवाह फैलता है और किनारों पर दबाव बढ़ सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी बिहार में बाढ़ और कटाव से होने वाले नुकसान को गंभीर आर्थिक बोझ बताया था और कहा था कि पिछले पांच वर्षों में राज्य को जमीन के कटाव और बाढ़ के तत्काल प्रभावों से निपटने में 1,058 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े। मालदा का जटिल भूगोल फरक्का के आसपास पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में कटाव की तस्वीर और भी जटिल दिखाई देती है। यहां गंगा कई धाराओं में बंटकर करीब 10-15 किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में फैल जाती है। फरक्का की संरचना से जुड़े प्रवाह-परिवर्तन, स्थानीय भूगोल और तलछट के व्यवहार को लेकर विशेषज्ञों में बहस रही है। राजमहल की पथरीली पहाड़ियों के कारण नदी के दाहिने किनारे की ओर विस्तार सीमित होता है और बाएं किनारे की ओर नदी का फैलाव तथा घुमाव दिखाई देता है। इस प्रक्रिया में नदी बड़ी मात्रा में जमीन काटती है और दूसरी जगह बालू तथा तलछट जमा होने से नए टापू बनते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ‘चार’ कहते हैं। नदी को समझने की जरूरत यह पूरा भूगोल बताता है कि नदी को केवल एक सीधी जलधारा मानना कितना खतरनाक है। नदी अपना रास्ता बनाती-बिगाड़ती है। लेकिन उसमें बने मानव निर्मित अवरोध इस प्राकृतिक प्रक्रिया को किस हद तक बदलते हैं, इसका पांच दशक का स्वतंत्र अध्ययन अब जरूरी हो गया है। यहां वैज्ञानिक सावधानी भी जरूरी है। बिहार में हर बाढ़ और हर कटाव का कारण फरक्का को मान लेना सही नहीं होगा। नेपाल से आने वाली नदियां, हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र, मानसूनी वर्षा, कोसी, गंडक और घाघरा जैसी सहायक नदियां, तटबंध, जल निकासी, नदी का प्राकृतिक मार्ग और जलवायु परिवर्तन—सभी की भूमिका है। इसलिए प्रश्न फरक्का को दोषी या निर्दोष घोषित करने का नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रभाव को मापने का होना चाहिए। स्वतंत्र अध्ययन की जरूरत पिछले पांच दशकों के जलप्रवाह, तलछट, नदी की आकृति, कटाव, बाढ़, मत्स्य उत्पादन और जलीय जैव विविधता के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन क्यों नहीं हो सकता? फरक्का के ऊपर और नीचे नदी की स्थिति में क्या परिवर्तन आया? गाद का वितरण कैसे बदला? मछलियों के प्रवास पर क्या प्रभाव पड़ा? किन इलाकों में कृषि भूमि प्रभावित हुई? इन प्रश्नों का उत्तर उपग्रह चित्रों, जलवैज्ञानिक आंकड़ों, नदी सर्वेक्षणों और स्थानीय समुदायों की गवाही को एक साथ रखकर खोजा जा सकता है। गंगा की गाद का प्रश्न भी इसी से जुड़ा है। हिमालय से मैदानों तक गंगा भारी मात्रा में तलछट लाती है। यही गाद मैदानों की उर्वरता का आधार है, लेकिन प्रवाह और नदी की आकृति में परिवर्तन होने पर यही तलछट नदी तल में जमा होकर जल-वहन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। 2016 में माधव चितले की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति ने भी भीमगौड़ा से फरक्का तक गंगा में गाद की स्थिति और उसके प्रबंधन का अध्ययन किया था। 1997 के दस्तावेज की अहमियत सुधाकर सिंह ने 24 जनवरी 1997 की सचिव-स्तरीय बैठक का हवाला देकर एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रश्न उठाया है। उनके अनुसार बिहार के अधिकारियों ने भारत-बांग्लादेश संधि से पहले बिहार से पर्याप्त परामर्श न किए जाने की शिकायत की थी। केंद्र की ओर से यह स्पष्ट किया गया था कि संधि ऊपरी तटवर्ती राज्यों के जल उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए नहीं है और गंगा जल की सह-घाटी राज्यों के बीच हिस्सेदारी का प्रश्न सभी संबंधित राज्यों को साथ लेकर सुलझाया जाना चाहिए। यदि बैठक की मूल कार्यवाही यही बात दर्ज करती है तो 2026 की समीक्षा में उसका परीक्षण जरूरी है। लेकिन, 1997 का दस्तावेज आज की पूरी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। पिछले तीन दशकों में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। यही कारण है कि 2050 तक की जल जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन आवश्यक है। बिहार की आबादी, शहरों, कृषि, उद्योग और पेयजल की जरूरतें बढ़ेंगी। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा और नदी प्रवाह में अनिश्चितता बढ़ सकती है। पारदर्शी जल प्रबंधन की आवश्यकता मगर बिहार के हितों की रक्षा केवल बांग्लादेश से अधिक पानी मांगने से नहीं होगी। गंगा बेसिन के भीतर भी जल उपयोग की पारदर्शी व्यवस्था चाहिए। ऊपरी और निचले तटवर्ती राज्यों के बीच जल उपलब्धता और उपयोग का वैज्ञानिक आकलन हो। नई बड़ी परियोजनाओं की स्वीकृति में निचले राज्यों की चिंताओं को भी महत्व मिले। मुंगेर में लंबे समय से नदी और समाज के सवालों को देखने वाले राकेश कुमार मंडल और संजय पोद्दार जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं की चिंता भी इसी व्यापक संकट से जुड़ती है। उनका अनुभव बताता है कि नदी का संकट केवल पानी का संकट नहीं है। नदी के साथ आजीविका जाती है तो उसके साथ सामाजिक सुरक्षा भी कमजोर होती है। खेती और मछली पकड़ने पर निर्भर समुदायों के सामने रोजगार का संकट खड़ा होता है और विस्थापन बढ़ता है। बदलती आजीविका पर चिंता मुंगेर के अधिवक्ता और अपराध संवाददाता अवधेश कुमार का अनुभव इस सामाजिक बदलाव की दूसरी तस्वीर सामने रखता है। उनके अनुसार जो लोग पहले मछली पकड़ने और खेती पर निर्भर थे, उनमें से कुछ अब दूसरे असुरक्षित और गैरकानूनी रोजगारों की ओर जा रहे हैं। ऐसे दावों की भी सामाजिक वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए, क्योंकि आजीविका के टूटने का असर समाज की पूरी संरचना पर पड़ सकता है। इसलिए 2026 की समीक्षा का एजेंडा व्यापक होना चाहिए। 1996 के बाद गंगा के प्रवाह और जल उपलब्धता का स्वतंत्र मूल्यांकन हो। फरक्का के पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव का अध्ययन कराया जाए। गंगा बेसिन के राज्यों की 2050 तक की जल जरूरतों का आकलन हो। पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। किसानों और मछुआरों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए। निर्णय तथ्यों के आधार पर हो फरक्का को उसी रूप में चलाना है, संचालन में बदलाव करना है, पुनर्रचना करनी है या कोई वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करनी है—इसका निर्णय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, स्वतंत्र विशेषज्ञ अध्ययन से होना चाहिए। भारत-बांग्लादेश संबंधों की संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना होगा। बांग्लादेश के लिए गंगा जीवनरेखा है। भारत के लिए भी गंगा केवल जल संसाधन नहीं, सभ्यता और अर्थव्यवस्था का आधार है। इसलिए इस प्रश्न को बिहार बनाम बांग्लादेश में बदलना उचित नहीं। लेकिन दोनों देशों के संबंधों के नाम पर बिहार की चिंताओं को नजरअंदाज करना भी सही नहीं। फरक्का का असली हिसाब यही है कि पिछले पांच दशकों में गंगा के साथ क्या हुआ। कितना पानी उपलब्ध रहा, गाद का व्यवहार कैसे बदला, मछलियों और डॉल्फिन की स्थिति क्या हुई, कटाव और कृषि पर क्या असर पड़ा और नदी पर निर्भर समाज की आजीविका किस तरह बदली। दस्तावेज और आंकड़ों की जरूरत इन सवालों का उत्तर राजनीतिक दावों से नहीं मिलेगा। दस्तावेज चाहिए, आंकड़े चाहिए और नदी किनारे रहने वाले समाज की गवाही भी। बिहार को पानी चाहिए। पश्चिम बंगाल को पानी चाहिए। बांग्लादेश को पानी चाहिए। किसानों और शहरों को पानी चाहिए। नौवहन के लिए पर्याप्त प्रवाह चाहिए। लेकिन गंगा को भी पानी चाहिए। यही वह बिंदु है जहां जल बंटवारे की राजनीति को नदी की पारिस्थितिकी से जोड़ना होगा। गंगा के हिस्से का कुछ पानी स्वयं गंगा के जीवन के लिए सुरक्षित रखना होगा। दिसंबर 2026 की समीक्षा इसलिए केवल एक संधि के नवीनीकरण का अवसर नहीं है। यह तय करने का अवसर है कि आने वाले दशकों में गंगा को हम केवल बांटने योग्य जल-संसाधन मानेंगे या एक जीवित नदी। संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत अगर गंगा को जीवित नदी माना जाएगा तो बिहार के जल अधिकार, बांग्लादेश की जरूरत, पश्चिम बंगाल की चिंता, किसानों और मछुआरों की आजीविका और नदी की पारिस्थितिकी—इन सबको एक साथ देखना होगा। फरक्का का नया हिसाब इसी संतुलन से निकलेगा क्योंकि सवाल आखिरकार यह नहीं है कि गंगा किसकी है। सवाल यह है कि गंगा बचेगी कैसे—और उसके साथ वे समाज कैसे बचेंगे, जिनकी जिंदगी सदियों से उसकी धारा पर टिकी है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)