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मुंबई, ईरान पर अमेरिकी-इजराइल हमले से वैश्विक आपूर्ति बाधित होने की आशंका में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल का असर भारत के चालू खाते घाटे, महंगाई और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ने की चिंता में पिछले डेढ़ महीने में शेयर बाजार के दोनों मानक सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी के 11 प्रतिशत तक लुढ़कने से छोटे-बड़े निवेशकों के 50 लाख करोड़ रुपये तक डूब गए। ईरान पर 28 फरवरी 2026 को इज़राइल और अमेरिका के सैन्य हमले ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजार को भी गहरे झटके में डाल दिया। इस भू-राजनीतिक संकट का सीधा असर निवेशकों के भरोसे पर पड़ा और बाजार में तेज गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया। हमले के तुरंत बाद ही बाजार “रिस्क-ऑफ” मोड में चला गया, जहां निवेशकों ने तेजी से अपने निवेश निकालकर सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया। इस संकट के चलते बीएसई का तीस शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के निफ्टी में लगातार कई हफ्तों तक गिरावट दर्ज की गई, जिसने बाजार को गहरे नुकसान में धकेल दिया। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार, 28 फरवरी के बाद पहले सप्ताह (1–7 मार्च) में सेंसेक्स में लगभग 3.2% और निफ्टी में करीब 3.1% की गिरावट आई। दूसरे सप्ताह (8–14 मार्च) में गिरावट और तेज हुई, जहां सेंसेक्स लगभग 2.4% और निफ्टी 2.6% टूट गया। तीसरे सप्ताह (15–21 मार्च) में वैश्विक तनाव और तेल कीमतों के दबाव के कारण सेंसेक्स में करीब 1.8% और निफ्टी में 1.9% की गिरावट दर्ज की गई। चौथे सप्ताह (22–28 मार्च) में बिकवाली फिर तेज हुई और सेंसेक्स लगभग 2.1% तथा निफ्टी करीब 2.3% गिरा। मार्च के अंतिम दिनों और अप्रैल की शुरुआत तक यह गिरावट जारी रही, जिससे कुल मिलाकर दोनों सूचकांकों में लगभग 10–11% की गिरावट दर्ज हुई। पहले सप्ताह (1–7 मार्च 2026) के अंत तक सेंसेक्स गिरकर लगभग 71,200 अंक पर बंद हुआ जबकि निफ्टी करीब 21,650 अंक पर आ गया। दूसरे सप्ताह (8–14 मार्च) में गिरावट जारी रही और सेंसेक्स फिसलकर करीब 69,500 अंक पर बंद हुआ वहीं निफ्टी भी घटकर लगभग 21,100 अंक पर आ गया। तीसरे सप्ताह (15–21 मार्च) में बाजार में थोड़ी स्थिरता की कोशिश जरूर दिखी लेकिन अंततः सेंसेक्स और गिरकर करीब 68,200 अंक पर बंद हुआ और निफ्टी लगभग 20,750 अंक के स्तर पर आ गया। चौथे सप्ताह (22–28 मार्च) में फिर से बिकवाली तेज हुई, जिससे सेंसेक्स गिरकर करीब 66,800 अंक और निफ्टी लगभग 20,300 अंक पर बंद हुआ। मार्च के अंतिम दिनों और अप्रैल की शुरुआत तक गिरावट जारी रही, जहां सेंसेक्स करीब 65,500 अंक और निफ्टी लगभग 19,900 अंक के स्तर तक आ गया। इस तरह पूरे एक महीने के भीतर बाजार ने अपने ऊपरी स्तरों से लगभग 10–11% की गिरावट दर्ज की। इस लगातार गिरावट का सबसे बड़ा असर निवेशकों की संपत्ति पर पड़ा। कुछ ही सप्ताह में भारतीय बाजार में लगभग 50 लाख करोड़ रुपये तक की पूंजी डूब गई। 27 फरवरी को बाजार पूंजीकरण करीब 463 लाख करोड़ रुपये था, जो घटकर लगभग 422 लाख करोड़ रुपये रह गया। कई कारोबारी सत्रों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जहां एक ही दिन में सेंसेक्स 1500–1600 अंकों तक गिर गया। इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई उछाल रही। युद्ध के चलते वैश्विक आपूर्ति को लेकर आशंकाएं बढ़ीं और ब्रेंट क्रूड की कीमत 110–117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इस झटके से बुरी तरह प्रभावित हुआ। महंगे तेल का सीधा असर देश के चालू खाते के घाटे, महंगाई और कॉर्पोरेट मुनाफे पर पड़ने की आशंका ने निवेशकों को चिंतित कर दिया, जिससे बाजार में बिकवाली और तेज हो गई। विदेशी निवेशकों की भूमिका भी इस गिरावट में अहम रही। अनिश्चितता बढ़ने के साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकालना शुरू कर दिया। अनुमान के मुताबिक, 28 फरवरी के बाद से उन्होंने ₹1.3 लाख करोड़ से अधिक की बिकवाली की, जिससे बाजार में तरलता कम हो गई और गिरावट और गहरी हो गई। इसके साथ ही रुपया भी दबाव में आ गया और डॉलर के मुकाबले 94–95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक कमजोर हो गया, जिसने विदेशी निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी। सेक्टर के स्तर पर बैंकिंग, मेटल, ऑटो और बुनियादी ढांचा जैसे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई क्योंकि ये समूह आर्थिक गतिविधियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। वहीं, तेल की कीमतों में तेजी के कारण ओएनजीसी जैसी कंपनियों के शेयरों में कुछ मजबूती देखने को मिली लेकिन इससे समग्र बाजार की गिरावट पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय शेयर बाजार अब वैश्विक घटनाओं से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ है। पश्चिम एशिया में बढ़ा तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल—इन सभी ने मिलकर बाजार में “भूचाल” जैसी स्थिति पैदा कर दी। आने वाले समय में बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच तनाव कम होता है या और बढ़ता है। यदि हालात सामान्य होते हैं तो बाजार में धीरे-धीरे सुधार संभव है लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो अस्थिरता और गिरावट जारी रह सकती है। आगे की दिशा अब पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच तनाव किस दिशा में जाता है। यदि हालात जल्द सामान्य होते हैं और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो बाजार में धीरे-धीरे रिकवरी देखी जा सकती है। लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो निवेशकों को और अधिक अस्थिरता और संभावित गिरावट के लिए तैयार रहना होगा। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं किस तरह सीधे आम निवेशकों की जेब और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं।



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