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केवड़िया/पटना। बिहार की मिट्टी से निकले चार नामों ने मंगलवार को राष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी चमक बिखेरी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुजरात के केवड़िया में आयोजित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में अभिनेता संजय मिश्रा, निर्देशक कमलेश के. मिश्र, निर्माता मिंटी मिश्रा और फिल्म समीक्षक संजीव श्रीवास्तव को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। बिहार की इन चार हस्तियों ने अभिनय, निर्देशन, फिल्म निर्माण और समीक्षा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में राष्ट्रीय पहचान हासिल की है। संजय मिश्रा को फिल्म ‘भक्षक’ में अभिनय, कमलेश के. मिश्र और मिंटी मिश्रा को ऐतिहासिक फिल्म ‘काकोरी’ तथा संजीव श्रीवास्तव को हिंदी फिल्म समीक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मान मिला। ‘भक्षक’ का दमदार अभिनय, संजय मिश्रा के नाम रजत कमल दरभंगा निवासी और हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता संजय मिश्रा को फिल्म ‘भक्षक’ में प्रभावशाली अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का रजत कमल प्रदान किया गया। ‘भक्षक’ की कहानी चर्चित मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड से प्रेरित है। फिल्म में संजय मिश्रा के अभिनय को राष्ट्रीय पुरस्कार के जरिए बड़ी पहचान मिली है। तीन दशक से अधिक समय से अभिनय की दुनिया में सक्रिय संजय मिश्रा ने वर्ष 1995 में ‘ओह डार्लिंग! ये है इंडिया!’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। अलग-अलग तरह के किरदारों में प्रभावशाली अभिनय उनकी पहचान रहा है। उन्हें ‘आंखों देखी’ और ‘वध’ के लिए दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड भी मिल चुका है। ‘काकोरी’ ने जगाया इतिहास, बिहार के दो सितारों को राष्ट्रीय सम्मान गोपालगंज निवासी निर्देशक कमलेश के. मिश्र और निर्माता मिंटी मिश्रा को फिल्म ‘काकोरी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ जीवनीपरक, ऐतिहासिक पुनर्निर्माण अथवा संकलन फिल्म का रजत कमल प्रदान किया गया। देशभक्ति पर आधारित यह फिल्म वर्ष 1925 के ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन के शताब्दी वर्ष में काकोरी के अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित की गई है। फिल्म में काकोरी की ऐतिहासिक घटना के साथ उससे जुड़े स्वतंत्रता सेनानियों के साहस, संकल्प और आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को सामने लाने का प्रयास किया गया है। फिल्म के मुख्य निर्माता जसविंदर सिंह दिल्ली के हैं, जबकि निर्माता मिंटी मिश्रा बिहार के गोपालगंज से आती हैं। इसका निर्माण उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के सहयोग से हुआ है। कमलेश मिश्र की उपलब्धियों में जुड़ा एक और सुनहरा अध्याय निर्देशक कमलेश के. मिश्र के लिए यह पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं है। उनकी फिल्म ‘मधुबनी: द स्टेशन ऑफ कलर्स’ को इससे पहले गैर-फीचर फिल्म श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ कथन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। उनकी पहली निर्देशित फीचर फिल्म ‘आजमगढ़’ है, जिसमें पंकज त्रिपाठी मुख्य नकारात्मक भूमिका में हैं। आतंकवाद के विषय पर बनी इस फिल्म के अलावा कमलेश ने वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों पर ‘दिल्ली राइट्स- अ टेल ऑफ बर्न एंड ब्लेम’ नाम की डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है। उनकी पहली शॉर्ट फिल्म ‘किताब’ को भी वैश्विक स्तर पर पहचान मिली। पर्दे पर उतरा इतिहास, राष्ट्रीय मंच पर मिली रचनात्मकता को पहचान ‘काकोरी’ को मिले राष्ट्रीय पुरस्कार पर कमलेश के. मिश्र ने इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं बढ़कर अमर बलिदानियों को मिली श्रद्धांजलि बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार केवल किसी फिल्म या फिल्मकार का सम्मान नहीं, बल्कि इतिहास, समाज और संवेदनाओं को ईमानदारी से सामने रखने वाले रचनात्मक प्रयास की राष्ट्रीय स्वीकृति भी है। उन्होंने कहा कि काकोरी रेल एक्शन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण पड़ाव था और फिल्म का उद्देश्य इस ऐतिहासिक घटना को उचित महत्व के साथ आज की पीढ़ी तक पहुंचाना था। उन्होंने निर्माता जसविंदर सिंह, मिंटी मिश्रा, उत्तर प्रदेश सरकार तथा फिल्म के कलाकारों और तकनीशियनों का आभार जताते हुए इसे पूरी टीम की सामूहिक सफलता बताया। मिंटी मिश्रा के लिए यादगार हुआ ‘काकोरी’ का सफर निर्माता मिंटी मिश्रा ने कहा कि काकोरी जैसी ऐतिहासिक घटना पर बनी फिल्म का हिस्सा बनना उनके लिए पहले ही महत्वपूर्ण अनुभव था और राष्ट्रीय सम्मान ने इस पूरी यात्रा को और खास बना दिया। उन्होंने कहा कि काकोरी रेल एक्शन स्वतंत्रता आंदोलन का अहम अध्याय है। इसके क्रांतिकारियों के साहस, त्याग और बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है। फिल्म के जरिए इतिहास की इस महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित घटना को प्रमुखता से सामने लाने का प्रयास किया गया। कलम ने रचा कमाल, संजीव श्रीवास्तव के नाम स्वर्ण कमल राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में बिहार की उपलब्धि पर्दे और फिल्म निर्माण तक सीमित नहीं रही। सीतामढ़ी निवासी पत्रकार, लेखक और फिल्म समीक्षक संजीव श्रीवास्तव को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का स्वर्ण कमल प्रदान किया गया। श्री संजीव करीब ढाई दशक से दिल्ली में पत्रकारिता और फिल्मों पर लेखन कर रहे हैं। वह मुंबई में भी फिल्मों की रिपोर्टिंग कर चुके हैं। सिनेमा पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें ‘समय सिनेमा और इतिहास’, ‘सिनेमा की समानांतर दुनिया’ और ‘आपातकाल का सिनेमा’ प्रमुख हैं। उन्होंने इस सम्मान को गौरव का क्षण बताते हुए बिहार की चार हस्तियों को एक साथ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना महत्वपूर्ण उपलब्धि करार दिया।



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