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मोतिहारी। सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम को लेकर बैठकें होती हैं, ब्लैक स्पॉट चिह्नित करने के निर्देश दिए जाते हैं, सड़क सुरक्षा मानकों के पालन की बात होती है, थानाध्यक्षों से दुर्घटना संभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कराने को कहा जाता है और अगली बैठक में फिर रिपोर्ट मांगी जाती है लेकिन इन सबके बीच सड़क पर जिंदगी का हिसाब बदलता रहता है। हर बार की तरह इस बार भी समस्या और मुद्दे वही रहे, निराकरण के निर्देश भी लगभग पहले की तरह ही दिए गए। सवाल फिर वही है, यदि समस्या पहचानी जा चुकी है और समाधान के निर्देश बार-बार दिए जा रहे हैं तो दुर्घटनाओं की रफ्तार थम क्यों नहीं रही? इसी पृष्ठभूमि में गुरुवार को पूर्वी चंपारण में सांसद सड़क सुरक्षा समिति की बैठक हुई। पूर्वी चंपारण के सांसद राधा मोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में जनप्रतिनिधियों, पुलिस-प्रशासन, परिवहन विभाग, एनएचएआई, एनएच, आरसीडी और पथ निर्माण विभाग के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने, ब्लैक स्पॉट की पहचान एवं सुधार और सड़क सुरक्षा कार्ययोजना की समीक्षा की गई लेकिन बैठक की औपचारिकता से आगे सबसे बड़ा सवाल कार्रवाई की निरंतरता और परिणाम का है। बैठक में फिर ब्लैक स्पॉट, फिर निरीक्षण और फिर प्रस्ताव बैठक में दुर्घटना प्रवण क्षेत्रों और ब्लैक स्पॉट की समीक्षा की गई। संबंधित सड़क विभागों और थानाध्यक्षों को स्थल निरीक्षण कर दुर्घटनाओं में कमी लाने के उपायों से संबंधित प्रस्ताव अगली बैठक में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। सड़क सुरक्षा मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन, दुर्घटनाओं और मृत्यु दर में कमी के लिए विशिष्ट लक्ष्य निर्धारित करते हुए जिला सड़क सुरक्षा कार्ययोजना तैयार करने तथा उसके क्रियान्वयन की समीक्षा भी की गई। थानाध्यक्षों को ‘गुड सेमेरिटन’ यानी राह वीरों को चिह्नित कर उनकी सूची उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया। निर्देशों की सूची लंबी है। लेकिन सवाल यह है कि पिछली बैठकों में दिए गए निर्देशों का जमीन पर कितना असर हुआ? कितने ब्लैक स्पॉट वास्तव में सुधारे गए? कितने दुर्घटना संभावित मोड़ों पर इंजीनियरिंग सुधार हुए? कितनी जगह संकेतक, प्रकाश, क्रैश बैरियर, स्पीड नियंत्रण या पैदल यात्रियों की सुरक्षा के इंतजाम किए गए? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब सड़क पर दिखाई देना चाहिए। सड़क पर उतरते ही कागज की योजना की परीक्षा सड़क सुरक्षा केवल यातायात पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। सड़क की डिजाइन, मोड़, दृश्यता, डिवाइडर, संकेतक, प्रकाश, अतिक्रमण, पैदल यात्री सुविधाएं, वाहनों की गति, हेलमेट-सीट बेल्ट अनुपालन और आपातकालीन चिकित्सा सहायता, ये सभी दुर्घटना के जोखिम को प्रभावित करते हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय भी सड़क सुरक्षा को शिक्षा, इंजीनियरिंग, प्रवर्तन और आपातकालीन देखभाल के बहुआयामी दृष्टिकोण से देखता है। मंत्रालय ने दुर्घटना संभावित ब्लैक स्पॉट की पहचान और उनके सुधार को प्राथमिकता देने की व्यवस्था निर्धारित की है। मंत्रालय के प्रोटोकॉल में ब्लैक स्पॉट के लिए पहचान, जांच और सुधार की व्यवस्थित प्रक्रिया निर्धारित है। ऐसे स्थानों पर अल्पकालिक उपायों से लेकर स्थायी इंजीनियरिंग सुधार तक की व्यवस्था बताई गई है यानी समाधान की रूपरेखा नई नहीं है। चुनौती अब समाधान की घोषणा नहीं, उसके जमीन पर दिखाई देने की है। जिले की सड़कों पर पसरी ‘साइलेंट महामारी’ पूर्वी चंपारण में सड़क दुर्घटनाओं को लेकर सबसे गंभीर चिंता यही है कि दुर्घटना के बाद सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन दुर्घटना से पहले जोखिम को खत्म करने की गति उतनी स्पष्ट नहीं दिखती। हर दुर्घटना के बाद किसी मोड़, चौराहे, कट, पुलिया, बाजार या राजमार्ग के किसी हिस्से की चर्चा होती है। फिर निरीक्षण होता है। फिर रिपोर्ट और प्रस्ताव की बात आती है। फिर अगली बैठक का इंतजार शुरू हो जाता है। इस क्रम को तोड़ना जरूरी है क्योंकि सड़क दुर्घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं। एक दुर्घटना के साथ परिवार का कमाने वाला सदस्य जा सकता है, बच्चों की पढ़ाई रुक सकती है, किसी परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट सकती है और एक पूरी जिंदगी अपूरणीय क्षति में बदल सकती है इसीलिए जिले की सड़कों पर लगातार होने वाली मौतों को ‘साइलेंट महामारी’ कहना महज रूपक नहीं, बल्कि उस सामाजिक संकट की ओर संकेत है जो बिना किसी शोर के परिवारों को तोड़ता जा रहा है। इस बार समीक्षा से आगे परिणाम की जरूरत बैठक में सांसद राधा मोहन सिंह के अलावा मोतिहारी विधायक प्रमोद कुमार, हरसिद्धि विधायक कृष्णानंद पासवान, मधुबन विधायक राणा रणधीर, कल्याणपुर विधायक सचिंद्र प्रसाद सिंह, पिपरा विधायक श्याम बाबू प्रसाद यादव और नगर निगम मोतिहारी के डिप्टी मेयर लालबाबू प्रसाद गुप्ता मौजूद रहे। पुलिस अधीक्षक स्वर्ण प्रभात, अपर समाहर्ता मुकेश कुमार सिन्हा, जिला परिवहन पदाधिकारी निवेदिता सहित एनएचएआई, एनएच, आरसीडी और पथ निर्माण विभाग के अधिकारी तथा संबंधित थानों के थानाध्यक्ष भी बैठक में शामिल हुए। इतने विभागों और जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी अपने आप में यह बताती है कि सड़क सुरक्षा एक साझा प्रशासनिक जिम्मेदारी है। अब जरूरत इस बात की है कि अगली बैठक में केवल नए निर्देश न हों, बल्कि पिछले निर्देशों की अनुपालन रिपोर्ट भी सामने हो। कौन-सा ब्लैक स्पॉट सुधरा? कहां दुर्घटना घटाने के उपाय किए गए? कहां अभी भी खतरा बरकरार है? किस विभाग ने क्या किया? कहां काम लंबित है और क्यों? इन सवालों के जवाब यदि बैठक की मेज से निकलकर सड़क तक पहुंचते हैं, तभी सड़क सुरक्षा की बैठक अपने वास्तविक उद्देश्य तक पहुंचेगी वरना तारीख बदलती रहेगी, बैठक होती रहेगी, निर्देश दोहराए जाते रहेंगे और सड़क पर मौत की खामोश रफ्तार भी।



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