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वॉशिंगटन: ईरान के साथ युद्ध में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़े पैमाने पर हुए नुकसान, सैनिकों की मौत और एयर डिफेंस मिसाइलों के तेजी से घटते भंडार ने अमेरिका को फारस की खाड़ी में अपनी दशकों पुरानी सैन्य रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है और पेंटागन अब यह आकलन कर रहा है कि युद्ध खत्म होने के बाद खाड़ी देशों में पहले जितने सैनिक तथा सैन्य उपकरण रखना जरूरी होगा या उन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाकों में स्थानांतरित किया जाए। ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा विभाग खाड़ी क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी कम करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है। हालांकि, पेंटागन ने इसे अभी औपचारिक समीक्षा नहीं बताया है और सैनिकों की वापसी या पुनर्तैनाती पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। 40 हजार सैनिक और करीब 20 ठिकाने, फिर भी हमलों से नहीं बच सका अमेरिका अमेरिका सामान्य परिस्थितियों में जॉर्डन से ओमान तक फैले करीब 20 सैन्य प्रतिष्ठानों पर लगभग 40 हजार सैनिक तैनात रखता है। बहरीन में अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है जबकि कतर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में उसके प्रमुख एयरबेस एवं सैन्य परिसर मौजूद हैं। दशकों से इन्हीं ठिकानों के सहारे अमेरिका पश्चिम एशिया में सैन्य अभियान चलाता, समुद्री मार्गों की निगरानी करता और सहयोगी देशों को सुरक्षा का भरोसा देता रहा है। ईरान युद्ध ने, हालांकि, यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ये बड़े और स्थायी ठिकाने अब अमेरिकी ताकत के बजाय आसान निशाना बनते जा रहे हैं। 200 से ज्यादा सैन्य सुविधियां क्षतिग्रस्त होने का दावा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि युद्ध के दौरान ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों से 200 से अधिक अमेरिकी सैन्य सुविधाओं को नुकसान पहुंचा या वे पूरी तरह तबाह हो गईं। अमेरिकी ठिकानों पर लगातार हुए हमलों ने सैनिकों, विमान हैंगरों, संचार प्रणालियों, गोला-बारूद भंडार और आवासीय परिसरों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मार्च में कुवैत के शुएबा बंदरगाह स्थित एक अमेरिकी केंद्र पर हुए ड्रोन हमले में छह सैनिकों की मौत हुई थी। जांच में सामने आया था कि जिस अस्थायी इमारत में सैनिक मौजूद थे, उसमें हवाई हमले से बचाव के लिए पर्याप्त ऊपरी सुरक्षा नहीं थी। अमेरिकी सैन्य आंकड़ों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद कम से कम 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत और सैकड़ों के घायल होने की सूचना सामने आ चुकी है। हजार से ज्यादा इंटरसेप्टर दागे, पैट्रियट-थाड के भंडार पर दबाव ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों से सैन्य ठिकानों को बचाने के लिए अमेरिका को एक हजार से अधिक एयर डिफेंस इंटरसेप्टर दागने पड़े। इससे पैट्रियट और थाड जैसी महंगी और सीमित संख्या में उपलब्ध प्रणालियों के मिसाइल भंडार पर भारी दबाव पड़ा। युद्ध ने अमेरिका के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है—पहली, सैनिकों और ठिकानों को सस्ते ड्रोन तथा मिसाइलों से बचाना और दूसरी, हर हमले को रोकने के लिए बेहद महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें खर्च करने की मजबूरी। ठिकाने बचाए जाएं या सैनिक हटाए जाएं पेंटागन, ज्वाइंट स्टाफ और अमेरिकी सेंट्रल कमांड इस बात का आकलन कर रहे हैं कि क्षतिग्रस्त सैन्य ठिकानों को उसी स्थान पर दोबारा बनाया जाए, उन्हें छोटा किया जाए या सैनिकों तथा हथियारों को दूसरी जगह भेज दिया जाए। चर्चा में शामिल प्रस्तावों के अनुसार, खाड़ी देशों से कुछ सैनिकों और सैन्य उपकरणों को जॉर्डन, इजराइल या सऊदी अरब के लाल सागर तट के करीब तैनात किया जा सकता है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ये क्षेत्र ईरान की सीधी मिसाइल और ड्रोन पहुंच से अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हो सकते हैं। एक प्रस्ताव में कुवैत समेत कुछ खाड़ी ठिकानों से सैन्य संसाधनों को इजराइल के ओवदा एयरबेस भेजने की बात भी कही गई है। इसका प्रशासन के भीतर विरोध हो रहा है क्योंकि कुछ अधिकारियों को आशंका है कि इजराइल में अमेरिकी मौजूदगी बढ़ाने से संवेदनशील खुफिया सूचनाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव दोनों प्रभावित हो सकते हैं। ट्रम्प प्रशासन में दो खेमे अमेरिकी प्रशासन में सैन्य तैनाती को लेकर अलग-अलग राय है। एक पक्ष चाहता है कि पश्चिम एशिया में सैनिकों की संख्या घटाकर धन और सैन्य संसाधनों को अमेरिका की घरेलू सुरक्षा तथा चीन से बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर लगाया जाए। वहीं, दूसरा पक्ष मानता है कि खाड़ी देशों और इजराइल में मजबूत अमेरिकी मौजूदगी हटाने से क्षेत्र में वॉशिंगटन का प्रभाव कमजोर होगा और ईरान, रूस तथा चीन को अपना दायरा बढ़ाने का मौका मिल सकता है। खाड़ी देशों की सुरक्षा पर पड़ेगा सीधा असर यदि अमेरिका सैनिकों की संख्या में बड़ी कटौती करता है तो इसका सीधा असर सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा। ये देश लंबे समय से अमेरिकी सैनिकों, एयर डिफेंस सिस्टम, खुफिया नेटवर्क और युद्धक विमानों पर निर्भर रहे हैं। अमेरिकी सुरक्षा छतरी कमजोर होने पर खाड़ी देशों को अपने रक्षा बजट और सैन्य क्षमता में तेजी से बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। वे चीन, यूरोप या दूसरे देशों के साथ नए सुरक्षा समझौते भी तलाश सकते हैं। हालांकि, सैनिकों की संख्या कम होने का अर्थ अमेरिका और खाड़ी देशों के रक्षा संबंधों का अंत नहीं होगा। हथियारों की बिक्री, सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान जारी रह सकता है। युद्ध का खर्च 3.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान पेंटागन के अनुमान के मुताबिक, सितंबर 2026 के अंत तक ईरान युद्ध पर अमेरिका का खर्च 37.5 अरब डॉलर, यानी करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इस राशि में क्षतिग्रस्त ठिकानों के पुनर्निर्माण का पूरा खर्च शामिल नहीं है। ऐसे में अमेरिका के सामने सवाल केवल टूटे सैन्य ठिकानों की मरम्मत का नहीं है बल्कि यह भी है कि अरबों डॉलर खर्च करके उन्हीं संवेदनशील स्थानों पर फिर से निर्माण करना रणनीतिक रूप से समझदारी होगी या नहीं। आम लोगों पर क्यों पड़ेगा असर खाड़ी में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी घटने या ठिकानों के स्थानांतरण का असर केवल सैनिकों और सरकारों तक सीमित नहीं रहेगा। क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ने पर तेल उत्पादन, समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, माल ढुलाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। भारत सहित दुनिया के कई देश खाड़ी क्षेत्र से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस खरीदते हैं। इसलिए, अमेरिकी सैन्य रणनीति में कोई बड़ा बदलाव तेल बाजार, प्रवासी कामगारों की सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।



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