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नई दिल्ली, 14 मई (आईएनआई) पश्चिम एशिया युद्ध और हॉर्मुज स्ट्रेट में बाधा ने वैश्विक तेल बाजार को गहरे संकट में धकेल दिया है, जिससे तेल सप्लाई, कीमतों और दुनिया की आर्थिक स्थिरता पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) की जारी ऑयल मार्केट रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और हॉर्मुज स्ट्रेट में बाधा के कारण वैश्विक तेल सप्लाई सिस्टम पर अभूतपूर्व दबाव बना हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2026 में वैश्विक तेल मांग में सालाना 4.20 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट आ सकती है, जबकि सप्लाई में भारी कमी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता और महंगाई का खतरा लगातार बढ़ रहा है। आईईए के मुताबिक, अप्रैल 2026 तक वैश्विक तेल उत्पादन घटकर 9.51 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गया, जो फरवरी के बाद से 1.28 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कुल गिरावट को दर्शाता है। सबसे ज्यादा असर खाड़ी देशों पर पड़ा है, जहां हॉर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल उत्पादन और निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर जून से धीरे-धीरे सप्लाई बहाल भी होती है, तब भी 2026 में औसतन 39 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी बनी रह सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल बाजार में संकट इतना गहरा हो चुका है कि मार्च और अप्रैल के दौरान दुनिया भर के तेल भंडार रिकॉर्ड गति से घटे हैं। केवल अप्रैल में ही ऑन-लैंड स्टॉक्स में 17 करोड़ बैरल की गिरावट दर्ज की गई। ओईसीडी देशों के भंडार में 14.6 करोड़ बैरल की भारी कमी आई है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। आईईए ने चेतावनी दी है कि यह संकट केवल तेल की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डालेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, पेट्रोकेमिकल सेक्टर और एविएशन इंडस्ट्री सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। विमान ईंधन की मांग तेजी से गिरी है और कई देशों में एयर ट्रैफिक सामान्य स्तर से नीचे बना हुआ है। वहीं, पेट्रोकेमिकल उद्योग को कच्चे माल की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध शुरू होने के बाद तेल कीमतों में भारी उछाल आया। अप्रैल में नॉर्थ सी डेटेड क्रूड की औसत कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई जबकि महीने के दौरान कीमतों में लगभग 50 डॉलर प्रति बैरल तक का उतार-चढ़ाव देखा गया। इससे दुनिया भर में ईंधन महंगा हुआ और कई देशों में महंगाई का दबाव बढ़ गया। आईईए का अनुमान है कि वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में वैश्विक तेल मांग में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी। इस दौरान मांग में लगभग 24.5 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आ सकती है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) देशों में 9.3 लाख बैरल प्रतिदिन और गैर-ओईसीडी देशों में 15 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट का अनुमान जताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों पर भी इसका बड़ा असर पड़ा है। चीन के समुद्री तेल आयात फरवरी से अप्रैल के बीच 36 लाख बैरल प्रतिदिन तक घट गए जबकि भारत में एलपीजी की भारी कमी और लंबी कतारें देखने को मिलीं। भारत सरकार को पेट्रोल-डीजल कीमत नियंत्रित रखने के लिए भारी आर्थिक दबाव झेलना पड़ रहा है। आईईए ने यह भी कहा है कि यदि हॉर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बाधित रहता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव और गंभीर हो सकता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि सितंबर 2026 तक वैश्विक तेल भंडार में 90 करोड़ बैरल तक की कमी हो सकती है, जिसे भरने में कई वर्ष लग सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल ऊर्जा बाजार का संकट नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक अस्थिरता का संकेत है। ऐसे में आने वाले महीनों में तेल बाजार, महंगाई, परिवहन और औद्योगिक उत्पादन पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।