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मुंबई। टाटा संस में एन. चंद्रशेखरन की चेयरमैन पद पर अगले पांच साल के लिए दोबारा नियुक्ति को लेकर टाटा ट्रस्ट्स ने सवाल उठाते हुए आज कहा कि 17 सितंबर को हुई बोर्ड की बैठक में जरूरी समर्थन के अभाव में पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव कंपनी के नियमों के तहत वैध रूप से पारित नहीं हुआ। क्यों उठे नियुक्ति पर सवाल टाटा ट्रस्ट्स ने रविवार को बयान जारी कर कहा कि टाटा संस के बोर्ड में किसी प्रस्ताव को मंजूरी देने के लिए केवल अधिक वोट मिलना काफी नहीं है। कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए) यानी आंतरिक नियमों के तहत प्रस्ताव को टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत का समर्थन मिलना भी जरूरी है। टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। कंपनी के बोर्ड में ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशक हैं। दो निदेशकों में बहुमत का मतलब दोनों की मंजूरी है। एक निदेशक ने किया प्रस्ताव का विरोध बयान में कहा गया कि 17 सितंबर की बैठक में टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशकों में से एक ने श्री चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के खिलाफ वोट दिया। इस कारण प्रस्ताव को दोनों निदेशकों का जरूरी समर्थन नहीं मिला। ट्रस्ट्स ने दावा किया कि यह अनिवार्य शर्त पूरी नहीं होने के कारण पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव मंजूर नहीं माना जा सकता। कुल वोटों का आंकड़ा क्यों नहीं है अहम प्रस्ताव पर कुल मतदान 4:1 रहा हो या कोई दूसरा आंकड़ा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जरूरी यह था कि टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नामित निदेशक प्रस्ताव का समर्थन करें। एक निदेशक के विरोध के बाद यह शर्त पूरी नहीं हुई और प्रस्ताव उसी समय विफल हो गया। वोट पर भी उठाया सवाल ट्रस्ट्स ने कहा कि चेयरमैन वोट उस समय इस्तेमाल किया जाता है, जब किसी प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष में बराबर वोट पड़ें। बोर्ड के कुल वोट बराबर नहीं थे इसलिए चेयरमैन के वोट का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। ट्रस्ट्स का दावा है कि चेयरमैन के वोट के जरिए टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के जरूरी समर्थन की कमी भी पूरी नहीं की जा सकती। इसी आधार पर पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को शुरुआत से ही कानूनी रूप से निष्प्रभावी बताया गया है। ‘बैठक में कोई गतिरोध नहीं था’ ट्रस्ट्स की विज्ञप्ति में इस दलील को भी गलत बताया गया है कि एक निदेशक के विरोध से बोर्ड में गतिरोध पैदा हो गया था। बोर्ड के सामने एक प्रस्ताव आया और जरूरी समर्थन नहीं मिलने के कारण वह मंजूर नहीं हुआ। इसे गतिरोध नहीं, बल्कि कंपनी के नियमों के अनुसार लिया गया फैसला माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के पुराने मामले का उल्लेख ट्रस्ट्स ने साइरस मिस्त्री से जुड़े पुराने कानूनी मामले का भी हवाला दिया है। बताया गया है कि उस मामले में टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के विशेष मतदान अधिकारों पर सवाल उठे थे। उस समय टाटा संस ने इन अधिकारों का बचाव किया था। कंपनी ने इन्हें बहुमत शेयरधारक का वैध अधिकार बताया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) ने भी टाटा संस का पक्ष स्वीकार किया था। टाटा संस अब उन अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकती, जिन्हें बचाने के लिए उसने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा था। लिस्टिंग की जरूरत पर भी सवाल ट्रस्ट्स के बयान में टाटा संस की लिस्टिंग से कॉरपोरेट प्रशासन बेहतर होने के तर्क का भी विरोध किया गया है। इसमें कहा गया है कि कंपनी पहले से ही सार्वजनिक कंपनियों जैसे कई नियमों का पालन करती है। इनमें स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति, ऑडिट समिति, नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति, संबंधित पक्षों के लेनदेन के नियम और इनसाइडर ट्रेडिंग रोकने की आचार संहिता शामिल हैं। क्या हुआ था 17 सितंबर की बैठक में गौरतलब है कि टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन 20 फरवरी 2027 को मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद भी कंपनी की कमान संभालते रहेंगे क्योंकि निदेशकमंडल ने 17 सितंबर को उन्हें अगले पांच साल के लिए कार्यकारी चेयरमैन के रूप में फिर नियुक्त करने के प्रस्ताव को बहुमत से मंजूरी दे दी थी। बोर्ड के अनुरोध पर बदला फैसला श्री चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त को निदेशकमंडल को सूचित किया था कि वह 20 फरवरी 2027 को अपना मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद पुनर्नियुक्ति के लिए अपना नाम विचार के लिए नहीं रखेंगे। 17 सितंबर की बैठक में उन्होंने निदेशकमंडल के अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इसके बाद बोर्ड ने उनके मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति के बाद पांच साल के लिए कार्यकारी चेयरमैन के रूप में फिर नियुक्ति का प्रस्ताव पारित किया। हालांकि इस बैठक में श्री चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव निदेशकमंडल ने बहुमत से पारित किया था, सर्वसम्मति से नहीं।



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