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(सिविल सर्विसेज अभ्यर्थियों के लिए विशेष) नई दिल्ली। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त और 1 सितंबर 2026 को दो दिनों तक चले शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के 26वें शिखर सम्मेलन ने आतंकवाद से लेकर पश्चिम एशिया के संकट, रूस-यूक्रेन युद्ध, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और बदलती वैश्विक व्यवस्था तक कई बड़े मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि एससीओ को आतंकवाद के पूरे तंत्र को खत्म करने की दिशा में काम करना चाहिए जबकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सुरक्षा को संगठन की प्रमुख प्राथमिकता बनाने और आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद के खिलाफ मिलकर कार्रवाई करने की बात कही। सम्मेलन के दौरान श्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अलग-अलग मुलाकात कर युद्ध समाप्त करने, बातचीत और कूटनीति को बढ़ावा देने तथा समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने पर जोर दिया। पहले समझिए: आखिर एससीओ है क्या एससीओ यानी शंघाई सहयोग संगठन एक यूरेशियाई बहुपक्षीय संगठन है। इसकी औपचारिक स्थापना 15 जून 2001 को चीन के शंघाई शहर में हुई थी। इसके संस्थापक सदस्य चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान थे। एससीओ बनने से पहले चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान ‘शंघाई फाइव’ यानी ‘शंघाई पांच’ समूह का हिस्सा थे। यह व्यवस्था मुख्य रूप से सीमावर्ती इलाकों में सैन्य विश्वास बढ़ाने और तनाव कम करने के प्रयासों से विकसित हुई थी। बाद में उज्बेकिस्तान के जुड़ने के साथ 2001 में शंघाई सहयोग संगठन अस्तित्व में आया। एससीओ का चार्टर जून 2002 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में स्वीकार किया गया और सितंबर 2003 में प्रभावी हुआ। क्या है एससीओ का मकसद एससीओ का दायरा केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसके प्रमुख उद्देश्यों में सदस्य देशों के बीच आपसी विश्वास और अच्छे पड़ोसी संबंध बढ़ाना, क्षेत्रीय शांति और स्थिरता मजबूत करना, आतंकवाद-अलगाववाद-उग्रवाद से मिलकर लड़ना तथा आर्थिक, व्यापारिक, ऊर्जा, परिवहन, सांस्कृतिक और मानवीय सहयोग को बढ़ावा देना शामिल है। यही वजह है कि एससीओ को केवल सुरक्षा संगठन के रूप में देखना इसकी भूमिका को अधूरा समझना होगा। एससीओ में कितने सदस्य देश एससीओ में इस समय 10 पूर्ण सदस्य देश हैं- भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और बेलारूस। भारत और पाकिस्तान 2017 में पूर्ण सदस्य बने थे। ईरान को 2023 और बेलारूस को 2024 में पूर्ण सदस्यता मिली। भारत एससीओ का संस्थापक सदस्य नहीं है। भारत 2017 में इसका पूर्ण सदस्य बना था। सुरक्षा के मोर्चे पर ‘तीन बुराइयां’ सबसे बड़ी चुनौती एससीओ की सुरक्षा नीति में तीन खतरों को विशेष रूप से अहम माना जाता है- आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद। इन्हें आमतौर पर एससीओ की ‘तीन बुराइयां’ कहा जाता है। 26वें सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इन्हीं चुनौतियों को प्रमुखता दी। उन्होंने सदस्य देशों से सुरक्षा को प्राथमिकता देने और आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद के साथ सीमा-पार संगठित अपराध, नशीले पदार्थों की तस्करी और दूरसंचार धोखाधड़ी पर कार्रवाई करने को कहा। उन्होंने सूचना सुरक्षा, जैव सुरक्षा और बाहरी अंतरिक्ष की सुरक्षा में भी सहयोग बढ़ाने की बात कही। इससे साफ है कि एससीओ की सुरक्षा चिंताएं अब पारंपरिक आतंकवाद से आगे बढ़कर साइबर सुरक्षा, जैव सुरक्षा, संगठित अपराध और अंतरिक्ष सुरक्षा जैसे क्षेत्रों तक पहुंच चुकी हैं। मोदी का कड़ा संदेश: आतंकवादी ही नहीं, पूरा तंत्र खत्म करना होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में आतंकवाद सबसे प्रमुख मुद्दों में रहा। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल किसी घटना के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं रह सकती। इसके पूरे तंत्र को खत्म करने की जरूरत है। उन्होंने आतंकवाद के वित्तपोषण, आतंकियों की भर्ती, कट्टरपंथ और सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही। साथ ही उन देशों को कड़ा संदेश देने की जरूरत बताई जो आतंकवाद को अपनी नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करते हैं या आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने और समर्थन देते हैं। यह भारत की उस पुरानी नीति का विस्तार है जिसमें आतंकवाद को केवल आतंकवादी हमलों तक सीमित समस्या नहीं माना जाता, बल्कि उसके वित्तीय, वैचारिक और संस्थागत ढांचे को भी खत्म करने पर जोर दिया जाता है। पाकिस्तान की अध्यक्षता के बीच आतंकवाद पर भारत का संदेश 26वें सम्मेलन के बाद एससीओ की 2026-27 की अध्यक्षता पाकिस्तान को मिली। ऐसे समय में प्रधानमंत्री मोदी का आतंकवाद पर दिया गया संदेश और महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है। प्रधानमंत्री के संबोधन को इसी पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा गया है। यूपीएससी मुख्य परीक्षा में यहां यह विश्लेषण उपयोगी हो सकता है कि एससीओ भारत को ऐसा बहुपक्षीय मंच देता है, जहां चीन और पाकिस्तान की मौजूदगी के बावजूद भारत आतंकवाद पर अपना पक्ष सीधे और मजबूती से रख सकता है। अफगानिस्तान भी चर्चा के केंद्र में बिश्केक घोषणा में अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता की जरूरत पर जोर दिया गया। इसमें तालिबान प्रशासन से ऐसी समावेशी सरकार बनाने की अपील की गई, जिसमें अफगानिस्तान के अलग-अलग जातीय और राजनीतिक समूहों की भागीदारी हो। एससीओ के लिए अफगानिस्तान बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी भौगोलिक स्थिति मध्य और दक्षिण एशिया को जोड़ती है। अफगानिस्तान की अस्थिरता का असर आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क पर पड़ सकता है। ईरानी राष्ट्रपति से मुलाकात: शांति और समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर जोर एससीओ सम्मेलन से अलग प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की। ईरान में युद्ध शुरू होने के बाद भारत और ईरान के बीच यह पहली शीर्ष स्तरीय बैठक थी। श्री मोदी ने पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नागरिक और वाणिज्यिक समुद्री ढांचे, जहाजों तथा नाविकों को किसी भी परिस्थिति में नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। ईरान के राष्ट्रपति ने भारत से अपने व्यापक अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का इस्तेमाल बातचीत की प्रक्रिया में मदद के लिए करने का अनुरोध किया। उन्होंने बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दिया। भारत के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य इतना अहम क्यों यूपीएससी की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को समझना बेहद जरूरी है। यह पश्चिम एशिया का महत्वपूर्ण समुद्री संकरा रास्ता है और दुनिया के तेल एवं गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इस रास्ते से गुजरता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इसलिए इस समुद्री रास्ते में तनाव बढ़ने का असर कच्चे तेल की कीमत, भारत की महंगाई, चालू खाते और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। इसलिए, भारत का नौवहन की स्वतंत्रता पर जोर केवल कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा है। पुतिन से मोदी की मुलाकात: ‘अंतहीन युद्ध’ से बाहर निकले दुनिया रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र में चल रहे संघर्षों पर चर्चा की। श्री मोदी ने कहा कि दुनिया को मानवता के हित में ‘अंतहीन युद्ध’ से ‘युद्ध के अंत’ की ओर बढ़ना चाहिए। दोनों नेताओं ने इस बात पर भी चर्चा की कि पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र के संघर्षों ने समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को प्रभावित किया है। श्री मोदी ने एक बार फिर दोहराया कि संघर्षों को सुलझाने का रास्ता बातचीत और कूटनीति से होकर जाता है। भारत-रूस रिश्तों की भी हुई समीक्षा मोदी और पुतिन ने भारत-रूस ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ की भी समीक्षा की। दोनों नेताओं ने ऊर्जा, नवाचार, अंतरिक्ष, उर्वरक और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में प्रगति पर संतोष जताया। रूस में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या पिछले एक दशक में करीब सात गुना बढ़कर लगभग 40 हजार हो चुकी है। श्री पुतिन ने दोनों देशों के व्यापार में दो प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि और 2025 में पर्यटकों के आदान-प्रदान में 16 प्रतिशत बढ़ोतरी का भी जिक्र किया। बहुध्रुवीय दुनिया में एससीओ की बढ़ती अहमियत एससीओ खुद को किसी सैन्य गठबंधन के रूप में पेश नहीं करता। इसकी बुनियाद संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, गैर-हस्तक्षेप, आपसी सम्मान और समानता जैसे सिद्धांतों पर रखी गई है। लेकिन, भू-राजनीतिक नजरिए से इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के प्रमुख देश एक ही संगठन में मौजूद हैं। यही वजह है कि एससीओ आज वैश्विक दक्षिण, यूरेशिया और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था से जुड़ी चर्चाओं में महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है। क्या है ‘शंघाई भावना’ एससीओ की मूल सोच को ‘शंघाई भावना’ (शंघाई स्पिरिट) कहा जाता है। इसका आधार आपसी विश्वास, आपसी लाभ, समानता, सलाह-मशविरा, सांस्कृतिक विविधता का सम्मान और साझा विकास है। यूपीएससी के लिए ‘शंघाई भावना’ महत्वपूर्ण शब्द है और एससीओ के सिद्धांतों से जुड़े सवाल में इसका इस्तेमाल उत्तर को बेहतर बना सकता है। भारत के लिए एससीओ क्यों महत्वपूर्ण भारत के लिए एससीओ कई वजहों से अहम है। इसके जरिए भारत को मध्य एशिया तक राजनीतिक और रणनीतिक पहुंच , आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ बहुपक्षीय सहयोग, रूस और चीन जैसे देशों के साथ एक साझा मंच तथा ऊर्जा सुरक्षा, अफगानिस्तान और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषयों पर बातचीत का अवसर मिलता है। लेकिन चुनौतियां भी हैं। चीन के साथ सीमा से जुड़े मतभेद, पाकिस्तान के साथ आतंकवाद का मुद्दा, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भारत की आपत्ति और चीन-रूस की बढ़ती नजदीकी एससीओ के भीतर भारत के लिए कई रणनीतिक चुनौतियां पैदा करती हैं।इसीलिए एससीओ में भारत की भूमिका को उसकी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति से जोड़कर समझा जा सकता है यानी किसी एक शक्ति गुट का हिस्सा बने बिना अलग-अलग देशों और मंचों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाना। यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा के लिए ये तथ्य याद रखें पूरा नाम: शंघाई सहयोग संगठन स्थापना: 15 जून 2001 स्थापना स्थल: शंघाई, चीन 26वां शिखर सम्मेलन: बिश्केक, किर्गिस्तान सम्मेलन की तारीख: 31 अगस्त और 1 सितंबर 2026 2026 की खासियत: एससीओ की स्थापना के 25 वर्ष पूरे संस्थापक सदस्य: चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान भारत पूर्ण सदस्य बना: 2017 पूर्ण सदस्यों की संख्या: 10 सदस्य: भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और बेलारूस मुख्य सुरक्षा चिंताएं: आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय: राष्ट्राध्यक्षों की परिषद एससीओ सचिवालय: बीजिंग, चीन मूल अवधारणा: शंघाई भावना यूपीएससी मुख्य परीक्षा में कैसे बन सकता है सवाल इस घटनाक्रम से मुख्य परीक्षा में सवाल इस तरह पूछा जा सकता है— “शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मंच नहीं बल्कि बदलती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में रणनीतिक हितों को साधने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। चर्चा कीजिए।” इसके उत्तर में आतंकवाद, अफगानिस्तान, मध्य एशिया, ऊर्जा सुरक्षा, ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य, रूस के साथ संबंध, चीन-पाकिस्तान चुनौती, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को जोड़कर एक संतुलित उत्तर तैयार किया जा सकता है। निष्कर्ष: एससीओ अब सिर्फ मध्य एशिया की कहानी नहीं 2001 में अस्तित्व में आया एससीओ आज 10 सदस्य देशों वाला बड़ा यूरेशियाई मंच बन चुका है। इसके एजेंडे में आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ युद्ध, समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, साइबर अपराध, आर्थिक सहयोग और बदलती वैश्विक व्यवस्था जैसे मुद्दे भी शामिल हो चुके हैं। दो दिनों तक चले 26वें बिश्केक शिखर सम्मेलन ने इसी बदलती भूमिका को सामने रखा। भारत ने एक तरफ आतंकवाद के पूरे तंत्र को खत्म करने की मांग की, तो दूसरी तरफ ईरान और रूस के साथ बातचीत में युद्ध समाप्त करने, समुद्री रास्तों की सुरक्षा और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया। एससीओ भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षीय कूटनीति और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में उसकी भूमिका को समझने का एक बेहद महत्वपूर्ण विषय है।