Full Story
माटी का श्रृंगार : श्रृंखला–12 नोएडा (यूपी)। यदि पश्चिम बंगाल का बांकुरा टेराकोटा घोड़ा भारतीय हस्तशिल्प का राष्ट्रीय प्रतीक है, मिथिला का मिट्टी का घोड़ा लोकआस्था का दूत है, तो तमिलनाडु के अय्यनार टेराकोटा घोड़े भारतीय लोकविश्वास की सबसे विराट और जीवंत अभिव्यक्ति हैं। दक्षिण भारत के गाँवों में सड़क किनारे खड़े 5 फीट से लेकर 20–30 फीट तक ऊँचे ये विशाल घोड़े केवल शिल्पकला के नमूने नहीं, बल्कि ग्रामरक्षक देवता अय्यनार के दिव्य वाहन और ग्रामीण संस्कृति के मौन प्रहरी हैं। तमिलनाडु के पुदुकोट्टई, शिवगंगा, तंजावुर, तिरुचिरापल्ली, करूर, सलेम, डिंडीगुल, मदुरै और रामनाथपुरम जिलों में आज भी यह परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ जीवित है। गांव की सीमा पर बने खुले मंदिरों (जिन्हें स्थानीय भाषा में 'काट्टु कोविल' कहा जाता है) में स्थापित ये घोड़े लोकआस्था, कला और सामुदायिक जीवन का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं। एक हजार वर्षों से जीवित परंपरा इतिहासकारों के अनुसार अय्यनार टेराकोटा की परंपरा लगभग 1,000 से 1,200 वर्ष पुरानी है, जिसका विकास चोल और पांड्य काल में हुआ। यद्यपि लोकदेवता अय्यनार की पूजा इससे भी अधिक प्राचीन मानी जाती है, किंतु विशाल टेराकोटा घोड़ों की परंपरा दक्षिण भारतीय ग्राम संस्कृति के साथ मध्यकाल में व्यापक रूप से विकसित हुई। विशेषज्ञ मानते हैं कि तमिलनाडु में हजारों अय्यनार मंदिर हैं, जिनमें से अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें स्थापित टेराकोटा घोड़ों की कुल संख्या लाखों में आंकी जाती है। प्रत्येक वर्ष सैकड़ों नए घोड़े श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए जाते हैं, जबकि पुराने घोड़े प्राकृतिक रूप से मिट्टी में विलीन हो जाते हैं। यही पुनर्जन्म इस परंपरा को निरंतर जीवित रखता है। अय्यनार : गांव के रक्षक देवता लोकमान्यता है कि अय्यनार रात्रि के समय अपने विशाल घोड़ों पर सवार होकर पूरे गांव की परिक्रमा करते हैं और उसे महामारी, प्राकृतिक आपदाओं तथा दुष्ट शक्तियों से सुरक्षित रखते हैं। अच्छी वर्षा, समृद्ध फसल, पशुधन की रक्षा, संतान प्राप्ति और मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु अय्यनार को मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और सामुदायिक जीवन के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है। इलंगुडीपट्टी : जहां हजारों घोड़े करते हैं पहरेदारी तमिलनाडु के पुदुकोट्टई जिले का इलंगुडीपट्टी गांव इस परंपरा का सबसे प्रभावशाली केंद्र माना जाता है। गांव की ओर जाने वाली लगभग 700 मीटर लंबी सड़क के दोनों ओर हजारों टेराकोटा घोड़े कतारबद्ध दिखाई देते हैं। कहीं दो-दो, कहीं चार-चार की पंक्तियों में सजे ये घोड़े किसी अदृश्य सेना की तरह गांव की रक्षा करते प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार पुदुकोट्टई, शिवगंगा और तंजावुर के अनेक गांवों में विशाल अय्यनार मंदिर परिसर सैकड़ों टेराकोटा प्रतिमाओं से भरे हुए हैं, जिन्हें देखने देश-विदेश से शोधकर्ता और पर्यटक पहुंचते हैं। निर्माण प्रक्रिया : जब मिट्टी बनती है प्रहरी अय्यनार के घोड़ों का निर्माण मुख्यतः वेलार (कुम्हार) समुदाय करता है। यह केवल हस्तशिल्प नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन से जुड़ी सामुदायिक प्रक्रिया है। चिकनी मिट्टी में रेत, धान की भूसी तथा रेशेदार जैविक पदार्थ मिलाकर उसे अधिक मजबूत बनाया जाता है। विशाल घोड़े का प्रत्येक भाग पैर, धड़, गर्दन और सिर को अलग-अलग तैयार किया जाता है। धूप में कई दिनों तक सुखाने के बाद इन्हें पारंपरिक भट्ठी में 700 से 900 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पकाया जाता है। इसके बाद लाल, सफेद, पीले, हरे और नीले रंगों से चित्रांकन किया जाता है। सबसे बड़े घोड़ों की ऊंचाई 20 से 30 फुट तक पहुंच जाती है, जबकि सामान्य पूजा हेतु बनाए जाने वाले घोड़े 5 से 10 फुट ऊंचे होते हैं। कारीगर और आजीविका तमिलनाडु में इस परंपरा से जुड़े सैकड़ों वेलार (कुम्हार) परिवार आज भी सक्रिय हैं। केवल पुदुकोट्टई और शिवगंगा क्षेत्र में ही अनेक गांवों के कारीगर प्रत्येक वर्ष हजारों टेराकोटा प्रतिमाएं तैयार करते हैं। राज्य सरकार, तमिलनाडु हैंडीक्राफ्ट्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), वस्त्र मंत्रालय तथा विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षण, डिज़ाइन विकास और विपणन सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। प्रमुख उत्पाद अय्यनार परंपरा केवल घोड़ों तक सीमित नहीं है। यहाँ निर्मित प्रमुख टेराकोटा उत्पादों में विशाल अय्यनार घोड़े, हाथी एवं बैल, योद्धाओं की प्रतिमाएं, ग्रामदेवताओं की मूर्तियां, दीप स्तंभ, मंदिर अलंकरण, आधुनिक सजावटी टेराकोटा कलाकृतियां शामिल हैं। आज इनका उपयोग धार्मिक स्थलों के साथ-साथ रिसॉर्ट, उद्यान, संग्रहालय और आधुनिक स्थापत्य सज्जा में भी होने लगा है। पर्यटन और वैश्विक पहचान यद्यपि अय्यनार टेराकोटा मुख्यतः धार्मिक परंपरा से जुड़ा शिल्प है, फिर भी यह दक्षिण भारत के सांस्कृतिक पर्यटन का महत्वपूर्ण आकर्षण बन चुका है। चेन्नई, महाबलीपुरम, मदुरै और पुदुकोट्टई आने वाले हजारों देशी-विदेशी पर्यटक इन विशाल टेराकोटा घोड़ों को देखने विशेष रूप से पहुंचते हैं। भारतीय हस्तशिल्प मेलों और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भी अय्यनार शैली की लघु प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। चुनौतियां अभी भी शेष आधुनिक सीमेंट, फाइबर और प्लास्टर की मूर्तियों का बढ़ता उपयोग, गुणवत्तापूर्ण मिट्टी की उपलब्धता में कमी, पारंपरिक भट्ठियों की लागत तथा युवा पीढ़ी का अन्य व्यवसायों की ओर रुझान इस प्राचीन कला के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस परंपरा को जीआई टैग, सांस्कृतिक पर्यटन, डिज़ाइन नवाचार और अंतरराष्ट्रीय विपणन से व्यापक रूप से जोड़ा जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और भारतीय लोककला दोनों को नई ऊर्जा प्रदान कर सकती है। माटी का अमर श्रृंगार अय्यनार के टेराकोटा घोड़े हमें यह सिखाते हैं कि मिट्टी केवल आकार नहीं लेती, वह विश्वास का रूप धारण करती है। इन विशाल घोड़ों में भारतीय लोकजीवन की सरलता, कृषि संस्कृति का आत्मविश्वास, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक एकता का दर्शन एक साथ दिखाई देता है। जब किसी गांव की सीमा पर अय्यनार का टेराकोटा घोड़ा प्रहरी बनकर खड़ा होता है, तब वहां केवल एक मूर्ति नहीं होती, वहां एक हजार वर्षों की परंपरा, सैकड़ों कुम्हार परिवारों का श्रम, लाखों ग्रामीणों की आस्था और भारतीय सभ्यता की अमर सांस्कृतिक चेतना एक साथ उपस्थित होती है। यही है "माटी का श्रृंगार", जहाँ मिट्टी केवल शिल्प नहीं बनती, बल्कि संस्कृति की प्रहरी, लोकविश्वास की भाषा और भारतीय आत्मा की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति बन जाती है।



Comments
0