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सूरज कुमार सिंह नई दिल्ली/कोहिमा। कल्पना कीजिए एक ऐसे पहाड़ी गांव की, जहां सुबह की पहली किरणें घने जंगलों के बीच बसे लकड़ी के घरों को सुनहरा बना देती हैं.. दूर पहाड़ियों से ढोल की धीमी आवाज सुनाई देती है… गांव के बुज़ुर्गों के चेहरे पर बने गहरे टैटू उनके जीवन की वीरगाथा सुनाते हैं, यह कोई कहानी नहीं बल्कि भारत के पूर्वोत्तर में रहने वाली कोन्याक जनजाति की जीवंत विरासत है। यदि भारत की जनजातीय संस्कृति की सबसे अनोखी तस्वीर बनाई जाए, तो उसमें कोन्याक जनजाति अवश्य शामिल होगी। इन्हें दुनिया भर में "द लास्ट टैटूड हेडहंटर्स" यानी आखिरी टैटूधारी योद्धा के रूप में जाना जाता है। हालांकि यह पहचान उनके अतीत से जुड़ी है; आज वे शांतिपूर्ण, शिक्षित और अपनी विरासत को सहेजने वाला समाज हैं। कोन्याक जनजाति का पारंपरिक ज्ञान बना वैज्ञानिकों के लिए नई उम्मीद यह जनजाति एक बार फिर चर्चा में तब आ गई जब उनके पांच जड़ी-बूटियों के मिश्रण को कैंसर के इलाज के लिए अचूक नुस्खा माना गया। हाल ही में नगालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस जनजाति द्वारा पीढ़ियों से इस्तेमाल किए जा रहे एक पारंपरिक पांच जड़ी-बूटियों के मिश्रण का अध्ययन किया। शुरुआती वैज्ञानिक शोध में पाया गया कि इस हर्बल फॉर्मूलेशन में ऐसे जैव-सक्रिय (बायोएक्टिव) तत्व मौजूद हैं, जो VEGFR2 नामक एक महत्वपूर्ण प्रोटीन को प्रभावित कर सकते हैं। यह प्रोटीन शरीर में ट्यूमर तक नई रक्त वाहिकाएँ पहुँचाने में अहम भूमिका निभाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस प्राचीन नुस्खे पर आगे और गहन शोध तथा क्लीनिकल परीक्षण सफल होते हैं तो भविष्य में कैंसर के उपचार के लिए नई दवाएँ विकसित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि यह शोध अभी शुरुआती चरण में है और इसे वर्तमान समय में कैंसर का प्रमाणित इलाज नहीं माना जा सकता। फिर भी यह खोज इस बात का शानदार उदाहरण है कि भारत की जनजातियों का पारंपरिक ज्ञान आधुनिक विज्ञान के लिए कितनी मूल्यवान धरोहर बन सकता है। कहां बसती है कोन्याक जनजाति कोन्याक जनजाति मुख्य रूप से नगालैंड के मोन जिले में निवास करती है। यह जिला भारत और म्यांमार की सीमा से लगा हुआ है। ऊंची-नीची पहाड़ियां, घने जंगल, बांस के वन और बादलों से घिरी घाटियां इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को अद्भुत बना देती हैं। यहां बसे गांव आज भी पारंपरिक जीवन और आधुनिक विकास का अनोखा मेल प्रस्तुत करते हैं। लकड़ी के घर, सामुदायिक भवन, खेत और पहाड़ी रास्ते इस जनजाति के प्रकृति-आधारित जीवन की झलक दिखाते हैं। भाषा और शिक्षा कोन्याक लोग अपनी मातृभाषा कोन्याक बोलते हैं। इसके अलावा नागामीज और अंग्रेजी का भी व्यापक उपयोग होता है। कोन्याक गांवों में एक विशेष सामुदायिक भवन होता था, जिसे मोरुंग कहा जाता है। यह केवल युवाओं के रहने की जगह नहीं थी बल्कि एक तरह का गुरुकुल था। यहीं उन्हें युद्धकला, शिकार, लोककथाएं, संगीत, अनुशासन, सामाजिक नियम और समुदाय की परंपराएं सिखाई जाती थीं। गांव के विशाल लकड़ी के नगाड़े भी अक्सर मोरुंग में रखे जाते थे, जिनकी आवाज़ दूर-दूर तक सुनाई देती थी और संकट या उत्सव का संदेश देती थी। अंघ : सिर्फ मुखिया नहीं, एक जीवित संस्था कोन्याक समाज में गांव का प्रमुख अंघ कहलाता है। अंघ केवल प्रशासनिक प्रमुख नहीं होता बल्कि सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र भी माना जाता था। कई बार एक ही अंघ कई गांवों का नेतृत्व करता था। उसका घर गांव की सबसे बड़ी और सबसे प्रतिष्ठित इमारत होता था। आज भी कई गांवों में यह परंपरा सम्मान के साथ जीवित है। टैटू: शरीर पर लिखी जीवनी कोन्याक समाज में टैटू फैशन नहीं, बल्कि पहचान थे। पुरुषों के चेहरे, छाती और हाथों पर बने टैटू उनके साहस, उपलब्धियों और सामाजिक सम्मान का प्रतीक होते थे। हर व्यक्ति टैटू नहीं बनवा सकता था। उन्हें विशेष उपलब्धियों के बाद ही यह अधिकार मिलता था। महिलाओं के टैटू अलग अर्थ रखते थे और अक्सर परिवार, वैवाहिक स्थिति या सांस्कृतिक पहचान से जुड़े होते थे। आज ये टैटू केवल बुज़ुर्गों के शरीर पर दिखाई देते हैं और एक जीवित इतिहास माने जाते हैं। केवल योद्धा नहीं, कुशल शिल्पकार भी बहुत कम लोग जानते हैं कि कोन्याक जनजाति धातुकर्म और शिल्पकला में भी बेहद दक्ष रही है। वे लोहे को गलाकर दाओ (पारंपरिक बड़ी धारदार छुरी), भाले और अन्य औज़ार बनाते थे। वे पीतल के गहने, लकड़ी की नक्काशी, मोतियों के आभूषण और बाँस से उपयोगी वस्तुएँ तैयार करने में भी माहिर हैं। ऐतिहासिक रूप से वे स्थानीय स्तर पर बंदूकें और बारूद बनाने की तकनीक भी जानते थे, जो उन्हें अन्य नागा समुदायों से अलग पहचान देती थी। घर भी बताते हैं इतिहास कोन्याक लोगों के पारंपरिक घर केवल रहने की जगह नहीं होते थे। इन घरों के मुख्य द्वारों पर भैंस के सींग, लकड़ी की कलात्मक नक्काशी और अन्य प्रतीक लगाए जाते थे, जो परिवार की प्रतिष्ठा और सामाजिक पहचान दर्शाते थे। गांव की वास्तुकला में लकड़ी और बांस का व्यापक उपयोग होता है, जिससे घर प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल बने रहते हैं। आओलियांग: जब पूरा गांव रंगों में डूब जाता है अप्रैल के पहले सप्ताह में मनाया जाने वाला आओलियांग कोन्याकों का सबसे बड़ा त्योहार है। यह केवल नया वर्ष या नई फसल का स्वागत नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति का उत्सव है। बदलता समाज, लेकिन नहीं बदली पहचान 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शिक्षा, ईसाई धर्म और आधुनिक प्रशासन के प्रभाव से कोन्याक समाज में बड़ा परिवर्तन आया। आज अधिकांश लोग खेती, शिक्षा, सरकारी सेवाओं, व्यापार और पर्यटन से जुड़े हैं। फिर भी वे अपनी भाषा, लोककथाएं, हस्तशिल्प, पारंपरिक संगीत और त्योहारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। आधुनिक चर्च की घंटियां और पारंपरिक लकड़ी के नगाड़े, दोनों आज भी इस समाज की पहचान हैं।