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मुंबई। अभिनेत्री कुब्रा सैत ने एडीएचडी के साथ अपनी जिंदगी के अनुभव साझा करते हुए कहा कि यह स्थिति जहां कई बार थका देने वाली और अराजक महसूस होती है, वहीं यही उनकी रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति और कामयाबी की सबसे बड़ी ‘सुपरपावर’ भी है। कुब्रा ने कहा कि स्कूल के दिनों में जब दूसरे बच्चे मैथ्स के सवाल हल कर रहे होते थे तब उनका ज़ेहन किसी मर्डर मिस्ट्री की कहानी, अवॉर्ड स्पीच या फिर कल्पनाओं की दूसरी दुनिया में घूम रहा होता था। यही वजह थी कि उन्हें अक्सर ध्यान लगाने की नसीहतें सुननी पड़ती थीं। उन्होंने बताया कि बड़े होने पर जब उन्हें एडीएचडी के बारे में पता चला तब ज़िंदगी की कई उलझी हुई बातें समझ आने लगीं। अधूरे प्रोजेक्ट्स, एक काम में घंटों तक खो जाना, ब्राउजर में दर्जनों टैब खुले रखना या कमरे में आने का मकसद भूल जाना—ये सब उसी का हिस्सा था। अभिनेत्री ने मजाकिया अंदाज़ में कहा कि उनका दिमाग कभी चाबियां गुम कर देता है लेकिन सालों पुरानी तारीफें और बातें याद रखता है। यही दिमाग नई दुनिया रच सकता है, कहानियां लिख सकता है, बिजनेस शुरू कर सकता है और रचनात्मक सोच को नई उड़ान दे सकता है। एडीएचडी को चुनौती और ताकत दोनों बताते हुए कुब्रा ने कहा, “यह थका देने वाला है, थोड़ा बेतरतीब भी है और कभी-कभी महंगा भी पड़ सकता है, लेकिन यही मेरी सुपरपावर भी है।” वीडियो के आखिर में कुब्रा अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज में कहा कि वह सिर्फ एक मैसेज का जवाब देने के लिए फोन उठाई थीं लेकिन देखते ही देखते पूरी रील बना डाली। कुब्रा सैत की यह ईमानदार बातचीत न्यूरोडायवर्सिटी को लेकर जागरूकता बढ़ाने का अहम संदेश देती है। उनका मानना है कि एडीएचडी चुनौतियां जरूर लाता है, लेकिन सही समझ और स्वीकार्यता के साथ यही रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति और हौसले की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।



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