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ग्लासगो/नई दिल्ली। कभी किसी ने नहीं सोचा होगा कि महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव का वह मासूम बच्चा, जिसने पांच-छह साल की उम्र में एक हादसे में अपना दाहिना हाथ खो दिया था, एक दिन पूरी दुनिया के सामने भारत का तिरंगा सबसे ऊंचा लहराएगा लेकिन जिंदगी जब किसी को परखती है तो उसी के भीतर एक नया विजेता भी जन्म लेता है। राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ गेम्स) 2026 में पुरुषों की पैरा 100 मीटर टी47 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले दिलीप महादु गावित की कहानी सिर्फ एक एथलीट की नहीं बल्कि अदम्य साहस, संघर्ष और अटूट विश्वास की कहानी है। कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐसा दौड़े कि इतिहास बन गया कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के सातवें दिन जब पुरुषों की 100 मीटर टी47 फाइनल रेस शुरू हुई तो सभी की नजरें ट्रैक पर थीं। स्टार्टिंग गन बजते ही दिलीप बिजली की रफ्तार से दौड़े। कुछ ही सेकेंड में उन्होंने अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। 10.71 सेकेंड में फिनिश लाइन पार करते ही स्कोरबोर्ड पर उनका नाम सबसे ऊपर चमक उठा। यह सिर्फ गोल्ड मेडल नहीं था। उन्होंने नया गेम्स रिकॉर्ड भी बना दिया और सीजन का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। एक हादसा जिसने जिंदगी बदल दी महाराष्ट्र के नासिक के पास बसे तोरण डोंगरी गांव में किसान परिवार में जन्मे दिलीप का बचपन भी दूसरे ग्रामीण बच्चों की तरह खेत-खलिहानों में बीता। माता-पिता के साथ खेतों में जाना, पेड़ों पर चढ़ना और दोस्तों के साथ खेलना उनकी दिनचर्या थी लेकिन एक दिन पेड़ पर चढ़ते समय हुई एक छोटी-सी गलती ने पूरी जिंदगी बदल दी। वह पेड़ से गिर पड़े और उनके दाहिने हाथ में गंभीर चोट लग गई। समय पर इलाज नहीं मिला। धीरे-धीरे जख्म गैंगरीन में बदल गया और डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए कोहनी के नीचे से पूरा हाथ काटना पड़ा। एक बच्चे के लिए यह केवल हाथ खोना नहीं था बल्कि जिंदगी के तमाम सपनों के बिखर जाने जैसा था। हार नहीं मानी, दर्द को ही ताकत बना लिया जिस उम्र में बच्चे अपने भविष्य के सपने देखते हैं उस उम्र में दिलीप ने जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा देख ली थी। लेकिन, उन्होंने अपनी कमजोरी को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने दौड़ना शुरू किया। कोई सिंथेटिक ट्रैक नहीं था, कोई आधुनिक सुविधा नहीं थी। गांव की कच्ची सड़कें ही उनका स्टेडियम थीं और खेतों के रास्ते ही उनकी अभ्यास की ट्रैक। हर सुबह सूरज निकलने से पहले दौड़ शुरू होती और शाम तक पसीना बहता। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास लौटने लगा। जब एक कोच ने पहचानी असली प्रतिभा दिलीप की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब कोच वैजनाथ काले की नजर उन पर पड़ी। कोच ने उनकी रफ्तार देखी और समझ लिया कि यह लड़का सामान्य नहीं है। उन्होंने दिलीप को पेशेवर प्रशिक्षण देना शुरू किया। गांव की पगडंडियों पर दौड़ने वाला यह युवक अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए तैयार होने लगा। यहीं से शुरू हुआ उस सफर का नया अध्याय, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचा दिया। देश के लिए तीसरा गोल्ड, करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा दिलीप गावित की जीत के साथ भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अपना तीसरा स्वर्ण पदक हासिल किया। दिलीप से पहले भारत के लिए महिलाओं के पैरा शॉटपुट एफ57 इवेंट में शर्मिला धनकड़ और रविवार को वेटलिफ्टिंग के 48 किलोग्राम इवेंट में मीराबाई चानू गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। अभी तक भारत के खाते में 3 गोल्ड, 9 सिल्वर और 3 ब्रॉन्ज समेत कुल 15 मेडल हो गए हैं। इसके साथ ही भारतीय टीम मेडल टैली में आठवें स्थान पर पहुंच गई।