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काठमांडू। नेपाल में 26 अगस्त की विनाशकारी भोटेकोशी बाढ़ के घाव अभी भरे भी नहीं हैं कि सरकार के सामने अब पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर जुटाने की चुनौती खड़ी हो गई है। काठमांडू अनुदान और अंतरराष्ट्रीय सहायता को प्राथमिकता देना चाहता है, लेकिन तबाही का बढ़ता आकार संकेत दे रहा है कि केवल अनुदान से पुनर्निर्माण संभव नहीं होगा और नेपाल को आसान शर्तों वाले ऋण का सहारा लेना पड़ सकता है। राष्ट्रीय योजना आयोग ने आपदा के बाद की जरूरतों का विस्तृत आकलन शुरू कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार पांच सप्ताह में आने वाली यह रिपोर्ट न केवल बाढ़ से हुई वास्तविक तबाही का आकलन करेगी, बल्कि अगले कई वर्षों में पुनर्निर्माण और पुनर्वास के लिए आवश्यक धन की तस्वीर भी सामने रखेगी। नेपाल की सरकार इस रिपोर्ट को प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय दाता सम्मेलन का आधार बनाने की तैयारी में है। त्वरित क्षति एवं आवश्यकता आकलन में सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को हुआ नुकसान पहले ही 400 अरब नेपाली रुपये से अधिक आंका जा चुका है। करीब 7,570 घर नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए हैं और 32,933 लोग प्रभावित बताए गए हैं। अधिकारियों का अनुमान है कि विस्तृत आकलन में नुकसान का आंकड़ा शुरुआती अनुमान से कम से कम 30 प्रतिशत अधिक हो सकता है। ऐसे में पुनर्निर्माण की जरूरत 4 से 5 अरब डॉलर तक पहुंचने की आशंका है। 1,377 मौतें, 5,326 लोग अब भी लापता 26 अगस्त को लांगटांग लिरुंग पर्वत की उत्तरी ढलानों पर विशाल ग्लेशियर के ढहने के बाद भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट और धादिंग समेत कई इलाकों में व्यापक तबाही मचाई। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक कम से कम 1,377 लोगों की मौत की पुष्टि, 5,326 लोगों के लापता होने और 6,827 लोगों के घायल होने की सूचना है। बाढ़ ने केवल घरों और सड़कों को नहीं बहाया, बल्कि नेपाल की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण रीढ़ मानी जाने वाली जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में स्थित परियोजनाओं को हुए नुकसान का प्रारंभिक अनुमान ही 25 से 30 अरब नेपाली रुपये लगाया गया है। स्वतंत्र विद्युत उत्पादक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष उत्तम ब्लोन के मुताबिक रसुवा और नुवाकोट में कम से कम एक दर्जन परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं। हालांकि खोज और बचाव अभियान जारी रहने के कारण वास्तविक नुकसान का आकलन अभी संभव नहीं हो पाया है। सरकार की पहली पसंद : अनुदान और सहायता विदेश मंत्री शिसिर खनाल ने स्पष्ट किया है कि सरकार पुनर्निर्माण के लिए ऋण की तुलना में अनुदान और सहायता को प्राथमिकता देना चाहती है। उनका कहना है कि सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले नेपाल का ऋण लगातार बढ़ रहा है और ऐसे में नए ऋण का बोझ बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता नहीं है। सरकार ने विदेश मंत्रालय के कूटनीतिक तंत्र को सक्रिय करने की तैयारी शुरू कर दी है, ताकि विदेशी सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और विकास साझेदारों से अधिकतम अनुदान और सहायता हासिल की जा सके लेकिन यहीं नेपाल की सबसे बड़ी वित्तीय दुविधा सामने आती है। अनुदान पर्याप्त नहीं, आसान कर्ज पर नजर 2015 के भूकंप के बाद राष्ट्रीय योजना आयोग में पीडीएनए प्रक्रिया से जुड़े रहे अर्थशास्त्री गोविंदा राज पोखरेल का मानना है कि मौजूदा वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों में इतनी बड़ी राशि केवल अनुदान के रूप में जुटाना बेहद कठिन होगा। उनके अनुसार नेपाल को रियायती और आसान शर्तों वाले ऋण को भी विकल्प के रूप में खुला रखना चाहिए। पारंपरिक विकास साझेदारों से मिलने वाली सहायता पुनर्निर्माण की वास्तविक जरूरतों के मुकाबले पर्याप्त नहीं होने की आशंका है। वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने भी संकेत दिया है कि अनुदान सरकार की प्राथमिकता तो है, लेकिन उससे नेपाल की पूरी वित्तीय जरूरत पूरी होना संभव नहीं है। अब नजर वैश्विक ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ पर नेपाल अब पारंपरिक दाताओं से आगे बढ़कर वैश्विक हानि एवं क्षति कोष के तहत भी सहायता मांगने की तैयारी कर रहा है। सरकार का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की तीव्रता बढ़ाने में भूमिका निभाई है और नेपाल जैसे जलवायु - संवेदनशील देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के मुताबिक इस कोष से मिलने वाली राशि भले ही कुल पुनर्निर्माण लागत की तुलना में छोटी हो, लेकिन इससे नेपाल के लिए जलवायु न्याय और मुआवजे की मांग का अंतरराष्ट्रीय आधार मजबूत हो सकता है। सवाल सिर्फ टूटी सड़कों और घरों का नहीं पीडीएनए का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि सरकार अब केवल क्षतिग्रस्त ढांचे को उसी जगह दोबारा खड़ा करने के बजाय आपदा के बाद नेपाल के भूगोल और बस्तियों की संरचना को नए सिरे से देखने की तैयारी कर रही है। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से आबादी का पुनर्वास, नदी बेसिन की नई योजना, सुरक्षित बस्तियों का विकास, पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना और स्थानीय समुदायों की आपदा प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाना, इन सभी पर आने वाला खर्च पुनर्निर्माण के मौजूदा अनुमान को और बढ़ा सकता है। नेपाल के सामने इसलिए सिर्फ यह सवाल नहीं है कि बाढ़ में कितना खोया, बल्कि यह भी है कि अगली बाढ़ से पहले कितना बदलना होगा। 26 अगस्त की भोटेकोशी आपदा ने हिमालयी देश के सामने एक कठिन वित्तीय सच रख दिया है, तबाही की भरपाई के लिए दुनिया से मदद मांगना जरूरी है, लेकिन यदि मदद अनुदान के रूप में पर्याप्त नहीं मिली तो पुनर्निर्माण का बिल अंततः नेपाल के कर्ज खाते में भी जुड़ सकता है।