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मुंगेर। पादुका दर्शन स्थित संन्यास पीठ में चातुर्मास अनुष्ठान के दूसरे दिन श्रीमद्भागवत कथा के दौरान परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने भक्ति को पूजा-पाठ और कर्मकांड से आगे मनुष्य की भावनाओं को सकारात्मक, निर्मल और परिष्कृत करने की प्रक्रिया बताते हुए कहा कि सच्ची भक्ति के लिए व्यक्ति को अपनी भावनाओं का ‘रिमोट कंट्रोल’ स्वयं अपने हाथ में रखना होगा और आत्मशुद्धि के जरिए ईश्वरमुखी बनना होगा। ‘घर की तरह मन की सफाई भी जरूरी’ श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए स्वामी निरंजनानंद ने मन की शुद्धता को आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताया।उन्होंने कहा कि जिस तरह लोग अपने घर की सफाई करते हैं, उसी तरह मन पर जमी अज्ञानता की धूल हटाना भी जरूरी है। मन साफ होता है तो विचार निर्मल होते हैं और निर्मल विचार भावनाओं को सकारात्मक तथा परिष्कृत बनाते हैं। यही प्रक्रिया व्यक्ति को धीरे-धीरे ईश्वर की ओर ले जाती है। ‘भावनाओं का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखें’ स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि बाहरी परिस्थितियां हमेशा मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन वह उन परिस्थितियों के प्रति अपनी भावनाओं और दृष्टिकोण को किस दिशा में ले जाता है, यह काफी हद तक उसके हाथ में है। इसी संदर्भ में उन्होंने भावनाओं का ‘रिमोट कंट्रोल’ अपने हाथ में रखने की बात कही। उनके मुताबिक, भावनाओं में सकारात्मकता आए बिना भक्ति का वास्तविक भाव विकसित नहीं हो सकता। पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है भक्ति उन्होंने भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को आध्यात्मिक जीवन की परस्पर जुड़ी अवस्थाएं बताया। नारद भक्ति सूत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति को परम प्रेम की जागृति के रूप में समझा गया है। ऐसे में भक्ति केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर प्रेम, करुणा और सकारात्मक दृष्टि विकसित करने की प्रक्रिया है। ‘श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे’ से गूंजा संन्यास पीठ कार्यक्रम में भागलपुर की मानस कोकिला कृष्णा मिश्रा ने श्रीमद्भागवत कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। कथा की शुरुआत “श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेवा” नाम संकीर्तन के साथ हुई। इसके बाद मंगलाचरण और विभिन्न स्तोत्रों के पाठ से संन्यास पीठ का वातावरण भक्तिमय हो गया और श्रद्धालु भागवत कथा के आध्यात्मिक संदेश में डूबे नजर आए। ‘राम मेरे में हैं, मैं राम में हूं’ का समझाया मर्म कृष्णा मिश्रा ने स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पद्म जयंती के संदर्भ में “राम मेरे में हैं, मैं राम में हूं” की आध्यात्मिक अनुभूति की व्याख्या की। उन्होंने इसे जीव और ब्रह्म की एकरूपता तथा अहंकार के विलय की अनुभूति से जोड़ते हुए बताया कि आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव अपने भीतर परम सत्ता की अनुभूति करना है। माया ‘जादूगरनी बहुरूपनी’, सद्गुरु दिखाते हैं रास्ता कथा के दौरान भगवान की माया को ‘जादूगरनी बहुरूपनी’ के रूप में समझाया गया। कृष्णा मिश्रा ने कहा कि माया मनुष्य को अलग-अलग रूपों और आकर्षणों में उलझाती है, जबकि सद्गुरु उसे बाहरी आकर्षणों से निकालकर भीतर की यात्रा का रास्ता दिखाते हैं। उनके अनुसार, भक्ति का उद्देश्य केवल भगवान को बाहर तलाशना नहीं, बल्कि अपने भीतर उस चेतना को जागृत करना है जो मनुष्य को परमात्मा से जोड़ती है। राजा परीक्षित की कथा से मृत्यु और मोक्ष का संदेश श्रीमद्भागवत कथा में राजा परीक्षित का प्रसंग भी आया। ऋषि के शाप के कारण सातवें दिन मृत्यु निश्चित होने के बाद परीक्षित ने राजपाट छोड़कर गंगा तट को अपना साधना स्थल बनाया और शुकदेव जी से सात दिनों तक भागवत कथा सुनी। इस प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को संदेश दिया गया कि मृत्यु के भय को भी ईश्वर-स्मरण, आत्मचिंतन और ज्ञान की साधना में बदला जा सकता है। परिस्थितियां नहीं, अपनी चेतना को दें दिशा चातुर्मास अनुष्ठान के दूसरे दिन की कथा का केंद्रीय संदेश मनुष्य की आंतरिक अवस्था और भावनाओं पर केंद्रित रहा।बाहरी परिस्थितियों पर हर समय नियंत्रण संभव नहीं, लेकिन अपनी भावनाओं, विचारों और चेतना को सकारात्मक दिशा देना मनुष्य के हाथ में है। यही आत्मशुद्धि धीरे-धीरे भक्ति को कर्मकांड से ऊपर उठाकर प्रेम, आत्मचिंतन और आत्मानुभूति की यात्रा में बदल देती है।



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