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नई दिल्ली। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े को कुछ लोग राजनीतिक जीत या हार के चश्मे से देख सकते हैं लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह भारत के लोकतंत्र की परिपक्वता और जीवंतता का ही प्रमाण है। लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ सुनने, जनमत का सम्मान करने और जवाबदेही स्वीकार करने की क्षमता में निहित होती है। जब किसी सरकार के निर्णय में संवाद, जनभावना और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की झलक दिखाई देती है, तब वह किसी दल की पराजय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता होती है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए जनता की भावनाओं, विशेषकर युवाओं की चिंताओं, पर विचार करना स्वाभाविक दायित्व है। इसलिए इस घटनाक्रम का मूल्यांकन केवल राजनीतिक लाभ-हानि के आधार पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के व्यापक संदर्भ में किया जाना चाहिए। सरकारें प्रशासनिक अधिकारों के बल पर व्यवस्था चला सकती हैं, किंतु जनता का विश्वास केवल संवाद, संवेदनशीलता और पारदर्शिता से अर्जित किया जा सकता है। जनभागीदारी, तर्क और जवाबदेही किसी भी सफल लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य शर्तें हैं। शिक्षा मंत्री के पद से श्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारें केवल जनदबाव में निर्णय लेती हैं, या लोकतंत्र में जनता की आवाज स्वाभाविक रूप से शासन की दिशा तय करती है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का यह कथन " आज डिक्टेशन नहीं, डिस्कशन की जरूरत है। ऑर्डर नहीं, कॉन्शसनेस की जरूरत है" , विशेष महत्व रखता है। उनका यह संदेश केवल सरकार के लिए नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के लिए एक विचारणीय बिंदु है कि संवाद, तर्क और सहमति ही स्थायी समाधान का आधार हैं। हालांकि यह कहना कि "मोदी सरकार पहली बार युवाओं के दबाव में झुक गई" या "नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के छात्र आंदोलनों से सबक लेकर निर्णय लिया गया" , एक राजनीतिक निष्कर्ष है न कि स्थापित तथ्य। फिर भी यह निर्विवाद है कि लोकतंत्र में युवाओं की आवाज़ को अनसुना नहीं किया जा सकता। इतिहास गवाह है कि जब छात्र और युवा शांतिपूर्ण, संगठित और तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखते हैं, तो सरकारों को उस पर विचार करना पड़ता है। यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। श्री मोहन भागवत का यह कहना कि "केवल शक्ति के बल पर या मनमर्जी से किसी पर अपनी बात नहीं थोपी जा सकती" वस्तुतः शासन की उस मूल भावना की याद दिलाता है, जिसमें जनता को सहभागी माना जाता है, केवल शासित नहीं। यदि संवाद की जगह निर्देश, और विमर्श की जगह एकतरफा निर्णय ले लेते हैं, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह बात और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसके केंद्र में देश का भविष्य ‘युवा’ खड़ा होता है। यदि किसी मंत्री के इस्तीफ़े की मांग व्यापक जनभावना से जुड़ती है, तो उसका मूल्यांकन राजनीतिक लाभ-हानि के बजाय जवाबदेही के सिद्धांत पर होना चाहिए। लोकतंत्र में पद किसी व्यक्ति का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति उत्तरदायित्व है। वहीं दूसरी ओर, केवल विरोध के दबाव में इस्तीफ़े की मांग को ही समाधान मान लेना भी लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत नहीं करता। किसी भी निर्णय का आधार तथ्यों, उत्तरदायित्व और निष्पक्ष समीक्षा पर होना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, विपक्ष, छात्र संगठन और समाज सभी संवाद की संस्कृति को मजबूत करें। सरकार यदि संवाद के लिए आगे बढ़ती है तो उसे कमजोरी नहीं, लोकतांत्रिक परिपक्वता माना जाना चाहिए। उसी प्रकार आंदोलनों को भी शांतिपूर्ण, तथ्यपरक और संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी बात रखनी चाहिए। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति किसी सरकार के झुकने या अड़ने में नहीं, बल्कि जनता और सरकार के बीच विश्वास, संवाद और जवाबदेही कायम रखने में है। यदि श्री मोहन भागवत के शब्दों में कहें, तो आज सचमुच "डिक्टेशन" नहीं, "डिस्कशन" की आवश्यकता है। यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी कसौटी भी। वैसे भी लोकतंत्र की वास्तविक सफलता किसी एक इस्तीफ़े या एक आंदोलन से नहीं मापी जाती, वह इस बात से तय होती है कि सत्ता और समाज के बीच संवाद कितना जीवंत, उत्तरदायी और विश्वासपूर्ण बना रहता है।



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