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सूरज कुमार सिंह वाशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को फिलहाल स्थिर रखा है लेकिन महंगाई बढ़ने और आर्थिक विकास दर का अनुमान 2.4 प्रतिशत से घटाकर 2.2 प्रतिशत करने के फैसले ने भारत समेत दुनिया के उभरते बाजारों में निवेश, रुपये और तेल की कीमतों को लेकर नई चिंताएं बढ़ा दी हैं। फेड की मुक्त बाजार समिति के अध्यक्ष केविन वार्श ने दो दिवसीय बैठक के बाद बुधवार देर रात संवाददाता सम्मेलन में केंद्रीय बैंक के ब्याज दरों को 3.5 से 3.75 प्रतिशत के बीच स्थिर रखने लेकिन इसके साथ ही 2026 के लिए अमेरिका की आर्थिक विकास दर का अनुमान 2.4 प्रतिशत से घटाकर 2.2 प्रतिशत और महंगाई का अनुमान 2.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 3.3 प्रतिशत किए जाने की जानकारी दी। फेड का यह फैसला भारत जैसे उभरते देशों के लिए राहत और चिंता, दोनों संकेत लेकर आया है। ब्याज दरें नहीं बढ़ीं, इसलिए विदेशी निवेश का दबाव फिलहाल कम भारत के लिए सबसे सकारात्मक बात यह है कि फेड ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी नहीं की। आमतौर पर अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने पर विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड और अन्य सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर चले जाते हैं। भारत में 2025-26 के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का निवेश बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में रहा है। ऐसे में दरें स्थिर रहने से भारतीय शेयर बाजार को तत्काल राहत मिल सकती है। अमेरिकी ग्रोथ घटने का मतलब भारत के निर्यात पर दबाव अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का अमेरिका को निर्यात 80 अरब डॉलर से अधिक रहा। ऐसे में यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती है तो वहां उपभोग और मांग पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव भारतीय आईटी, टेक्सटाइल, फार्मा, जेम्स एंड ज्वेलरी तथा इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात पर पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने का संकेत, तेल की कीमतों पर खतरा फेड ने महंगाई के अनुमान को 2.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 3.3 प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया संकट को भी बड़ा जोखिम बताया है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और कच्चे तेल की कीमतें 70-75 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 90 डॉलर या उससे ऊपर पहुंचती हैं, तो इसका असर सीधे भारत के आयात बिल और महंगाई पर पड़ सकता है। रुपये पर बढ़ सकता है दबाव तेल महंगा होने का सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ता है। भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है। यदि विदेशी निवेश भी कमजोर पड़ता है तो रुपये की विनिमय दर पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। आरबीआई की नीति पर भी रहेगा असर फेड का फैसला भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिका में महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है और ब्याज दरें वर्तमान स्तर पर बनी रहती हैं, तो आरबीआई भी ब्याज दरों में आक्रामक कटौती करने से बच सकता है। इससे भारत में कर्ज सस्ता होने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है। शेयर बाजार को मिला मिला-जुला संकेत फेड के फैसले के बाद भारतीय शेयर बाजार को दो तरह के संकेत मिले हैं। एक तरफ ब्याज दरें स्थिर रहने से बैंकिंग, वित्तीय और घरेलू मांग आधारित क्षेत्रों को राहत मिल सकती है। दूसरी तरफ अमेरिकी विकास दर घटने से आईटी और निर्यात आधारित कंपनियों के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि आने वाले दिनों में बाजार की दिशा वैश्विक घटनाक्रमों और विदेशी निवेशकों की चाल पर निर्भर करेगी। आम आदमी की जेब पर क्या असर होगा यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो पेट्रोल-डीजल, परिवहन, हवाई यात्रा और रोजमर्रा के सामान की लागत बढ़ सकती है। इससे महंगाई पर दबाव बढ़ेगा। हालांकि फेड द्वारा ब्याज दरें स्थिर रखने से वैश्विक वित्तीय बाजारों में तत्काल अस्थिरता की आशंका कम हुई है, जो भारत के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। क्यों पूरी दुनिया देखती है फेड का फैसला फेडरल रिजर्व दुनिया की सबसे प्रभावशाली केंद्रीय बैंकिंग संस्थाओं में से एक है। अमेरिकी डॉलर वैश्विक व्यापार और वित्तीय लेनदेन की मुख्य मुद्रा है। इसलिए फेड की ब्याज दरों, महंगाई और विकास दर से जुड़ी घोषणाएं सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया के निवेश, मुद्राओं, शेयर बाजारों और आर्थिक नीतियों को प्रभावित करती हैं।