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माटी का श्रृंगार : श्रृंखला–10 नोएडा (यूपी)। भारत की मृद्भांड परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं में गिनी जाती है। पुरातत्वविदों के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में टेराकोटा कला का इतिहास लगभग पांच हजार वर्ष पुराना है। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल और चन्हूदड़ो की खुदाइयों से प्राप्त मिट्टी की मूर्तियां, पशु आकृतियां और खिलौने इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय सभ्यता ने अपने आरंभिक काल से ही मिट्टी को केवल उपयोगिता नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था का माध्यम बनाया। इसी सांस्कृतिक परंपरा की एक जीवित कड़ी है मिथिला की मिट्टी शिल्प कला, जहां कुम्हार आज भी उसी चाक, उसी मिट्टी और उसी धैर्य से सृजन करते हैं, जिससे सदियों पहले उनके पूर्वज किया करते थे। मिथिला के मिट्टी के घोड़े : आस्था की सवारी बिहार के मिथिलांचल में मिट्टी के घोड़े केवल सजावटी वस्तुएं नहीं हैं। वे लोकविश्वास, ग्राम संस्कृति और धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं। दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया तथा आसपास के जिलों में आज भी डीह बाबा, बरहम बाबा, काली माई, ब्रह्मस्थान और लोकनायक राजा सलहेश के स्थानों पर मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं। कई गांवों में पीपल या बरगद के नीचे स्थित ग्रामदेवताओं के स्थान पर सैकड़ों टेराकोटा घोड़े एक साथ दिखाई देते हैं। प्रत्येक घोड़ा किसी परिवार की श्रद्धा, विश्वास और कृतज्ञता का प्रतीक होता है। मौलागंज : जहां मिट्टी आज भी सांस लेती है दरभंगा का मौलागंज मिथिला की टेराकोटा कला का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहां कई पीढ़ियों से कुम्हार परिवार मिट्टी के घोड़े, हाथी, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और लोकजीवन से जुड़ी कलाकृतियां तैयार करते आ रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित शिल्पकार परिवारों ने इस परंपरा को नई पहचान दी है। शिल्पकार राजेंद्र पंडित जैसे कलाकारों ने इस कला को राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेलों, संग्रहालयों और प्रदर्शनियों तक पहुंचाया है। मिथिला के घोड़े चाक पर अलग-अलग भागों में बनाए जाते हैं। बाद में उन्हें जोड़कर अंतिम स्वरूप दिया जाता है। चेहरा प्रायः सांचे से बनाया जाता है, जबकि कान, अयाल, गले के हार और अन्य अलंकरण हाथ से एप्लिक तकनीक द्वारा तैयार किए जाते हैं। प्राकृतिक रंगों से आधुनिक रंग-संयोजन तक कुछ दशक पहले तक मिथिला के कुम्हार अपने रंग स्वयं बनाते थे। हल्दी से पीला, नील से नीला, गेंदा और हरसिंगार से नारंगी, कालिख से काला तथा चूने से सफेद रंग तैयार किया जाता था। आज अधिकांश कलाकार ऐक्रेलिक और सिंथेटिक रंगों का प्रयोग करते हैं, फिर भी पारंपरिक लाल, पीला, हरा, नीला और काला रंग संयोजन आज भी मिथिला शिल्प की पहचान बना हुआ है। इसकी रंग योजना प्रसिद्ध मधुबनी चित्रकला की सौंदर्य परंपरा का भी विस्तार प्रतीत होती है। निर्माण प्रक्रिया : मिट्टी से संस्कृति तक मिथिला की मिट्टी शिल्प कला पूरी तरह हस्तनिर्मित है। सबसे पहले स्थानीय चिकनी मिट्टी को कई दिनों तक भिगोकर गूंथा जाता है। इसके बाद चाक पर आकार दिया जाता है। मूर्ति के विभिन्न भाग अलग-अलग बनाए जाते हैं। धूप में सुखाने के बाद उन्हें पारंपरिक भट्ठी में लगभग 700 से 900 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पकाया जाता है। भट्ठी से निकलने के बाद कलाकार हाथ से रंग भरते हैं और महीन अलंकरण करते हैं। यही कारण है कि कोई भी दो कलाकृतियां बिल्कुल एक जैसी नहीं होतीं। पूजा से वैश्विक पहचान तक समय के साथ मिथिला के मिट्टी शिल्प का स्वरूप भी बदला है। पहले जहां इसका उपयोग केवल धार्मिक अनुष्ठानों और लोकपर्वों तक सीमित था, वहीं आज यह कला संग्रहालयों, कला दीर्घाओं, कॉर्पोरेट उपहारों और आधुनिक गृह-सज्जा का हिस्सा बन चुकी है। दिल्ली हाट, सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला, शिल्पग्राम, इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड फेयर तथा विभिन्न राज्य स्तरीय हस्तशिल्प मेलों में मिथिला के टेराकोटा उत्पादों की निरंतर मांग बढ़ रही है। आंकड़ों में मिथिला की मिट्टी शिल्प मिथिला क्षेत्र में आज भी लगभग 1,500 से 2,000 कुम्हार परिवार प्रत्यक्ष रूप से पारंपरिक मिट्टी शिल्प से जुड़े हुए हैं। इनमें दरभंगा, मधुबनी और समस्तीपुर प्रमुख केंद्र हैं। बिहार सरकार की 'एक जिला–एक उत्पाद (ओडीओपी)', बिहार राज्य हस्तशिल्प विकास निगम, तथा विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), वस्त्र मंत्रालय की योजनाओं के माध्यम से अनेक शिल्पकारों को प्रशिक्षण, डिज़ाइन विकास और विपणन सहायता प्रदान की जा रही है। राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेलों के माध्यम से प्रतिवर्ष हजारों टेराकोटा कलाकृतियां देशभर में बिकती हैं। हाल के वर्षों में ऑनलाइन विपणन और ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म के कारण इन उत्पादों की पहुंच विदेशों तक भी बढ़ी है। नेपाल, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और यूरोप के भारतीय कला प्रेमियों के बीच मिथिला की टेराकोटा कलाकृतियां धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही हैं। चुनौतियां अभी भी शेष हैं इस समृद्ध परंपरा के सामने अनेक चुनौतियां भी हैं। गुणवत्तापूर्ण मिट्टी की उपलब्धता, पारंपरिक भट्ठियों की बढ़ती लागत, मशीन निर्मित सजावटी वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा, सीमित बाज़ार और युवा पीढ़ी का अन्य व्यवसायों की ओर रुझान इस कला के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधुनिक डिज़ाइन, ई-कॉमर्स, निर्यात और सांस्कृतिक पर्यटन को इस शिल्प से जोड़ा जाए, तो मिथिला की टेराकोटा कला लाखों लोगों की आजीविका का सशक्त माध्यम बन सकती है। माटी का संदेश मिथिला का मिट्टी का घोड़ा केवल एक कलाकृति नहीं है। वह भारतीय लोकविश्वास का प्रहरी है, ग्राम संस्कृति का दूत है और हमारी सभ्यता की हजारों वर्षों पुरानी स्मृति का जीवित दस्तावेज़ है। जब किसी ग्रामदेवता के चरणों में मिट्टी का घोड़ा चढ़ाया जाता है, तब वहां केवल श्रद्धा नहीं होती, वहां एक कुम्हार की पीढ़ियों का श्रम, धरती की सोंधी गंध और भारतीय संस्कृति की अनवरत यात्रा भी उपस्थित होती है। जब तक चाक घूमता रहेगा, तब तक मिट्टी बोलती रहेगी। और जब तक मिट्टी बोलती रहेगी, तब तक भारतीय सभ्यता की यह अमर कथा भी जीवित रहेगी।



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