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(जन्मदिन 23 अगस्त पर विशेष) नई दिल्ली। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल बड़े नेताओं का इतिहास नहीं है। उसके पीछे ऐसे अनगिनत लोग थे, जिन्होंने अपने छोटे-से इलाके में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और बड़े बदलाव की जमीन तैयार की। चंपारण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1917 का चंपारण सत्याग्रह महात्मा गांधी के राजनीतिक जीवन का निर्णायक अध्याय बना लेकिन गांधी को चंपारण तक पहुंचाने में जिस किसान की जिद ने इतिहास की दिशा बदली, उसका नाम था—पंडित राजकुमार शुक्ल। एक किसान, जिसने इतिहास बदल दिया पश्चिम चंपारण के सतबरिया गांव में 23 अगस्त 1875 को जन्मे राजकुमार शुक्ल के पास न कोई बड़ा राजनीतिक संगठन था, न सत्ता और न आर्थिक ताकत। उनके पास था तो नील की खेती से परेशान किसानों का दर्द और उस दर्द को न्याय दिलाने का संकल्प। यही संकल्प उनके जीवन का सबसे बड़ा अभियान बन गया। चंपारण सत्याग्रह को केवल गांधी के आगमन से जोड़ना इतिहास को अधूरा देखना होगा। गांधी के आने से पहले ही चंपारण में नील की जबरन खेती और नीलहों के शोषण के खिलाफ किसानों का असंतोष बढ़ रहा था। शेख गुलाब, राजकुमार शुक्ल, हरबंश सहाय, पीर मोहम्मद मुनिश, संत राउत, लोमराज सिंह और राधुमल जैसे लोगों ने अलग-अलग स्तर पर किसानों की आवाज उठाई थी। नील की खेती बनी किसानों की बेड़ियां नील की खेती किसानों के लिए केवल कृषि की समस्या नहीं थी। पंचकठिया जैसी व्यवस्था के तहत उन्हें अपनी जमीन के एक हिस्से में नील उगाने के लिए मजबूर किया जाता था। इससे किसान आर्थिक रूप से कमजोर होते गए और अपनी ही जमीन पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता खोने लगे। मुकदमों, दबाव और प्रशासनिक दमन ने स्थिति को और कठिन बना दिया।इसी दौर में पत्रकार पीर मोहम्मद मुनिश ने अपनी कलम से चंपारण की स्थिति को सामने लाने का प्रयास किया। दूसरी ओर राजकुमार शुक्ल गांव-गांव घूमकर किसानों की पीड़ा समझ रहे थे। उन्होंने महसूस किया कि स्थानीय स्तर की शिकायतें अंग्रेजी शासन को झुकाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। किसानों की आवाज को राष्ट्रीय मंच चाहिए। यहीं से शुरू हुई गांधी तक पहुंचने की यात्रा यहीं से उनकी गांधी तक पहुंचने की यात्रा शुरू हुई। श्री शुक्ल ने गांधी के बारे में सुना था। दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के उनके प्रयोग से वे प्रभावित थे। उन्हें लगा कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने वाला यह नेता चंपारण के किसानों की आवाज को देश के सामने रख सकता है। लेकिन, गांधी को चंपारण लाना आसान नहीं था। एक किसान की जिद के आगे झुक गए गांधी राजकुमार शुक्ल ने गांधी से संपर्क किया और लगातार उनसे चंपारण आने का आग्रह किया। कांग्रेस के अधिवेशनों में वे गांधी का इंतजार करते। गांधी जहां जाते, शुक्ल वहां पहुंच जाते। वे बार-बार चंपारण चलने की बात कहते। पत्र लिखते और लिखवाते। उनका आग्रह धीरे-धीरे ऐसी जिद में बदल गया, जिसे गांधी नजरअंदाज नहीं कर सके। यह किसी राजनीतिक पद या निजी महत्वाकांक्षा की जिद नहीं थी। यह एक किसान की बेचैनी थी, जो अपने लोगों के दुख का समाधान चाहता था। 1917 में गांधी पहुंचे चंपारण आखिरकार 1917 में गांधी चंपारण पहुंचे। उन्होंने किसानों की शिकायतें सुनीं, गांवों में जाकर वास्तविक स्थिति देखी और प्रशासन के सामने किसानों की बात रखी। जब प्रशासन ने उन्हें चंपारण छोड़ने का आदेश दिया तो गांधी ने कानून का सम्मान करते हुए भी किसानों के बीच रहने का निर्णय लिया। यहीं से चंपारण सत्याग्रह ने निर्णायक रूप लिया। चंपारण गांधी के लिए भी एक महत्वपूर्ण अनुभव था। यहां उन्होंने भारतीय ग्रामीण जीवन को करीब से देखा। सत्याग्रह अब उनके लिए केवल राजनीतिक प्रतिरोध की पद्धति नहीं रहा बल्कि गरीब और पीड़ित व्यक्ति के जीवन से जुड़ा संघर्ष बन गया। किसान की रोजमर्रा की पीड़ा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई। पहली दस्तक किसने दी थी लेकिन, इस परिवर्तन की पहली दस्तक किसने दी थी? उत्तर था- राजकुमार शुक्ल ने। इसलिए, उन्हें केवल गांधी को चंपारण बुलाने वाले किसान के रूप में देखना उनके योगदान को छोटा करना होगा। वे अपने समय के स्वतंत्र किसान नेता थे। गांधी ने उनके संघर्ष को राष्ट्रीय मंच दिया लेकिन संघर्ष का बीज चंपारण की धरती पर पहले ही पड़ चुका था। गांधी के चंपारण से लौटने के बाद भी शुक्ल की सक्रियता समाप्त नहीं हुई। वे किसानों के बीच काम करते रहे और ग्रामीण समाज में राजनीतिक चेतना फैलाने का प्रयास करते रहे। रॉलट एक्ट के विरोध और असहयोग आंदोलन के दौर में भी उनकी सक्रियता बनी रही। किसान संगठनों से भी उनका जुड़ाव रहा। संघर्ष में परिवार भी बना ताकत उनके संघर्ष में पारिवारिक सहयोग भी था। उनकी पत्नी केवला देवी का उल्लेख स्थानीय स्मृतियों में उनके संघर्ष को संबल देने वाली महिला के रूप में मिलता है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बड़े नेताओं की भूमिका तो विस्तार से दर्ज हुई लेकिन ऐसे पारिवारिक और स्थानीय सहयोगियों की भूमिका अक्सर पीछे छूट गई। राजकुमार शुक्ल की जिद जीवन के अंतिम दौर तक बनी रही। गांधी के चंपारण से लौटने के बाद भी वे चाहते थे कि गांधी फिर वहां आएं। वे अखबारों से गांधी की गतिविधियों की जानकारी लेते और उन्हें पत्र लिखते रहे। साबरमती में भी किसानों की ही बात 1929 की शुरुआत में वे साबरमती आश्रम पहुंचे। शरीर कमजोर था लेकिन चिंता वही थी—चंपारण। कई दिनों की प्रतीक्षा के बाद गांधी से उनकी मुलाकात हुई। वर्षों के संघर्ष से थके शुक्ल की बातचीत में भी अपने क्षेत्र और किसानों की चिंता प्रमुख थी। साबरमती से लौटने के बाद वे अपने गांव नहीं गए। मोतिहारी की केडिया धर्मशाला में उन्होंने वही कमरा चुना, जहां कभी गांधी ठहरे थे। 20 मई 1929 को मोतिहारी में उनका निधन हो गया। उनकी बेटी देवपति उनके पास थीं। लोकस्मृतियों में आज भी जीवित हैं शुक्ल उनकी मृत्यु से जुड़े कुछ प्रसंग चंपारण की लोकस्मृति में मिलते हैं। इन्हें ऐतिहासिक दस्तावेज से अधिक लोकविश्वास के रूप में देखना उचित होगा। लेकिन, ये प्रसंग यह जरूर संकेत देते हैं कि शुक्ल की निर्भीकता और संघर्ष ने उनके विरोधियों पर भी प्रभाव डाला था। आज राजकुमार शुक्ल की कहानी केवल अतीत की स्मृति नहीं है। लोकतंत्र में जनभागीदारी और किसान अधिकारों की चर्चा के बीच उनकी भूमिका एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखती है— क्या आम नागरिक अपनी समस्या को सार्वजनिक प्रश्न में बदल सकता है? शुक्ल का जीवन इसका स्पष्ट उत्तर देता है। निजी दर्द को बनाया जनआंदोलन उन्होंने अपनी समस्या को निजी शिकायत नहीं बनने दिया। किसानों के अलग-अलग दुखों को एक सामूहिक सवाल बनाया और फिर उस सवाल को स्थानीय सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचाया। आज लोगों के पास अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया, समाचार माध्यम, न्यायपालिका, संसद और जनप्रतिनिधियों जैसे अनेक मंच हैं। इसके बावजूद कई बार आम आदमी की आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचने में कठिनाई महसूस करती है। ऐसे समय में शुक्ल का जीवन बताता है कि बदलाव के लिए केवल साधन नहीं, निरंतरता और संकल्प भी जरूरी है। उनकी कहानी स्थानीय नेतृत्व की ताकत भी बताती है। बड़े परिवर्तन हमेशा राजधानी से शुरू नहीं होते। कई बार परिवर्तन की पहली आवाज किसी छोटे गांव से उठती है। राष्ट्रीय नेतृत्व तभी प्रभावी बनता है, जब वह जमीन से उठी आवाज को सुनता है। गांधी और शुक्ल—संघर्ष की दो कड़ियां चंपारण सत्याग्रह का नेतृत्व गांधी ने किया और उसे राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधी ने किसानों के संघर्ष को नैतिक और राजनीतिक शक्ति प्रदान की। लेकिन, गांधी को चंपारण तक पहुंचाने वाली प्रक्रिया में राजकुमार शुक्ल की भूमिका केंद्रीय थी। स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल गांधी, नेहरू, पटेल और दूसरे बड़े नेताओं का इतिहास नहीं है। यह उन किसानों, मजदूरों, पत्रकारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का भी इतिहास है, जिन्होंने संघर्ष की जमीन तैयार की। इतिहास के बड़े अध्याय अक्सर ऐसे ही छोटे-छोटे संघर्षों से बनते हैं। अनदेखी कड़ी का नाम, राजकुमार शुक्ल राजकुमार शुक्ल इसी अनदेखी कड़ी का नाम हैं। गांधी चंपारण के महानायक हैं, लेकिन गांधी को चंपारण तक पहुंचाने वाली जिद एक किसान की थी। शुक्ल ने कहा- चंपारण चलिए। गांधी गए। किसानों की पीड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बनी। सत्याग्रह हुआ और गांधी के राजनीतिक जीवन को नई दिशा मिली। इस अर्थ में राजकुमार शुक्ल केवल गांधी को चंपारण लाने वाले किसान नहीं थे। वे जनता और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच वह सेतु थे, जिसने स्थानीय अन्याय को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा। आज जब हम स्वतंत्रता आंदोलन को याद करते हैं तो इतिहास के बड़े चेहरों के साथ उन आवाजों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने बदलाव की पहली दस्तक दी थी। एक किसान की पुकार जिसने इतिहास बदल दिया राजकुमार शुक्ल की कहानी यही बताती है कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, लगातार उठाई गई जनता की आवाज इतिहास की दिशा बदल सकती है। चंपारण की धरती पर गांधी का सत्याग्रह बाद में आया था, उसकी पहली पुकार एक किसान ने लगाई थी। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)