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पटना। जमालपुर को केवल एक रेलवे शहर कह देना उसके इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। बिहार में मुंगेर की धरती पर बसा यह शहर भारतीय औद्योगिक चेतना की उन शुरुआती प्रयोगशालाओं में है, जहां लोहे, मशीन और मनुष्य के श्रम ने मिलकर आधुनिक भारत की एक अलग कहानी लिखी। 8 फरवरी 1862 को यहां स्थापित रेलवे कार्यशाला को भारतीय रेल की पहली पूर्ण विकसित रेलवे कार्यशाला के रूप में जाना जाता है। मशीनों के पीछे मेहनतकश हाथों की कहानी लेकिन जमालपुर की कहानी केवल मशीनों की कहानी नहीं है। यह उन हाथों की कहानी है जिन्होंने मशीनों को चलाया, बिगड़ी मशीनों को फिर जीवन दिया और लोहे को उपयोगी आकार में ढाला। इसीलिए यहां विश्वकर्मा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं लगती। वह इस औद्योगिक नगर की आत्मा में बसी श्रम और शिल्प की स्मृति जैसी दिखाई देती है। 17 नहीं, 16 सितंबर को पूजा की परंपरा देश के अधिकांश हिस्सों में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को मनाई जाती है, लेकिन जमालपुर रेल कारखाने में 16 सितंबर को पूजा करने की पुरानी परंपरा रही है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार यह परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है। यह एक तारीख भर नहीं है। इसके पीछे जमालपुर की अपनी औद्योगिक पहचान है। कल्पना कीजिए उस समय की, जब रेल भारत में आधुनिकता का नया चेहरा बन रही थी। भाप के इंजन, लोहे के पहिए, विशाल क्रेन, भट्ठियां और मशीनें भारतीय समाज के लिए बिल्कुल नई दुनिया थे। उस दुनिया में जमालपुर केवल रेलवे का एक पड़ाव नहीं बना, बल्कि तकनीकी कौशल और औद्योगिक श्रम का केंद्र बन गया। हुनरमंद हाथों ने जमालपुर को बनाया खास रेलवे के विस्तार के साथ मशीनों की मरम्मत और निर्माण के लिए प्रशिक्षित हाथों की आवश्यकता थी। जमालपुर के चयन में स्थानीय कारीगरों और धातु-कर्म की परंपरा से जुड़े कुशल लोगों की उपलब्धता भी एक कारण बताई जाती है यानी जिस भूमि पर आधुनिक रेलवे कार्यशाला खड़ी हुई, वहां पहले से ही हाथ के हुनर की एक सामाजिक स्मृति मौजूद थी। यहीं विश्वकर्मा की कथा जमालपुर के इतिहास से जुड़ती है। पत्थर से लोहे तक शिल्प की यात्रा विश्वकर्मा भारतीय परंपरा में देवशिल्पी हैं। वे केवल भवन बनाने वाले देवता नहीं, बल्कि निर्माण-बुद्धि, तकनीकी कौशल और सृजनशील श्रम के प्रतीक हैं। यदि देवघर की लोककथा में विश्वकर्मा मंदिर के पत्थरों को आकार देते दिखाई देते हैं, तो जमालपुर में वही विश्वकर्मा लोहे, इस्पात और मशीनों के बीच खड़े दिखाई देते हैं।देवघर में शिल्प पत्थर में था, जमालपुर में वही शिल्प लोहे में उतर आया। यही इस शहर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक खूबसूरती है। विश्वकर्मा पूजा के दिन कारखाने के विभिन्न शॉपों में उनकी प्रतिमाएं स्थापित की जाती रही हैं। 2024 की रिपोर्टों में भी कारखाने के विभिन्न शॉपों में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा और आम लोगों के कारखाना परिसर में आने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। जब 50 हजार लोग पहुंचे कारखाना देखने कभी यह दिन जमालपुर शहर के लिए एक बड़े उत्सव का रूप ले लेता था। रेल कर्मचारी अपने परिवारों के साथ कारखाने आते और आम लोग भी ऐतिहासिक कार्यशाला को देखने पहुंचते। 2019 की एक रिपोर्ट में लगभग 50 हजार लोगों के कारखाना देखने पहुंचने का उल्लेख है। यह दृश्य अपने आप में भारतीय औद्योगिक संस्कृति का दुर्लभ उदाहरण था। जहां सामान्य दिनों में कारखाना अनुशासन, उत्पादन और तकनीकी कार्य का स्थान था, वहीं विश्वकर्मा पूजा के दिन वही परिसर आस्था और कौशल के सार्वजनिक उत्सव में बदल जाता था। मशीनों पर फूल चढ़ते थे। रेल इंजन के सामने दीप जलते थे। क्रेन के पास पूजा होती थी और उन मशीनों को बनाने तथा चलाने वाले हाथ अपने श्रम को देवशिल्पी के सामने नमन करते थे। यहां धर्म और उद्योग आमने-सामने नहीं थे। दोनों एक-दूसरे में घुले हुए थे।विश्वकर्मा पूजा का यही सबसे गहरा अर्थ है। मशीन दिखती है, कारीगर नहीं हम अक्सर मशीन को देखते हैं, मशीन के पीछे खड़े आदमी को नहीं। इंजन दिखाई देता है, उसे बनाने वाले कारीगर की उंगलियां नहीं दिखाई देतीं। विशाल क्रेन दिखाई देती है, लेकिन उसे डिजाइन करने वाले इंजीनियर, उसे ढालने वाले तकनीशियन और उसे चलाने वाले श्रमिक का श्रम अक्सर हमारी नजर से ओझल रहता है। विश्वकर्मा पूजा उस अदृश्य श्रम को दृश्य बनाती है। जमालपुर का इतिहास इस दृष्टि से और महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस कार्यशाला ने केवल मरम्मत का काम नहीं किया। रेलवे के इतिहास में यहां लोकोमोटिव, उपकरणों और विभिन्न तकनीकी उत्पादों के निर्माण तथा ओवरहालिंग की लंबी परंपरा रही है। रेलवे मंत्रालय के अनुसार आज भी जमालपुर कार्यशाला 140 टन के ब्रेकडाउन क्रेन, हाई-कैपेसिटी जैक, ब्रॉडगेज वैगन आदि का निर्माण और विभिन्न उपकरणों का रखरखाव करती है इसलिए विश्वकर्मा यहां किसी कैलेंडर की तारीख नहीं हैं। वे कारखाने की रोजमर्रा की कार्य-संस्कृति में मौजूद हैं। हर तकनीकी समाधान में सृजन की चेतना जब कोई तकनीशियन किसी जटिल मशीन को खोलकर उसकी खराबी पहचानता है, जब कोई कारीगर लोहे को सही आकार देता है, जब कोई इंजीनियर मशीन की क्षमता को समझकर उसका नया उपयोग खोजता है—तब विश्वकर्मा की मूल चेतना काम करती है। यह चेतना केवल धार्मिक नहीं, सभ्यतागत है।भारत में शिल्प परंपरा बहुत पुरानी है। लोहार की भट्ठी से लेकर मंदिर के शिल्प तक और आज की आधुनिक इंजीनियरिंग तक एक लंबी यात्रा दिखाई देती है। जमालपुर उस यात्रा का औद्योगिक अध्याय है इसीलिए विश्वकर्मा पूजा को केवल औजारों की पूजा कह देना पर्याप्त नहीं।यह कौशल के सम्मान का पर्व है। यह उस हाथ को प्रणाम करने का दिन है, जो लोहे को आकार देता है।उस दिमाग को सम्मान देने का दिन है, जो मशीन की कल्पना करता है।उस श्रमिक को सलाम करने का दिन है, जिसके श्रम से उद्योग चलता है और उस तकनीकी ज्ञान को प्रतिष्ठा देने का दिन है, जिसके बिना आधुनिक समाज की कल्पना संभव नहीं। जमालपुर की विश्वकर्मा पूजा हमें एक और महत्वपूर्ण बात याद दिलाती है—भारत की औद्योगिक विरासत केवल बड़े कारखानों और सरकारी दस्तावेजों में नहीं रहती। वह श्रमिक बस्तियों में, पुराने औजारों में, मशीनों की आवाज में और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे हुनर में भी सुरक्षित रहती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के युग में विश्वकर्मा आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन उत्पादन की दुनिया को बदल रहे हैं, तब विश्वकर्मा का अर्थ और व्यापक हो जाता है। मशीनें अधिक बुद्धिमान हो सकती हैं, लेकिन उन्हें बनाने की कल्पना अब भी मनुष्य के भीतर जन्म लेती है। तकनीक मनुष्य के हाथ का विस्तार है।और विश्वकर्मा उस रचनात्मक हाथ के प्रतीक हैं। जमालपुर में 16 सितंबर की विश्वकर्मा पूजा इसलिए खास है कि यह तारीख एक पुराने औद्योगिक अनुशासन, धार्मिक परंपरा और शहर की सामूहिक स्मृति को एक साथ जोड़ती है। यह उस दौर की याद भी है जब रेलवे केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की एक बड़ी शक्ति बन रही थी। आज जमालपुर की पुरानी कार्यशालाओं, लोहे की संरचनाओं और मशीनों को देखते हुए लगता है कि समय भले बदल गया हो, लेकिन शिल्प की आत्मा नहीं बदली। लोहे में आज भी सुनाई देती है छेनी भाप के इंजन की जगह नई तकनीक ने ले ली।पुरानी मशीनों की जगह आधुनिक उपकरण आ गए।काम करने के तरीके बदल गए।लेकिन निर्माण करने वाले हाथ आज भी वही हैं।शायद इसलिए जमालपुर के लोहे में विश्वकर्मा की छेनी आज भी सुनाई देती है।यह छेनी किसी पत्थर पर नहीं चल रही। वह मशीनों, इंजनों, औजारों और तकनीकी ज्ञान के भीतर चल रही है। देवशिल्पी विश्वकर्मा की पूजा जब जमालपुर के रेल कारखाने में होती है, तो वह केवल एक देवता के प्रति श्रद्धा नहीं होती। वह उन हजारों अनाम श्रमिकों के प्रति सम्मान भी होती है, जिन्होंने डेढ़ सदी से अधिक समय में इस औद्योगिक विरासत को अपने श्रम से जीवित रखा है। जमालपुर की यही असली पहचान है, यहां विश्वकर्मा केवल पूजे नहीं जाते, वे काम करते हुए दिखाई देते हैं। मशीन के हर पुर्जे में, हथौड़े की हर चोट में, लोहे की हर चमक में और श्रमिक के पसीने की हर बूंद में और शायद यही विश्वकर्मा पूजा का सबसे सुंदर अर्थ है, "जिस हाथ से निर्माण होता है, उस हाथ को देवत्व देना।"



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