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नई दिल्ली। हाई-अल्कोहल वाली दवाओं के गलत इस्तेमाल पर लगाम कसते हुए केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि अब ऐसी दवाएं खुले तौर पर नहीं बिकेंगी, बल्कि उन्हें बेचने के लिए लाइसेंस और खरीदने के लिए डॉक्टर की पर्ची जरूरी होगी। सरकार ने क्या बदला है स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि शेड्यूल k के तहत मिल रही वह छूट खत्म कर दी है, जिसके कारण कुछ खास दवाएं बिना लाइसेंस के भी बेची जा सकती थीं। इनमें कुछ ऐसी औषधीय तैयारियां भी शामिल थीं, जिनमें एथिल अल्कोहल की मात्रा बहुत ज्यादा होती थी। अब सरकार ने साफ कर दिया है कि 12% वी/वी से अधिक एथिल अल्कोहल वाली और 30 एमएल से बड़ी पैकिंग में आने वाली दवाएं इस छूट के दायरे में नहीं रहेंगी। सीधा मतलब यह है कि अब इन उत्पादों को बेचने और सप्लाई करने के लिए ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत जरूरी लाइसेंस लेना होगा। अब ये दवाएं शेड्यूल एच1 में होंगी सरकार ने इन हाई-अल्कोहल फॉर्म्युलेशंस को शेड्यूल एच1 में भी शामिल कर दिया है। शेड्यूल एच1 में आने का मतलब है कि दवा सिर्फ रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर यानी पंजीकृत डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन पर ही मिलेगी। दवा बेचने वाले को रिकॉर्ड रखना होगा कि किसे, कब और कितनी दवा दी गई। सप्लाई और बिक्री पर पहले से ज्यादा निगरानी रहेगी यानी अब इन दवाओं की बिक्री सामान्य ओवर-द-काउंटर प्रोडक्ट की तरह नहीं हो सकेगी। किन दवाओं को लेकर चिंता थी सरकार के मुताबिक, कुछ औषधीय उत्पाद जैसे इलायची, अदरक और अन्य सुगंधित तैयारियों की टिंक्चर शेड्यूल ‘के’ के तहत लाइसेंस छूट में आती थीं लेकिन इनमें से कुछ फॉर्म्युलेशंस में अल्कोहल की मात्रा 80% से 90% तक पाई गई। इतनी ज्यादा अल्कोहल होने की वजह से इनके नशे के लिए दुरुपयोग की आशंका बढ़ रही थी। इस मामले में कुछ राज्य सरकारों की ओर से भी केंद्र को शिकायतें और संदर्भ मिले थे। इसके बाद सरकार ने नियमों में बदलाव का फैसला लिया। आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है इस बदलाव का सबसे बड़ा असर उन दवाओं पर पड़ेगा जिनमें अल्कोहल की मात्रा ज्यादा है और जिनका इस्तेमाल इलाज से ज्यादा गलत तरीके से किए जाने का खतरा था। अब ऐसी दवाएं मेडिकल स्टोर पर सीधे नहीं मिलेंगी डॉक्टर की पर्ची जरूरी होगी। बिना लाइसेंस इनके स्टॉक और बिक्री पर रोक लगेगी। इनकी सप्लाई रेगुलेटेड फार्मा सप्लाई चेन के जरिए होगी। सरकार का मकसद क्या है? सरकार का कहना है कि यह फैसला जनस्वास्थ्य की सुरक्षा और दवाओं के जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लिया गया है। हाई-अल्कोहल दवाओं की बिक्री पर नियंत्रण से दुरुपयोग और अवैध डायवर्जन कम होगा, दवाएं सिर्फ वास्तविक मरीजों तक पहुंचेंगी, मेडिकल उत्पादों पर नियामक निगरानी मजबूत होगी और फार्मा सप्लाई चेन अधिक जवाबदेह और ट्रैक योग्य बनेगी