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पटना। बिहार सरकार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों से जुड़े अत्याचार के मामलों की सुनवाई तेज करने के लिए राज्य में 19 अतिरिक्त विशेष न्यायालय स्थापित करने और उनके संचालन के लिए 171 नए पद सृजित करने का फैसला किया है। मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के अपर मुख्य सचिव अरविंद कुमार चौधरी ने बुधवार को बताया कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। 19 जिलों में खुलेंगे अतिरिक्त विशेष न्यायालय श्री चौधरी ने बताया कि ये विशेष अदालतें पश्चिम चंपारण के बेतिया, मधुबनी, भोजपुर के आरा, सिवान, अररिया, सुपौल, खगड़िया, जहानाबाद, बक्सर, जमुई, कैमूर के भभुआ, कटिहार, सीतामढ़ी, मुंगेर, मधेपुरा, बांका, शेखपुरा, औरंगाबाद और लखीसराय में स्थापित की जाएंगी। इस फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए न्यायिक ढांचे का विस्तार सीधे जिला स्तर पर किया जा रहा है। जिला और अपर सत्र न्यायाधीश स्तर की अदालतें नए न्यायालय जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश स्तर के होंगे। इनके लिए न्यायाधीशों के साथ-साथ जरूरी प्रशासनिक और सहायक कर्मचारियों के पद भी सृजित किए जाएंगे। सरकार ने कुल 171 अराजपत्रित पदों के सृजन की आवश्यकता स्वीकार की है, ताकि अदालतें केवल कागज पर न रहें, बल्कि पूरी कार्यक्षमता के साथ काम कर सकें। हर साल 10 करोड़ से अधिक का खर्च इन न्यायालयों की स्थापना और संचालन पर राज्य सरकार को हर साल करीब 10 करोड़ 12 लाख 38 हजार 840 रुपये खर्च करने होंगे। यह राशि न्यायालय कर्मियों के वेतन, प्रशासनिक व्यवस्था और अन्य स्थापना खर्चों पर खर्च की जाएगी। लंबित मुकदमों के जल्द निपटारे पर जोर एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालतों का प्रावधान है। कई जिलों में मुकदमों की संख्या बढ़ने और लंबित मामलों के कारण सुनवाई में देरी की शिकायतें सामने आती रही हैं। नई अदालतों की स्थापना से मुकदमों का बोझ अलग-अलग न्यायालयों में बंटेगा और सुनवाई की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद है। पीड़ितों को बार-बार नहीं करना पड़ेगा लंबा इंतजार विशेष न्यायालयों की संख्या बढ़ने से गवाहों की पेशी, आरोप तय करने, साक्ष्य दर्ज करने और फैसले की प्रक्रिया में होने वाली देरी कम हो सकती है। इसका सीधा लाभ उन पीड़ित परिवारों को मिलेगा, जिन्हें न्याय के लिए वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। सरकार का बड़ा न्यायिक ढांचा विस्तार 19 अतिरिक्त अदालतों और 171 पदों का सृजन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से जुड़े मामलों में न्यायिक क्षमता बढ़ाने की बड़ी पहल माना जा रहा है। अब इस फैसले की असली परीक्षा इस बात से होगी कि नए न्यायालय कितनी जल्दी शुरू होते हैं और लंबित मामलों के निपटारे की गति में कितना बदलाव आता है।



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