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संजय कौशिक नई दिल्ली। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत, वर्तमान में एक ऐसी त्रासदी से जूझ रहा है जो किसी भी युद्ध या महामारी से अधिक घातक साबित हो रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों की वैश्विक सूची में भारत पहले स्थान पर बना हुआ है। विडंबना यह है कि दुनिया के मात्र 1 प्रतिशत वाहन भारत में हैं, लेकिन वैश्विक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली 11 प्रतिशत मौतें भारत की सड़कों पर होती हैं। आंकड़ों के मुताबिक हर साल तकरीबन 5 लाख सड़क दुर्घटनाओं में 1.8 लाख लोगों की मौत होती है, जिससे कुल सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी ) का भारत को 3.14 प्रतिशत यानी 5.96 लाख करोड़ की आर्थिक क्षति होती है। आंकड़ों की वैश्विक सूची में भारत पहले स्थान पर है देश के राज्यवार सूची में बिहार राज्य 8वें स्थान पर है। देश के सर्वाधिक दुर्घटनाग्रस्त 100 जिलों की सूची में बिहार के 6 जिले पटना, मुजफ्फरपुर, सारण (छपरा), गया और नालंदा के साथ पूर्वी चम्पारण शामिल हैं। इन डरावनी तस्वीरों से सर्वोच्च न्यायालय तक आहत है। न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता एवं न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने 07 दिसंबर 2018 को एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था कि सड़कों के गड्ढों के कारण हुई मौतें "शायद सीमा पर या आतंकवादियों द्वारा मारे गए लोगों से अधिक" हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क सुरक्षा को देश की प्राथमिकता बताते हुए सितंबर 2025 में खुद स्वीकार किया था कि देश में हर साल औसतन 4.80 से 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिसमें लगभग 1.80 लाख लोगों की मौत हो जाती है। इन दुर्घटनाओं से जीडीपी को 3 फीसदी का नुकसान होता है, जो किसी बीमारी या युद्ध से भी अधिक है। उद्योग एवं वाणिज्य संगठन फिक्की के 7वें रोड सेफ्टी अवॉर्ड्स एंड सिम्पोजियम 2025 ‘विजन जीरो: लाइफ फर्स्ट, ऑलवेज’ कार्यक्रम में भारत की सरकार ने स्वीकार किया था कि सालाना होने वाली सभी दुर्घटनाओं में 66.4 फीसदी मौतें 18 से 45 साल के युवाओं की होती हैं, जो देश के भविष्य के लिए गंभीर चिंता है। इन सड़क दुर्घटनाओं में 18 साल से कम उम्र के 10 हजार बच्चों की सालाना मौत होती है। हेलमेट न पहनने से करीब 30,000 और सीट बेल्ट न लगाने से 16,000 मौतें सालाना होती हैं। इन आंकड़ों को कम करने के लिए सरकार ने नई बाइक खरीदने वालों को दो हेलमेट देने की अनिवार्यता लागू की है। सड़क दुर्घटनाओं की वैश्विक सूची में पहले स्थान पर भारत की उपस्थिति मौजूदा हालात की डरावनी तस्वीर पेश करती है। आंकड़ों की शक्ल में देखे तो भारत में प्रत्येक एक घंटे में 20.54 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है। 2025 में बिहार का यह आंकड़ा प्रति घंटे 4.13 का है। देश में होने वाली कुल मौतों में बिहार अकेले 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। इन मौतों से प्रतिवर्ष 0.6 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का बिहार नुकसान उठाता है। गुजरे वर्ष 2025 के आंकड़ों के मुताबिक 36,191 लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हुई। बिहार के 6 जिलों पटना, मुजफ्फरपुर, सारण (छपरा), पूर्वी चंपारण (मोतिहारी), गया और नालंदा का देश के 100 सर्वाधिक सड़क दुर्घटना वाले जिलों की राष्ट्रीय सूची में शामिल होना, प्रदेश के लिए चिंताजनक है। अलग-अलग अध्ययन श्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों (एनएच) पर 32.9 प्रतिशत मौतें हो रही हैं, जिसमें दोपहिया वाहन और पैदल यात्री सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। सेव लाईफ फाउंडेशन के अध्ययन के अनुसार 53% मौतें शाम 6 बजे से रात 12 बजे के बीच होती हैं। भारत के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत दुर्घटनाएं तेज रफ़्तार और 8 प्रतिशत मोबाइल के कारण हुईं। दोपहिया वाहन सवारों की मृत्यु की संख्या सबसे अधिक (44.5%) रही, इसके बाद पैदल चलने वाले यात्री (19.5%) हैं। केवल हेलमेट का इस्तेमाल कर 43 प्रतिशत मोटरसाइकिल दुर्घटनाओं को रोक जा सकता है। भारत का सड़क नेटवर्क 63.45 लाख किलोमीटर में फैला हुआ है, जिसमें 1.46 लाख किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग, 1.8 लाख किलोमीटर राज्य राजमार्ग और 60 लाख किलोमीटर से अधिक अन्य सड़कें शामिल हैं। कुल सड़क दुर्घटना मौतों में से 63% गैर-राष्ट्रीय राजमार्गों पर होती हैं, जिससे स्थानीय सड़कों की डिज़ाइन, पुलिस व्यवस्था और अस्पतालों की तैयारी में मौजूद कमियां स्पष्ट होती हैं। ऐसे में सरकार ने 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों को 50 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखा है। सड़कों पर 'नाचती मौत' के ये आंकड़े राष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक चेतावनी हैं। जब तक बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ-साथ नागरिक चेतना और यातायात नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित नहीं होता, तब तक 'विजन जीरो' का सपना पूरा होता हुआ नजर नहीं आता।



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