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मोतिहारी। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. प्रसून दत्त सिंह ने संस्कृत को केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि मनुष्य को संयम, संतुलन और समग्र विकास का रास्ता दिखाने वाली शाश्वत विद्या बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़ी यह भाषा आधुनिक तनावपूर्ण जीवन में भी उतनी ही उपयोगी और प्रासंगिक है। श्री सिंह विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित संस्कृत दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में संस्कृत की वर्तमान उपयोगिता, वैश्विक महत्व और उससे जुड़ी ज्ञान-विज्ञान की विरासत पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। आधुनिक तनाव का समाधान संस्कृत में प्रो. सिंह ने कहा कि वर्तमान जीवन तनाव, ईर्ष्या-द्वेष और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा से घिरा हुआ है। ऐसे वातावरण में व्यक्ति के लिए मानसिक संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। उनके मुताबिक, मन और इंद्रियों को संयमित करने की शिक्षा देने वाली संस्कृत इस चुनौती से निपटने में उपयोगी साबित हो सकती है। यह मनुष्य को भीतर से संस्कारित करने के साथ संतुलित जीवन जीने की दिशा भी दिखाती है। ‘केवल भाषा मानना इसके विराट स्वरूप को सीमित करना’ विभागाध्यक्ष ने कहा कि संस्कृत को केवल एक भाषा के रूप में देखना उसके विराट स्वरूप को सीमित करना होगा। यह मनुष्य की समग्र उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने वाली शाश्वत विद्या है। उन्होंने कहा कि संस्कृत की समृद्ध परंपरा में योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, विमानशास्त्र, तर्कशास्त्र और ज्यामिति सहित ज्ञान-विज्ञान की अनेक धाराएं मौजूद रही हैं। यही बहुआयामी विरासत संस्कृत को कालातीत और आज भी प्रासंगिक बनाती है। नई पीढ़ी तक विरासत पहुंचाने की जिम्मेदारी प्रो. सिंह ने कहा कि इस समृद्ध परंपरा से जुड़ना सभी के लिए गौरव की बात है। इसके साथ ही संस्कृत के ज्ञान और विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी सबकी जिम्मेदारी है। समारोह का आयोजन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव के मुख्य संरक्षण में किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने संस्कृत की भूमिका और भविष्य पर अपने विचार रखे। ऑनलाइन जुड़े शिक्षक, बढ़ाया विद्यार्थियों का उत्साह संस्कृत विभाग के प्रो. डॉ. श्याम कुमार झा ने ऑनलाइन माध्यम से समारोह को संबोधित किया और विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाया।सहायक आचार्य डॉ. विश्वजीत बर्मन और डॉ. मोहिनी श्रीवास्तव भी आभासी माध्यम से कार्यक्रम में शामिल हुए। सहायक आचार्य डॉ. बबलू पाल और डॉ. मणि शंकर द्विवेदी समारोह में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम में शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने मानव जीवन में संस्कृत की भूमिका तथा वैश्विक स्तर पर उसकी उपयोगिता को लेकर विभिन्न प्रस्तुतियां दीं। समारोह की खास बात यह रही कि विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने संस्कृत में संवाद करने का भरपूर प्रयास किया। इससे कार्यक्रम केवल भाषण और चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संस्कृत के व्यावहारिक प्रयोग का मंच भी बना। पाठ्यक्रम से निकालकर व्यवहार में लाने का संकल्प विद्यार्थियों ने संस्कृत को केवल किताबों और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखने का संकल्प लिया। उन्होंने दैनिक जीवन में इसका अधिक से अधिक प्रयोग करने की प्रतिबद्धता जताई। यह संकल्प उनके अकादमिक जुड़ाव से आगे बढ़कर संस्कृत की जीवंत परंपरा को रोजमर्रा के व्यवहार में उतारने की पहल के रूप में सामने आया। 20 से अधिक विद्यार्थियों और शोधार्थियों की भागीदारी समारोह में 20 से अधिक विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी सुखेन घोष ने किया, जबकि सहायक आचार्य डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। राष्ट्रगान के साथ संस्कृत दिवस समारोह का गरिमापूर्ण समापन हुआ।