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(18 जुलाई को पुण्यतिथि पर खास) मुंबई। हिंदी सिनेमा में कामयाब सितारों की कभी कमी नहीं रही लेकिन 'सुपरस्टार' का दर्जा सबसे पहले जिस अभिनेता को मिला, वह थे राजेश खन्ना । सत्तर के दशक में उनकी लोकप्रियता ऐसी थी, जिसकी मिसाल आज भी बॉलीवुड के इतिहास में कम ही देखने को मिलती है। उनकी मुस्कान, आंखों का अंदाज, डायलॉग बोलने का तरीका और रोमांटिक अभिनय दर्शकों के सिर चढ़कर बोलता था। खासकर युवतियों के बीच उनका ऐसा क्रेज था कि उनके बीमार होने की खबर मिलते ही दिल्ली की कुछ कॉलेज छात्राओं ने उनके पोस्टर पर बर्फ की थैली रख दी ताकि उनका बुखार जल्दी उतर जाए। इतना ही नहीं, कई प्रशंसक उन्हें अपने खून से प्रेम-पत्र लिखा करती थीं। 18 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि पर हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार की इसी बेमिसाल दीवानगी को याद किया जा रहा है। जतिन से बने राजेश खन्ना, संघर्ष से शुरू हुआ सफर पंजाब के अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को जन्मे जतिन खन्ना का बचपन से ही फिल्मों की ओर झुकाव था। हालांकि उनके पिता चाहते थे कि वह फिल्मों से दूर रहें लेकिन अभिनय का जुनून उन्हें रंगमंच तक ले आया। थिएटर से अभिनय की बारीकियां सीखने के बाद उन्होंने यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन की ओर से आयोजित ऑल इंडिया टैलेंट कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया और विजेता बनकर फिल्मी दुनिया का दरवाजा खोल लिया। यहीं से उनका नाम बदलकर राजेश खन्ना रखा गया और हिंदी सिनेमा को उसका पहला सुपरस्टार मिलने की कहानी शुरू हुई। 'आखिरी खत' से शुरुआत, 'आराधना' ने बदल दी किस्मत राजेश खन्ना ने 1966 में चेतन आनंद की फिल्म 'आखिरी खत' से अपने करियर की शुरुआत की। शुरुआती तीन-चार वर्षों तक उन्हें पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा, लेकिन 1969 में रिलीज हुई निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म 'आराधना' ने सब कुछ बदल दिया। शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी, किशोर कुमार की आवाज में अमर गीत और राजेश खन्ना की दिलकश अदाकारी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। फिल्म गोल्डन जुबली हिट साबित हुई और राजेश खन्ना रातों-रात देश के सबसे बड़े सितारे बन गए। इसके बाद शक्ति सामंत ने उन्हें 'कटी पतंग', 'अमर प्रेम', 'अनुराग', 'अजनबी', 'अनुरोध' और 'आवाज' जैसी कई यादगार फिल्मों में मौका दिया। जब पूरा देश बन गया 'काका' का दीवाना 'आराधना' की कामयाबी के बाद राजेश खन्ना सिर्फ अभिनेता नहीं रहे बल्कि एक जुनून बन गए। उनका हेयर स्टाइल, मुस्कुराने का अंदाज, आंखें झुकाकर संवाद बोलने की शैली और स्क्रीन प्रेजेंस युवाओं के बीच फैशन बन गई। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब उनके बीमार होने की खबर फैली तो दिल्ली की कुछ छात्राओं ने उनके पोस्टर पर बर्फ की थैली रखकर उनके जल्द स्वस्थ होने की दुआ मांगी। कई लड़कियां उन्हें अपने खून से प्रेम-पत्र लिखा करती थीं और उनकी कार को छूने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। हिंदी सिनेमा में किसी अभिनेता के लिए ऐसा क्रेज शायद पहली बार देखने को मिला था। रोमांटिक हीरो से संजीदा अभिनेता तक का सफर सत्तर के दशक में राजेश खन्ना पर यह आरोप लगने लगा कि वह सिर्फ रोमांटिक किरदार ही निभा सकते हैं। ऐसे समय में निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने उनकी छवि बदलने में अहम भूमिका निभाई। फिल्म 'बावर्ची' में उन्होंने हास्य अभिनय से दर्शकों को चौंकाया, जबकि 'आनंद' में उनके भावनात्मक अभिनय ने हर किसी की आंखें नम कर दीं। फिल्म का मशहूर संवाद—**"बाबूमोशाय... हम सब रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिसकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों से बंधी हुई है..."**—आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार संवादों में गिना जाता है। बदलते दौर में भी नहीं मानी हार 1969 से 1976 तक राजेश खन्ना का दौर बॉलीवुड पर छाया रहा। उनकी अधिकांश फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहीं। हालांकि बाद में अमिताभ बच्चन के 'एंग्री यंग मैन' दौर ने हिंदी सिनेमा का मिजाज बदल दिया और राजेश खन्ना की लोकप्रियता धीरे-धीरे कम होने लगी। इसके बावजूद उन्होंने खुद को नए किरदारों में ढालने की कोशिश जारी रखी। फिल्म 'रेड रोज' में उन्होंने नकारात्मक भूमिका निभाई, जबकि 'अलग-अलग' के जरिए फिल्म निर्माण में भी कदम रखा। मुमताज और शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों की सबसे पसंदीदा जोड़ियों में शामिल रही। अपने शानदार फिल्मी सफर में उन्हें तीन फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले। राजनीति में भी निभाई जिम्मेदारी फिल्मों में चार दशक तक राज करने के बाद राजेश खन्ना ने समाज सेवा के उद्देश्य से राजनीति का रुख किया। 1991 में वह कांग्रेस के टिकट पर नई दिल्ली लोकसभा सीट से सांसद चुने गए और सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। पहले सुपरस्टार की विरासत आज भी कायम करीब 125 फिल्मों में अपनी अदाकारी का जादू बिखेरने वाले राजेश खन्ना ने 18 जुलाई 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी लोकप्रियता, उनका रोमांटिक अंदाज और दर्शकों से मिला बेशुमार प्यार आज भी उन्हें हिंदी सिनेमा का पहला और सबसे यादगार सुपरस्टार बनाता है। उनकी कहानी सिर्फ एक अभिनेता की कामयाबी की दास्तान नहीं, बल्कि उस दौर की कहानी है जब एक कलाकार करोड़ों दिलों की धड़कन बन गया था।