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रांची/धनबाद। राजनीति में कई चेहरे आते-जाते हैं लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो कुर्सी से नहीं, लोगों की दुआओं से पहचाने जाते हैं.... झारखंड के पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मन्नान मल्लिक ऐसा ही एक नाम थे। 83 वर्ष की उम्र में मंगलवार को रांची के एक निजी अस्पताल में उनके निधन के साथ कोयलांचल ने अपना सबसे भरोसेमंद साथी और झारखंड की राजनीति ने अपना एक सादगीभरा चेहरा खो दिया। उनके निधन की खबर फैलते ही राजनीतिक गलियारों से लेकर कोयलांचल की बस्तियों तक शोक की लहर दौड़ गई। कांग्रेस कार्यकर्ता, श्रमिक संगठन और उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद कर रहे हैं, जिसने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया। सत्ता से पहले जनता का रास्ता चुना मन्नान मल्लिक का राजनीतिक जीवन अचानक नहीं बना था। उन्होंने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के निजी सचिव के रूप में की। यहीं से उन्होंने प्रशासन और राजनीति की बारीकियों को करीब से समझा। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई और धीरे-धीरे धनबाद की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई। एक दशक से अधिक समय तक धनबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया। उनकी राजनीति हमेशा कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच रहने वाली राजनीति मानी गई। 2009 में विधायक बने, फिर मंत्री तक पहुंचे वर्ष 2009 मन्नान मल्लिक के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा पड़ाव साबित हुआ। कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने धनबाद विधानसभा सीट से जीत दर्ज की और पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्हें हेमंत सोरेन सरकार में कांग्रेस कोटे से मंत्री बनने का मौका मिला।मंत्री रहते हुए उन्होंने विकास, जनहित और सामाजिक सरोकारों से जुड़े कई मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई। हालांकि उनका व्यक्तित्व हमेशा सादगी और सहजता से जुड़ा रहा। यही कारण था कि सत्ता में रहने के बावजूद वे आम लोगों के नेता बने रहे। कोयलांचल के मजदूरों की सबसे बुलंद आवाज अगर मन्नान मल्लिक की सबसे बड़ी पहचान किसी एक रूप में थी, तो वह थी मजदूर नेता की। धनबाद और कोयलांचल क्षेत्र के हजारों मजदूर उन्हें अपना नेता मानते थे। वे राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ (आरसीएमएस) और राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर यूनियन के कार्यकारी अध्यक्ष रहे। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) के श्रमिकों के वेतन, सामाजिक सुरक्षा, बेहतर कार्य परिस्थितियों और श्रमिक अधिकारों के लिए उन्होंने वर्षों तक संघर्ष किया। वह केवल कोयला मजदूरों के साथी नहीं थे बल्कि उनके बच्चों के भविष्य के रहनुमा भी थे। वह कोयलांचल की काली चादर में लिपटे मजदूरों के बच्चों को उजले आसमान में उड़ता देखना चाहते थे। अब चाहे झरिया के होरलाडीह में नरेश महतो (नारायण) के घर में गरीब बच्चों की रहनुमाई के लिए चलने वाली लाइब्रेरी हो या उस घर के आंगन में नरेश, सूरज, शमशेर, इसराफ़िल, अख्तर हुसैन, मोहम्मद ऐनुल, कासिम जान, नीरज, भुवनेश्वर, मकसूद की मदद से मजदूरों के बच्चों के लिए चलने वाला स्कूल हो, मन्नान साहब की सरपरस्ती हमेशा बनी रही। वह मजदूरों के घर शादी-ब्याह या कोई भी आयोजन हो बुलाने पार जरूर आते थे। इतना ही नहीं वह अपने घर में होने वाली किसी भी शादी में मजदूरों को आमंत्रित करने से नहीं चूकते थे। उनके बड़े बेटे की कोलकाता में हुई शादी के दौरान 'सेहरा' गाने (इस्लामिक शादी की एक रस्म) के लिए सूरज (जिसे उन्होंने कभी सूरज नहीं बल्कि शंकर ही बुलाया) और इसराफ़िल को बारात लेकर गए थे। उन्होंने होरलाडीह में एक शादी के दौरान सूरज के कंधे पर हाथ रखकर कहा था, "भगवान ने तुम्हारे अंदर असीम क्षमता दी है, हो सके तो यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) की परीक्षा की तैयारी जरूर करना। मैं तुम्हारी हर मुमकिन मदद करूंगा।" ऐसी न जाने कितनी दास्तान मन्नान मल्लिक को ऊंचे मुकाम पर बैठता है। कोयले की खदानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए मन्नान मल्लिक सिर्फ नेता नहीं, बल्कि भरोसे का नाम थे। मजदूरों की समस्याओं को सरकार और प्रबंधन तक पहुंचाने में उनकी भूमिका हमेशा अहम रही। सरल स्वभाव ने दिलाई अलग पहचान राजनीतिक मतभेद अपनी जगह थे लेकिन मन्नान मल्लिक के सरल व्यवहार की चर्चा विरोधी दलों में भी होती थी। लोगों से सहजता से मिलना, उनकी समस्याएं सुनना और हर वर्ग के लोगों के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखना उनकी खास पहचान थी। इसी वजह से वे सिर्फ कांग्रेस के नेता नहीं बल्कि धनबाद और कोयलांचल की सामाजिक जिंदगी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे। जिंदगी के आखिरी दिनों में आया बड़ा कानूनी फैसला मन्नान मल्लिक के जीवन का अंतिम सप्ताह कई मायनों में चर्चा का विषय रहा। निधन से महज चार दिन पहले धनबाद के बहुचर्चित मटकुरिया गोलीकांड मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने उन्हें समेत 30 आरोपियों को दंगा, सरकारी कार्य में बाधा और आगजनी के मामलों में दोषी ठहराते हुए अधिकतम तीन वर्ष की सजा सुनाई थी। हालांकि अदालत ने हत्या, हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट जैसी गंभीर धाराओं में साक्ष्य के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। सजा के बाद सभी दोषियों को जमानत भी मिल गई थी। यह मामला 27 अप्रैल 2011 का था, जब बीसीसीएल के क्वार्टरों से अतिक्रमण हटाने पहुंची पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। हालात बिगड़ने पर पुलिस फायरिंग में चार लोगों की मौत हो गई थी। लगभग 15 साल बाद इस मामले में फैसला आया। एक दौर का अंत मन्नान मल्लिक का निधन सिर्फ एक पूर्व मंत्री का निधन नहीं है बल्कि झारखंड की उस राजनीतिक पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत भी है, जिसने संगठन, जनसंघर्ष और श्रमिक राजनीति को अपनी पहचान बनाया। आज जब राजनीति में जनसंपर्क की जगह डिजिटल संवाद बढ़ता जा रहा है, ऐसे समय में मन्नान मल्लिक जैसे नेताओं की याद इसलिए भी आती है क्योंकि उन्होंने अपनी पहचान मंचों से नहीं बल्कि लोगों के बीच जाकर बनाई थी। धनबाद की गलियों से लेकर कोयले की खदानों तक और विधानसभा से लेकर मंत्री पद तक... उनका सफर संघर्ष, जनसेवा और मजदूरों के अधिकारों के लिए लगातार उठाई गई आवाज की कहानी बनकर हमेशा याद किया जाएगा।



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