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मुंबई: हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर की सबसे मधुर और संवेदनशील आवाज़ों में शुमार प्रसिद्ध पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर का रविवार रात मुंबई में संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसी गायिका को खो दिया, जिसकी आवाज ने दशकों तक प्रेम, विरह और भावनाओं को सुरों में पिरोकर श्रोताओं के दिलों तक पहुंचाया। सुमन कल्याणपुर की गायकी में एक अनोखी कोमलता और आत्मीयता थी। उनकी आवाज़ कभी शोर नहीं करती थी बल्कि धीरे-धीरे श्रोता के मन में उतर जाती थी। यही कारण था कि उनके गीत आज भी उतने ही ताजा और भावपूर्ण लगते हैं जितने अपने दौर में थे। हिंदी सिनेमा के उस दौर में, जब संगीत जगत में बड़े नामों का दबदबा था और प्रतिस्पर्धा बेहद तीखी थी, सुमन कल्याणपुर ने गायन को कभी लोकप्रियता पाने का माध्यम नहीं माना। उनके लिए संगीत एक आध्यात्मिक साधना और कला के प्रति समर्पण का माध्यम था। सैकड़ों लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ देने के बावजूद वे हमेशा विनम्र रहीं। मीडिया की चकाचौंध से दूर रहने वाली सुमन को अत्यधिक प्रशंसा भी असहज कर देती थी। यही सादगी उनकी पहचान बन गई। सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को ढाका में प्रसिद्ध बैंकर शंकर राव हेम्माडी के घर हुआ था। 1943 में उनका परिवार मुंबई आकर बस गया। दिलचस्प बात यह है कि संगीत उनका पहला प्रेम नहीं था। किशोरावस्था में उनकी रुचि चित्रकला और दृश्य कलाओं में थी। सेंट कोलंबा हाई स्कूल से शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने प्रतिष्ठित सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लेकर चित्रकला का अध्ययन शुरू किया। हालाँकि परिवार के लोगों ने जब उनकी गायन प्रतिभा को पहचाना, तब उनकी जीवन दिशा बदल गई। उन्होंने सबसे पहले पंडित केशव राव भोले से संगीत की शिक्षा ली और बाद में किराना घराने के उस्ताद खान अब्दुल रहमान खान से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बारीकियाँ सीखीं। इसके बाद उन्होंने मास्टर नवरंग से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। साल 1953 में एक कॉलेज कार्यक्रम में सुमन कल्याणपुर की प्रस्तुति ने महान गायक तलत महमूद को प्रभावित कर दिया। नूरजहाँ के गीतों की उनकी प्रस्तुति सुनकर तलत महमूद ने उनका नाम रिकॉर्डिंग कंपनी एचएमवी को सुझाया। यहीं से उनकी पेशेवर संगीत यात्रा शुरू हुई और उन्होंने उस दौर के बेहद प्रतिस्पर्धी फिल्म संगीत जगत में अपनी अलग पहचान बनाई, जहाँ मंगेशकर बहनों का प्रभाव चरम पर था। करीब तीन दशकों तक चले अपने करियर में पद्म भूषण सम्मानित सुमन कल्याणपुर ने विभिन्न भाषाओं की लगभग 100 फिल्मों के लिए गीत गाए। उनके कई गीत आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं। इनमें “ना तुम हमें जानो” ( बात एक रात की ), “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” ( ब्रह्मचारी ), “ना ना करते प्यार तुम्हीं से करते” ( जब जब फूल खिले , 1965), “मेरा प्यार भी तू है” ( साथी , 1968) जैसे कालजयी गीत शामिल हैं। विशेष रूप से “ना तुम हमें जानो” में उनकी आवाज़ की मिठास और भावनात्मक गहराई आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। वहीं मोहम्मद रफ़ी के साथ गाए गए उनके युगल गीतों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचाया। फिल्म जगत में अक्सर सुमन कल्याणपुर की तुलना लता मंगेशकर से की जाती थी। कई बार रेडियो उद्घोषक भी उनके गीतों को गलती से लता मंगेशकर के नाम से प्रसारित कर देते थे। हालांकि संगीत के जानकार दोनों आवाज़ों के बीच स्पष्ट अंतर महसूस करते थे। सुमन की आवाज़ अपेक्षाकृत अधिक मुलायम, गर्मजोशी भरी और भावनात्मक थी, जो विशेष रूप से रोमांटिक और आत्मीय गीतों में अलग प्रभाव छोड़ती थी। सुमन कल्याणपुर भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी। हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर की यह अनमोल धरोहर अपने गीतों के माध्यम से हमेशा याद की जाएगी। उनकी मधुर, सुकून देने वाली और दिल को छू लेने वाली गायकी ने साधारण प्रेम कहानियों को भी कविता का रूप दिया। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।



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