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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) मोतिहारी। आपदा की चेतावनी का अर्थ ही है, खतरा आने से पहले खबर मिल जाए लेकिन बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में मौसम विभाग की एक मोबाइल चेतावनी ने इसी बुनियादी उद्देश्य पर सवाल खड़ा कर दिया है। बुधवार को जारी मौसम अलर्ट में दोपहर 3:25 बजे से शाम 6:25 बजे तक मेघ गर्जन, वज्रपात और बारिश के साथ 30-40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवा चलने की संभावना जतायी गयी थी। हैरानी की बात यह है कि संबंधित उपभोक्ता के मोबाइल पर यही चेतावनी शाम 6:38 बजे पहुंची, यानी अलर्ट की निर्धारित अवधि खत्म होने के 13 मिनट बाद। दूसरे उपभोक्ता को शाम 6:18 में अलर्ट मिला है यानी चेतावनी की निर्धारित अवधि शाम 6:25 बजे समाप्त होने के 7 मिनट पहले और अवधि के 2 घन्टा 53 मिनट गुजरने के बाद चेतावनी प्राप्त हुई। जब चेतावनी पहुंची, तब खतरे की बतायी गयी अवधि बीत चुकी थी मोबाइल पर मिले संदेश में कहा गया था कि अगले तीन घंटों में क्षेत्र के कुछ स्थानों पर हल्के से मध्यम दर्जे की मेघ गर्जन, वज्रपात और वर्षा के साथ तेज हवा चलने की प्रबल संभावना है। लेकिन जिस अवधि के लिए नागरिक को सावधान किया गया था, उसके समाप्त होने के बाद संदेश का पहुंचना सरकारी चेतावनी तंत्र की समयबद्धता और अंतिम छोर तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। यहां सवाल मौसम विभाग द्वारा पूर्वानुमान लगाने का नहीं, बल्कि पूर्वानुमान को समय पर नागरिक तक पहुंचाने का है। आखिर चेतावनी कब जारी हुई, कब संचार नेटवर्क को भेजी गयी और उपभोक्ता के मोबाइल तक कब पहुंची, इन तीन समय-बिंदुओं का जवाब ही बताएगा कि देरी कहां हुई। नेपाल की बाढ़ की त्रासदी के बाद सवाल और गंभीर यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नेपाल में 26 अगस्त 2026 की भोटेकोशी बाढ़ ने समयपूर्व चेतावनी और आपदा सूचना तंत्र की अहमियत को बेहद दर्दनाक तरीके से सामने रखा। अचानक आयी बाढ़ में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ। उस त्रासदी ने यह सबक फिर सामने रखा कि आपदा में चेतावनी की कीमत केवल उसकी वैज्ञानिक सटीकता से नहीं, बल्कि उसके मिलने के लिए उपलब्ध समय से तय होती है। नेपाल सीमा से सटे पूर्वी चंपारण के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। सीमाई भूगोल के कारण यहां बाढ़, तेज बारिश, नदी के जलस्तर में बदलाव और अन्य मौसमी आपदाओं से जुड़ी चेतावनियों का त्वरित और विश्वसनीय प्रसार नागरिक सुरक्षा का अहम हिस्सा है। लापरवाही विभाग की या नेटवर्क की उपलब्ध स्क्रीनशॉट से केवल संदेश के निर्धारित समय और उसके प्राप्त होने का समय स्पष्ट होता है। इससे सीधे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि देरी मौसम विभाग की थी या दूरसंचार नेटवर्क की। लेकिन, यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि सरकारी चेतावनी व्यवस्था में अंतिम उपभोक्ता तक सूचना पहुंचने की निगरानी कौन करता है और उसकी जवाबदेही किसकी है? मौसम विभाग, आपदा प्रबंधन तंत्र और दूरसंचार सेवा प्रदाता, सभी मिलकर चेतावनी को नागरिक तक पहुंचाने वाली श्रृंखला बनाते हैं। सरकार की मूल भावना तभी जमीन पर उतर सकती है जब सूचना सही, सटीक और सबसे महत्वपूर्ण, समय पर पहुंचे। 13 मिनट की देरी को मामूली मानना कितना उचित सामान्य सूचना के मामले में 13 मिनट की देरी शायद बड़ी बात न लगे, लेकिन वज्रपात, आंधी, तेज बारिश या अचानक बाढ़ जैसी आपदा में कुछ मिनट भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। किसी व्यक्ति के लिए यही समय घर से सुरक्षित स्थान तक पहुंचने, खेत से लौटने या खुले इलाके से हटने के लिए निर्णायक हो सकता है। इसलिए, इस अलर्ट को महज एक मोबाइल संदेश की तकनीकी देरी मानकर छोड़ने के बजाय इसकी तकनीकी जांच जरूरी है। संबंधित तंत्र को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चेतावनी किस समय जनरेट हुई, किस समय प्रसारित की गयी और दूरसंचार नेटवर्क ने उसे किस समय अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाया क्योंकि आपदा चेतावनी का मूल्य इस बात में नहीं है कि सरकार ने चेताया था; असली कसौटी यह है कि नागरिक को चेतावनी खतरा आने से पहले मिली या खतरे की घड़ी गुजर जाने के बाद।



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