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नई दिल्ली। पानी बचाने की असली सफलता किसी बांध, तालाब, चेकडैम या जल-संरचना के निर्माण में नहीं, बल्कि तब दिखाई देती है जब कोई गांव पानी को अपनी साझा जिम्मेदारी मानने लगे। जल-संरक्षण का अर्थ केवल पानी को रोकना नहीं है। इसका अर्थ मिट्टी को बचाना, भूजल का पुनर्भरण करना, खेती को टिकाऊ बनाना और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन की संभावना बचाए रखना है। इसी व्यापक अर्थ में मुंगेर के किशोर जायसवाल की तीन दशक से अधिक लंबी जल-संरक्षण यात्रा को देखा जाना चाहिए। बदल गए पानी के पुराने समीकरण आज जलवायु परिवर्तन ने पानी के पुराने समीकरणों को बदल दिया है। कहीं बारिश कम हो रही है, कहीं कम समय में अत्यधिक वर्षा हो रही है। बाढ़ और सूखे की स्थितियां एक ही भू-दृश्य में साथ दिखाई देने लगी हैं। भूजल पर दबाव बढ़ रहा है, तालाब और पारंपरिक जलस्रोत सिकुड़ रहे हैं, मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और नदियों पर प्रदूषण का दबाव लगातार बना हुआ है। ऐसे समय में पानी का सवाल केवल जल-संसाधन का सवाल नहीं रह जाता। वह खेती, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता का सवाल बन जाता है इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय जल सप्ताह 2026 में जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता को जल-विमर्श के केंद्र में रखना महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य केवल संवाद और विचार-विमर्श तक सीमित रहना नहीं, बल्कि जल-संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए ऐसे व्यावहारिक और सहयोगात्मक समाधान तलाशना है, जो धरातल पर लागू किए जा सकें और बदलती जलवायु की चुनौतियों का सामना कर सकें। पुराने ढर्रे से आगे का सवाल बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, बढ़ती बाढ़, सूखे की आशंका और भूजल पर बढ़ते दबाव ने स्पष्ट कर दिया है कि जल प्रबंधन अब पुराने ढर्रे पर नहीं चल सकता। प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमारे पास कितना पानी उपलब्ध है, बल्कि यह भी है कि हम पानी, नदियों, वनों, मिट्टी और जलग्रहण क्षेत्रों को परस्पर जुड़े हुए तंत्र के रूप में किस हद तक समझ पा रहे हैं इसलिए जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन का अर्थ केवल नई तकनीकों को अपनाना या नई परियोजनाएं शुरू करना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ ऐसी समग्र जल-दृष्टि विकसित करना है, जिसमें प्रकृति की अंतर्निहित जल-संरक्षण क्षमता, स्थानीय समुदायों का अनुभव और वैज्ञानिक ज्ञान मिलकर काम करें। संवाद तभी सार्थक होगा, जब वह नीति और योजना से आगे बढ़कर धरातल पर ठोस कार्रवाई का रूप ले सके। इसी संदर्भ में किशोर जायसवाल की जल-संरक्षण यात्रा महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने जल को किसी एक परियोजना या संरचना तक सीमित नहीं किया, बल्कि उसे मिट्टी, खेती, भूजल, जलग्रहण क्षेत्र और ग्रामीण आजीविका से जोड़कर देखा। उनके काम की महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि पानी बचाने की जिम्मेदारी को समुदाय की जिम्मेदारी में बदलने का प्रयास किया गया। बारिश की हर बूंद का हिसाब किशोर जायसवाल के लिए जल-संकट का अर्थ केवल कम बारिश नहीं है। असली सवाल यह है कि बारिश कहां होती है, कितना पानी बहकर निकल जाता है, अपने साथ कितनी उपजाऊ मिट्टी ले जाता है, कितना पानी जमीन में उतरता है और कितना खेत की मिट्टी में नमी बनकर रह जाता है। इस सोच ने उनके काम को केवल जल-संरचना निर्माण से आगे बढ़ाकर जलग्रहण और ग्रामीण विकास के व्यापक क्षेत्र से जोड़ा। उन्होंने सोसाइटी फॉर वाटरशेड एंड रूरल डेवलपमेंट के माध्यम से जल, मिट्टी, कृषि और ग्रामीण आजीविका को एक साथ देखने की कोशिश की। उनका अनुभव बताता है कि जल-सुरक्षित गांव केवल बेहतर खेती की बुनियाद नहीं है, बल्कि पशुपालन, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए भी जरूरी है। निर्माण के बाद असली परीक्षा चेकडैम, खेत-तालाब, कुएं, मेड़बंदी और वर्षाजल-संचयन जैसी संरचनाएं इस काम का एक हिस्सा हैं। लेकिन संरचना बना देना समाधान का अंत नहीं है। उसके बाद उसकी देखभाल कौन करेगा? पानी का उपयोग कैसे होगा? गांव में उपलब्ध पानी और खेती की जरूरत के बीच संतुलन कैसे बनेगा? इन सवालों के जवाब में ही किसी जल-संरचना की वास्तविक सफलता छिपी होती है इसीलिए उनके काम में सहभागी आकलन, किसानों का प्रशिक्षण, सामुदायिक योगदान, श्रमदान और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ग्रामीणों को केवल लाभार्थी मानने के बजाय सहभागी और संरक्षक बनाना उनकी कार्य-दृष्टि का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इस दृष्टि का क्रम स्पष्ट है—बारिश से बहाव, बहाव से मिट्टी का कटाव, मिट्टी के संरक्षण से भूजल पुनर्भरण, भूजल और मिट्टी की नमी से बेहतर खेती और बेहतर खेती से आजीविका की सुरक्षा। यानी पानी को अकेले बचाया नहीं जा सकता; पानी के साथ पूरे ग्रामीण जीवन-तंत्र को देखना होगा। सहयोग बना संरक्षण का आधार उनके काम का विस्तार भी इसी दृष्टि की ओर संकेत करता है। विभिन्न संस्थाओं और सरकारी योजनाओं के साथ मिलकर उन्होंने अनेक जलग्रहण परियोजनाओं और गांवों में काम किया। सरकारी योजनाओं, नाबार्ड, पंचायतों, तकनीकी संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और समुदाय के बीच सहयोग को उन्होंने जल-संरक्षण का आधार बनाया। इसमें ग्राम पंचायत की भूमिका विशेष महत्व रखती है। गांव की जल-सुरक्षा तभी टिकाऊ हो सकती है, जब पंचायत जल-संसाधनों को केवल किसी विभाग की परियोजना न मानकर स्थानीय सार्वजनिक संपत्ति के रूप में देखे। मनरेगा जैसी योजनाओं को तालाब, कुएं, चेकडैम, पारंपरिक जलस्रोतों और भूजल पुनर्भरण से जोड़ना ग्रामीण जल-सुरक्षा को रोजगार और स्थानीय विकास से जोड़ सकता है। परंपरा और विज्ञान का संवाद किशोर जायसवाल की कार्य-दृष्टि में परंपरा और आधुनिक विज्ञान का विरोध नहीं, बल्कि उनका संवाद दिखाई देता है। बिहार की पुरानी आहर-पाइन जैसी जल-परंपराओं से लेकर जल-विज्ञान, भौगोलिक सूचना प्रणाली, दूरसंवेदी तकनीक, मौसम संबंधी आंकड़ों, मिट्टी की जांच और जल-गुणवत्ता परीक्षण तक—हर साधन का उपयोग स्थानीय परिस्थितियों को समझने के लिए किया जा सकता है।यहीं से जल-बजट की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी गांव में कितना पानी आया, कितना बह गया, कितना जमीन में उतरा, कितना उपलब्ध रहा और फसलों को कितने पानी की जरूरत है—इन सवालों का हिसाब हुए बिना जल-सुरक्षा की योजना अधूरी रहेगी। पानी को असीमित संसाधन मानकर खेती करने के बजाय उपलब्ध पानी के अनुरूप फसल-योजना बनाना भविष्य की कृषि की महत्वपूर्ण दिशा हो सकती है। इसका संबंध मिट्टी और खाद्य सुरक्षा से भी है। जरूरत से अधिक सिंचाई, असंतुलित उर्वरक उपयोग और एक ही तरह की फसल पर अत्यधिक निर्भरता मिट्टी और पानी दोनों पर दबाव डाल सकती है। इसलिए जल-संरक्षण के साथ मिट्टी का स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण, बागवानी, सूक्ष्म सिंचाई और सुरक्षित खाद्य उत्पादन को जोड़ना जरूरी है। हर भू-दृश्य का अलग जल-विज्ञान मुंगेर के हवेली खड़गपुर क्षेत्र के पहाड़पुर और बांका के उल्ही नाला जलग्रहण क्षेत्र में हुए कामों का अनुभव यही बताता है कि हर भू-दृश्य का अपना जल-विज्ञान होता है। लगभग 989.92 हेक्टेयर क्षेत्र वाले उल्ही नाला जलग्रहण में जल-संचयन, मृदा एवं नमी संरक्षण, खेत-तालाब, चेकडैम, पारंपरिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन, चारे और कृषि विविधीकरण जैसे प्रयासों को आजीविका से जोड़ने की कोशिश की गई। इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—जल प्रबंधन में एक ही प्रारूप हर जगह लागू नहीं किया जा सकता। नदी से पहले जलग्रहण को समझें गंगा जैसी बड़ी नदी को बचाने के सवाल पर भी यही दृष्टि लागू होती है। नदी और जलग्रहण क्षेत्र को अलग-अलग देखने से समाधान अधूरा रह जाता है। नदी की सेहत उसके ऊपरी भू-दृश्य, जंगल, खेत, मिट्टी और जलस्रोतों से जुड़ी है। यदि वर्षाजल तेजी से बहकर निकल जाए, भूजल का पुनर्भरण न हो, मिट्टी का कटाव बढ़े और खेतों तथा बस्तियों से प्रदूषण नदी में पहुंचे, तो केवल नदी की सफाई से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। यही वह बिंदु है जहां किशोर जायसवाल का जल-संरक्षण अनुभव नदी-पुनर्जीवन के व्यापक विमर्श से जुड़ता है। स्वस्थ नदी की शुरुआत स्वस्थ जलग्रहण क्षेत्र से होती है। नदी को बचाने का अर्थ उसके प्रवाह को समझना, उसके जलग्रहण क्षेत्र को बचाना और उस पूरे भू-दृश्य को सुरक्षित करना है, जो नदी को पानी देता है। जल-संरक्षण के इस काम में संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जल-आंदोलन से जुड़े राजेंद्र सिंह और पद्मश्री राधा भट्ट जैसे लोगों के साथ संवाद और अनुभवों ने इस दृष्टि को व्यापक बनाया है कि पानी केवल अभियंत्रण का विषय नहीं, बल्कि समाज, प्रकृति और जीवन का साझा प्रश्न है। सम्मान से बड़ी विचार की स्वीकृति किशोर जायसवाल को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुंगेर के पोलो मैदान में जिला प्रशासन द्वारा प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित किया जाना उनके काम की सामाजिक स्वीकृति का एक संकेत है। सम्मान का महत्व केवल व्यक्तिगत उपलब्धि में नहीं है। असली महत्व उस विचार का है कि जल, मिट्टी और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का काम ग्रामीण समाज की सामूहिक शक्ति से संभव है। तीन दशक से अधिक की इस यात्रा में एक बदलाव साफ दिखाई देता है—संरचना से व्यवस्था की ओर, लाभार्थी से सहभागी की ओर, जल-संचयन से जल-बजट की ओर और उत्पादन से टिकाऊ आजीविका की ओर। जलवायु संकट के वर्तमान दौर में यह बदलाव और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भू-स्थानिक तकनीक, मौसम की सूचनाएं, मिट्टी परीक्षण, जल-गुणवत्ता निगरानी, सूक्ष्म सिंचाई और अंकीय बाजार कृषि तथा जल प्रबंधन को नई दिशा दे सकते हैं। लेकिन तकनीक का स्थान समुदाय की जगह लेना नहीं, बल्कि समुदाय की समझ को मजबूत करना होना चाहिए। किसी गांव की जल-व्यवस्था का सबसे बड़ा विशेषज्ञ कई बार वही किसान होता है, जिसने पीढ़ियों से उस मिट्टी, ढलान, नाले और मौसम को देखा है। गांव से निकलेगा समाधान इसीलिए जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन का रास्ता केवल बड़ी परियोजनाओं से नहीं निकलेगा। वह गांवों की धरती, किसानों के अनुभव, स्थानीय जल-परंपराओं, वैज्ञानिक समझ और सामुदायिक भागीदारी से होकर गुजरेगा। पानी को बचाने के लिए केवल पानी को नहीं, उस पूरे भू-दृश्य को बचाना होगा जो पानी को जन्म देता है, रोकता है और धीरे-धीरे जीवन में बदलता है। किशोर जायसवाल की कहानी किसी एक व्यक्ति की उपलब्धियों की कहानी भर नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें पानी को विकास की वस्तु नहीं, जीवन की साझी पूंजी माना जाता है। इसमें नदी है, जंगल है, खेत है, मिट्टी है, किसान है और सबसे बढ़कर वह समुदाय है, जो अपने संसाधनों का मालिक और संरक्षक बनता है। आखिर एक बूंद केवल एक बूंद नहीं होती। वह मिट्टी में जाती है तो नमी बनती है, नमी से फसल बचती है, फसल से किसान बचता है, किसान से गांव बचता है और गांव से सभ्यता की निरंतरता। समाधान हमारे आसपास है आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन के बीच जल-सुरक्षा के नए रास्ते खोज रही है, तब किशोर जायसवाल जैसे जमीनी अनुभव यह याद दिलाते हैं कि समाधान कहीं बहुत दूर नहीं है। बारिश को समझना होगा, पानी को रोकना होगा, मिट्टी को बचाना होगा, जलग्रहण क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना होगा और समुदाय को निर्णय की प्रक्रिया में केंद्र में रखना होगा क्योंकि जिस समाज को पानी के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, उसकी स्वतंत्रता अधूरी है। और जिस समाज को अपने पानी, मिट्टी और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का सामूहिक विवेक मिल जाए, उसके पास भविष्य को बचाने की सबसे बड़ी ताकत होती है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं जनसरोकारों के टिप्पणीकार हैं।)



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