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मोतिहारी। बच्चे के जन्म के बाद आमतौर पर पहली आवाज रोने की होती है और पहली तलाश मां की गोद की लेकिन बिहार के पूर्वी चंपारण में सामने आए दो मामलों ने इस स्वाभाविक रिश्ते के बीच एक ऐसी भयावह तस्वीर खड़ी कर दी है, जहां नवजात की पहली दुनिया कथित तौर पर प्यार नहीं बल्कि पैसों के सौदे से शुरू होने वाली थी। पिछले करीब दस दिनों में जिले में नवजातों की खरीद-फरोख्त के दो मामले सामने आए हैं। पुलिस ने दोनों मामलों में दो नवजातों को बरामद किया और कुल 13 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने कथित सौदों से जुड़े लाखों रुपये की नकदी भी बरामद की है। दोनों घटनाएं अलग-अलग स्थानों पर हुईं, लेकिन उनके बीच दिखाई देती समान कड़ियां अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं, क्या पूर्वी चंपारण, नवजातों की खरीद-फरोख्त का बाजार बन गया है, जिसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा है? इस सवाल का जवाब पुलिस की जांच से सामने आना बाकी है। अनजानी गोद में मिली नवजात गुरुवार देर शाम पकड़ीदयाल में पुलिस ने नवजात की खरीद-फरोख्त के मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, एक नवजात को एम्बुलेंस और ऑल्टो कार से चोरमा कोठी बाजार की ओर ले जाए जाने की सूचना मिली थी। सूचना मिलते ही पुलिस गश्ती दल, एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट और एसटीएफ की संयुक्त टीम सक्रिय हुई। चोरमा कोठी बाजार के पास दोनों वाहनों को रोककर तलाशी ली गई। पुलिस के अनुसार, एम्बुलेंस में एक महिला नवजात को गोद में लिए मिली। दोनों वाहनों में कुल आठ संदिग्ध मौजूद थे। पूछताछ के दौरान नवजात को खरीदकर ले जाने की बात सामने आई। पुलिस ने मौके से एक नवजात, एम्बुलेंस, ऑल्टो कार, नौ मोबाइल फोन और 1.12 लाख रुपये नकद बरामद किए। गिरफ्तार लोगों में गौतम कुमार, चंदन राम, छोटु कुमार, कुणाल कुमार, गुड्डु कुमार समेत तीन महिलाएं शामिल हैं। दस दिन पहले डेढ़ लाख रुपये में तय हुआ था सौदा यह घटना जिले में सामने आया पहला मामला नहीं है। 24 अगस्त को मोतिहारी में जन्म के कुछ ही समय बाद एक नवजात को डेढ़ लाख रुपये में बेचने का मामला सामने आया था। नगर थाना पुलिस ने सदर अस्पताल चौक के पास कार्रवाई करते हुए नवजात को सकुशल बरामद किया था। पुलिस ने सौदे के लिए रखे 1.50 लाख रुपये नकद भी जब्त किए। पुलिस के अनुसार, नवजात को घोड़ासहन थाना क्षेत्र के लैन बसवरिया निवासी चिंता देवी को सौंपे जाने की तैयारी थी। सौदा पूरा होने से पहले पुलिस मौके पर पहुंच गई। इस मामले में नवजात के माता-पिता इंदू देवी और प्रमोद साहनी, कथित बिचौलिया तान्या खातून उर्फ कुरेशा खातून, आशा कार्यकर्ता शोभा सिंह और कथित खरीदार चिंता देवी को गिरफ्तार किया गया। दो नवजात बच गए लेकिन सवाल बचा रह गया पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने दोनों नवजातों को कथित सौदे का हिस्सा बनने से पहले बचा लिया। लेकिन इन घटनाओं ने एक ऐसा सवाल छोड़ दिया है जिसका जवाब केवल गिरफ्तारी से नहीं मिलेगा। किसने सौदा तय किया? किसने खरीदार तलाशा? कौन अस्पताल और परिवार के बीच संपर्क बना रहा था? क्या ऐसे और बच्चे भी इस नेटवर्क के निशाने पर हैं या आ चुके हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या ये महज दो अलग-अलग अपराध हैं या किसी बड़े मानव तस्करी तंत्र की छोटी-सी दिखाई दे रही कड़ी? इन सवालों का जवाब पुलिस जांच में तलाशा जाना है। जहां जन्म उत्सव होना चाहिए, वहां सौदे की छाया अस्पताल के बाहर किसी नवजात के जन्म की खबर आमतौर पर परिवार के लिए उत्सव होती है। मां की आंखों में थकान के साथ खुशी होती है। पिता भविष्य के सपने देखता है। रिश्तेदार मिठाई बांटते हैं। लेकिन इन घटनाओं में पहले से तैयार बाजार में जन्म के बाद रुपये की गिनती हुई। एक तरफ वह मां है जो अपने बच्चे को सीने से लगाकर उसकी पहली सांस महसूस करती है। दूसरी तरफ वह भयावह दुनिया है, जहां उसी बच्चे की कीमत तय हुई है। नवजात बोल नहीं सकता। वह सौदा रोक नहीं सकता। वह यह भी नहीं पूछ सकता कि उसे किसके हाथों सौंपा जा रहा है। उसकी दुनिया में सिर्फ दो चीजें होनी चाहिए, सुरक्षा और मां की गोद। जब वहां पैसे आ जाते हैं, तो अपराध सिर्फ कानून नहीं तोड़ता, वह इंसानियत की सबसे सीमा को भी तोड़ देता है। असली चुनौती गिरफ्तारी से आगे की है इन मामलों में पुलिस की कार्रवाई महत्वपूर्ण है, लेकिन जांच की असली कसौटी अब आगे है। यदि किसी संगठित नेटवर्क की मौजूदगी सामने आती है, तो उसकी कड़ियों को अस्पतालों, बिचौलियों, परिवहन साधनों, संभावित खरीदारों और उन लोगों तक तलाशना होगा जो नवजातों को हासिल करने या उनके दस्तावेजों की व्यवस्था करने में भूमिका निभा सकते हैं। जांच का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि किसने बच्चे को बेचा और किसने खरीदा। सवाल यह भी होना चाहिए कि इस सौदे तक पहुंचने का रास्ता किसने बनाया? दो नवजात पुलिस ने बचा लिए हैं। लेकिन यदि इस अंधेरे कारोबार की जड़ें इससे कहीं गहरी हैं, तो यह कहानी दो बच्चों की बरामदगी के साथ खत्म नहीं होगी। क्योंकि किसी बच्चे की कीमत रुपये में तय होने लगे, तो वहां सिर्फ एक अपराध जन्म नहीं लेता, इंसानियत की मौत से पैदा हुई सड़ांध भी महसूस होती है। शायद ही कही, ऐसा बाजार होगा, जहां किलकारी गूंजने से पहले किसी नवजात की दुकान सजती होगी, सौदा तय होता होगा और बोली लगती होगी, “बच्चा बिकता है... बोलो, खरीदोगे?” यह कल्पना नहीं हकीकत है, जो अमानवीय ही नहीं भयावह भी है।



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