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नई दिल्ली। कुछ आवाजें सिर्फ सुनी नहीं जातीं, वे समय के भीतर बस जाती हैं, पीढ़ियों के बीच पुल बनाती हैं, स्मृतियों को सहारा देती हैं और बीते युगों को फिर से जिंदा कर देती हैं, पंडवानी की ऐसी ही विलक्षण आवाज रही तीजन बाई, जो सिर्फ पंडवानी नहीं गाती थीं, वह महाभारत को जीती थीं, उसे अपने भीतर से निकालकर श्रोताओं की धड़कनों में उतार देती थीं; अब जब इस दुनिया से वह विदा हो गई हैं तो ऐसा लगता है, “दीया खामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है, चले आओ जहां तक रोशनी मालूम होती है।” वह सिर्फ कलाकार नहीं थीं, लोक स्मृति की जीवित विरासत थीं तीजन बाई का जाना किसी एक लोकगायिका का जाना भर नहीं है। यह उस परंपरा की गूंज का धीमा पड़ जाना है, जिसने सदियों तक किताबों से नहीं, बल्कि इंसानी आवाज़ों, चौपालों, कथाओं और स्मृतियों के सहारे खुद को बचाए रखा। उन्होंने महाभारत को सिर्फ सुनाया नहीं, उसे अपने कंठ, अपने हाव-भाव, अपनी देहभाषा और अपने विश्वास से इस तरह जिया कि मंच पर बैठा एक अकेला कलाकार पूरे कुरुक्षेत्र का संसार रच देता था। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी द्रौपदी की पीड़ा और कभी कृष्ण की करुणा। एक बच्ची, एक कथा और फिर उम्र भर का रिश्ता छत्तीसगढ़ के गनियारी गांव में 24 अप्रैल 1956 को जन्मी तीजन बाई ऐसे घर में पली-बढ़ीं, जहां कहानियां किताबों में नहीं, लोगों की यादों में रहती थीं। उनके नाना बृजलाल पर्धी ने उन्हें बचपन में महाभारत की कथा सुनाई। शायद उसी दिन एक बीज उनके भीतर पड़ गया था। वह बीज आगे चलकर एक ऐसी साधना में बदल गया, जिसने तीजन बाई को सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि महाभारत की जीवित आवाज बना दिया। उन्होंने कथा को याद नहीं किया, उन्होंने उसे महसूस किया। उनके लिए भीम सिर्फ एक योद्धा नहीं थे, द्रौपदी सिर्फ एक रानी नहीं थीं और कृष्ण सिर्फ एक देवता नहीं थे। उनके भीतर हर पात्र की धड़कन सुनाई देती थी। जब समाज ने रोका तो उन्होंने कला से जवाब दिया लेकिन, तीजन बाई की राह आसान नहीं थी। जिस कपालिक शैली में उन्होंने पंडवानी गाई, वह लंबे समय तक पुरुषों की शैली मानी जाती रही। ऐसे में एक गांव की लड़की का मंच पर उसी आत्मविश्वास और उसी जोश के साथ महाभारत सुनाना समाज के कई लोगों को मंजूर नहीं था। विरोध हुआ, ताने मिले, तिरस्कार झेलना पड़ा, यहां तक कि सामाजिक बहिष्कार का दर्द भी सहना पड़ा। लेकिन, कुछ लोग टूटने के लिए नहीं, इतिहास बदलने के लिए जन्म लेते हैं। तीजन बाई ने भी वही किया। उन्होंने शिकायत नहीं की, उन्होंने अपनी कला को और धार दी। हर मंच पर, हर प्रस्तुति में, हर शब्द के साथ उन्होंने यह साबित किया कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता, उसकी सिर्फ एक पहचान होती है—उसकी सच्चाई। हबीब तनवीर ने पहचानी वह चमक, जिसे दुनिया ने बाद में सलाम किया कहते हैं, असली प्रतिभा देर-सवेर अपनी राह बना ही लेती है। तीजन बाई के जीवन में यह मोड़ तब आया, जब मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें मंच पर देखा। उन्होंने उसी पल पहचान लिया कि यह आवाज़ साधारण नहीं है। इसके बाद तीजन बाई गांव की चौपालों से निकलकर बड़े-बड़े मंचों तक पहुंचीं। जो कलाकार कभी स्वीकार्यता के लिए संघर्ष कर रही थी, वही आगे चलकर भारत की लोकधरोहर की सबसे मजबूत आवाज बन गई। उनकी पंडवानी सुनना, मानो महाभारत के भीतर प्रवेश करना था तीजन बाई का प्रदर्शन देखना किसी कार्यक्रम में बैठना नहीं था, वह एक अनुभव था—गहरा, तीखा, भावनाओं से भरा हुआ। वह जब द्रौपदी के चीरहरण का प्रसंग सुनातीं तो श्रोताओं के भीतर अपमान की आग उठने लगती। जब भीम का क्रोध उनकी आवाज में उतरता तो लगता जैसे धरती कांप रही हो। जब अर्जुन का द्वंद्व सामने आता, तो मन अपने ही सवालों से भर जाता। और जब कृष्ण धर्म और कर्तव्य की बात करते, तो वह सिर्फ पौराणिक संवाद नहीं रह जाता, वह जीवन का सच बन जाता। यही तीजन बाई की सबसे बड़ी ताकत थी, वह कथा को आज में बदल देती थीं। भाषा की दीवार भी उनकी आवाज के सामने छोटी पड़ गई पंडवानी की जड़ें छत्तीसगढ़ी में थीं लेकिन तीजन बाई की कला किसी एक भाषा की मोहताज नहीं रही। उनके प्रदर्शन को देखने वाले बहुत से लोग शायद हर शब्द नहीं समझते थे लेकिन हर भावना समझ जाते थे। दुख, साहस, अपमान, प्रतिशोध, प्रेम, करुणा, धर्म, इन भावों को उन्होंने ऐसी सच्चाई से जिया कि भाषा पीछे छूट गई और संवेदना आगे निकल आई। इसीलिए, भारत ही नहीं, विदेशों के दर्शक भी उनके सामने मंत्रमुग्ध बैठते थे। यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया तक उन्होंने पंडवानी की गूंज पहुंचाई, लेकिन हर मंच पर उनके साथ छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू भी जाती रही। सम्मान मिले, लेकिन जड़ों से रिश्ता कभी नहीं टूटा तीजन बाई को पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे बड़े सम्मान मिले। लेकिन, इन पुरस्कारों से भी बड़ी बात यह थी कि उन्होंने अपनी कला की आत्मा को कभी बदलने नहीं दिया। वह मंचों पर चमकीं, दुनिया ने सराहा, लेकिन उनके भीतर वही सादगी बनी रही जो गनियारी गांव की मिट्टी ने उन्हें दी थी। वह खुद को हमेशा महाभारत की एक विद्यार्थी मानती रहीं, उसकी मालकिन नहीं। शायद यही विनम्रता उन्हें और भी बड़ा बनाती है। उन्होंने सिर्फ पंडवानी नहीं बचाई, नई पीढ़ी को रास्ता दिखाया जब बहुत-सी लोककलाएं आधुनिक समय की भागदौड़ में पीछे छूटती जा रही थीं, तीजन बाई ने पंडवानी को सिर्फ जीवित नहीं रखा, बल्कि उसे गर्व के साथ दुनिया के सामने खड़ा किया। उन्होंने खासकर युवा कलाकारों और महिलाओं को यह भरोसा दिया कि लोककला कोई पिछड़ी हुई चीज़ नहीं, बल्कि वह सांस्कृतिक ताकत है जो पूरी दुनिया को छू सकती है। जिस शैली में कभी महिलाओं के लिए जगह नहीं मानी जाती थी, उसी में तीजन बाई सबसे बड़ा नाम बनकर उभरीं। यह उनकी कला से भी बड़ी विरासत है। तीजन बाई का जाना अंत नहीं, एक गूंज की शुरुआत है उनकी विदाई एक खालीपन छोड़ती है—ऐसा खालीपन जिसे शब्दों में पूरी तरह भर पाना मुश्किल है। लेकिन कुछ लोग चले जाने के बाद खत्म नहीं होते, वे अपनी कला में बस जाते हैं। जब भी कोई युवा कलाकार तंबूरा उठाकर महाभारत की कथा शुरू करेगा, जब भी किसी गांव की चौपाल में पंडवानी की आवाज़ उठेगी, जब भी कोई श्रोता यह महसूस करेगा कि हजारों साल पुरानी कथा आज भी दिल को छू सकती है—वहां कहीं न कहीं तीजन बाई मौजूद होंगी। एक युग का अंत, लेकिन विरासत हमेशा जिंदा तीजन बाई ने हमें यह याद दिलाया कि सभ्यता सिर्फ इमारतों, किताबों और इतिहास की तारीखों से नहीं बनती। वह उन आवाज़ों से भी बनती है, जो पीढ़ियों की स्मृतियों को अपने भीतर लेकर चलती हैं। उन्होंने महाभारत को गाया, लेकिन सच तो यह है कि उन्होंने भारत की लोक आत्मा को आवाज दी। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनकी पंडवानी, उनकी आवाज़, उनका अभिनय और उनका साहस आने वाले समय में भी भारतीय संस्कृति के सबसे चमकदार अध्यायों में दर्ज रहेगा। कुछ लोग अपने जीवन से बड़े हो जाते हैं। तीजन बाई उन्हीं में से एक थीं। उनका जीवन वर्षों में नहीं, बल्कि उन दिलों में मापा जाएगा जिन्हें उन्होंने छुआ, उन परंपराओं में जिन्हें उन्होंने बचाया, और उन आवाज़ों में जो आगे भी उनके सुरों की छाया लेकर गूंजती रहेंगी।तीजन बाई चली गई हैं, लेकिन महाभारत को गाने वाली वह आवाज़ अब भारतीय स्मृति का हिस्सा बन चुकी है—हमेशा के लिए।