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एवियन (फ्रांस)/नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक साझेदारियों में विश्वास को सबसे बड़ी ताकत बताया और कहा कि दुनिया आज संसाधनों की नहीं बल्कि भरोसे की कमी का सामना कर रही है और स्थायी शांति एवं विकास के लिए सभी देशों को समान भागीदार के रूप में साथ काम करना होगा। श्री मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन में "नई साझेदारियां गढ़ना और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का पुनर्निर्माण" विषय पर अपने संबोधन में कहा कि आज दुनिया पहले से कहीं अधिक आपस में जुड़ी हुई और एक-दूसरे पर निर्भर है। ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि जैसी चुनौतियां अब किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। ऐसे समय में देशों के बीच मजबूत और भरोसेमंद साझेदारियों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। 'विश्वास ही सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति' प्रधानमंत्री ने कहा कि आज सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति कोई खनिज, प्रौद्योगिकी या बाजार नहीं बल्कि आपसी विश्वास है। प्रौद्योगिकी और आपूर्ति श्रृंखलाओं का इस्तेमाल हथियार के रूप में नहीं बल्कि वैश्विक कल्याण के लिए होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास के अवसर कुछ देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए और वैश्विक संस्थानों को सभी देशों की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम बनाना होगा। कोविड-19 महामारी ने दुनिया को यह दिखा दिया कि वैश्विक एकजुटता के कई दावे कितने कमजोर थे। 'दुनिया भरोसे की कमी से जूझ रही है' श्री मोदी ने कहा कि दुनिया संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि भरोसे की कमी से पीड़ित है। इसलिए भविष्य की साझेदारियों का आधार विश्वास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भावी पीढ़ियों के लिए नए दौर के अनुरूप भरोसेमंद नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण करना समय की मांग है। भारत ने हमेशा दुनिया को परिवार माना प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने सदैव पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखा है। भारत के सभी प्रयास "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" के सिद्धांत पर आधारित रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसी सोच के तहत भारत ने इंटरनेशनल सोलर एलायंस, डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर गठबंधन, ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस, मिशन लाइफ और "एक पेड़ मां के नाम" जैसी वैश्विक पहलों को आगे बढ़ाया है। संकट के समय दुनिया के साथ खड़ा रहा भारत श्री मोदी ने कहा कि भारत ने संकट के समय हमेशा सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाले देश की भूमिका निभाई है। कोविड महामारी के दौरान भारत ने 150 से अधिक देशों को दवाइयां और वैक्सीन उपलब्ध कराईं। उन्होंने कहा कि श्रीलंका में चक्रवात, अफगानिस्तान में भूकंप, मोजाम्बिक में बाढ़ और क्यूबा व जमैका में आए तूफानों के दौरान भी भारत ने "मानवता सर्वोपरि" के सिद्धांत पर काम करते हुए मदद पहुंचाई। ग्लोबल साउथ को चाहिए साथ, सहारा नहीं प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ की विश्व समुदाय से बड़ी उम्मीदें हैं, लेकिन उन्हें सहारे की नहीं बल्कि साथ की जरूरत है। वे वैश्विक विकास के लाभार्थी नहीं बल्कि उसके भागीदार बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया को दाता-प्राप्तकर्ता की सोच से आगे बढ़कर समान भागीदारों के रूप में काम करना होगा। साझेदारी को निर्भरता नहीं बल्कि सम्मान और गरिमा से जोड़ना होगा। संवाद और कूटनीति ही शांति का रास्ता श्री मोदी ने कहा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे तनाव और युद्धों का स्थायी समाधान केवल संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए ही संभव है। उन्होंने पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों में हुई प्रगति का स्वागत करते हुए कहा कि संघर्षों के कारण क्षेत्र के कई देशों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री व्यापार प्रभावित होने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है और भारत के कई नागरिकों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। समुद्री मार्गों की सुरक्षा जरूरी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वैश्विक समुद्री व्यापार को जोड़ने वाले नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि समुद्री मार्ग सुरक्षित रहने चाहिए ताकि नाविक बिना किसी भय के अपना काम कर सकें और वैश्विक व्यापार सुचारु रूप से चलता रहे। सभी साझेदार देशों के साथ काम करने को तैयार भारत प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि भारत नई अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत बनाने, वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने और दुनिया में भरोसे व सहयोग को बढ़ावा देने के लिए सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह तैयार है।



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