Full Story

पटना। भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में मेलों का विशेष महत्व रहा है। ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि लोकजीवन, संस्कृति, इतिहास, सामाजिक एकता और आर्थिक गतिविधियों के बड़े केंद्र भी होते हैं। इसी दृष्टि से सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के पूर्व उपनिदेशक एवं इतिहासकार शिवशंकर सिंह पारिजात की पुस्तक ‘श्रावणी मेला : लोक-आस्था का महाकुंभ’ महत्वपूर्ण है। पुस्तक का केंद्रीय विषय सुल्तानगंज से देवघर तक चलने वाली प्रसिद्ध कांवर यात्रा, भगवान शिव के प्रति भक्तों की आस्था और श्रावणी मेले की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है। श्रावणी मेले के बहुआयामी स्वरूप का अध्ययन पुस्तक की विषय-सूची से स्पष्ट है कि लेखक ने श्रावणी मेले को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसके ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकविश्वासी पक्षों को भी सामने रखने का प्रयास किया है। पुस्तक के संदर्भ में परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती का आशीर्वाद एक आत्मीय आध्यात्मिक प्रसंग के रूप में सामने आता है। पुस्तक भेंट करने के अवसर पर उन्होंने लेखक को मौखिक रूप से आशीर्वाद दिया। यह प्रसंग पुस्तक की विषयवस्तु से जुड़े आध्यात्मिक संसार को और आत्मीय बनाता है। श्रावण मास और कांवर यात्रा का धार्मिक महत्व श्रावण मास भगवान शिव की आराधना का विशेष महीना माना जाता है। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों श्रद्धालु शिव मंदिरों में जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। बिहार और झारखंड के संदर्भ में सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा का अपना विशिष्ट महत्व है। श्रद्धालु सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर कांवर में लेकर पैदल बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं और वहां भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करते हैं। पुस्तक का मूल उद्देश्य और विषय-विस्तार पुस्तक का उद्देश्य इसी अद्भुत लोक-आस्था को समझना और उसके विभिन्न आयामों को पाठकों के सामने रखना है। विषय-सूची में भगवान शिव, ज्योतिर्लिंग, सुल्तानगंज, देवघर, बाबा बैद्यनाथ, कांवरिया पथ, जल-अर्पण की परंपरा और श्रावणी मेले से जुड़े अनेक विषयों को स्थान दिया गया है। पुस्तक की शुरुआत ‘भगवान शिव ही परम ब्रह्म हैं’ जैसे विषय से होती है। इससे संकेत मिलता है कि लेखक ने धार्मिक विश्वास की मूल भावना से पुस्तक की यात्रा शुरू की है। भगवान शिव और लोक-आस्था का संबंध भगवान शिव भारतीय लोकजीवन में केवल देवता नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या, करुणा और लोकमंगल के प्रतीक भी हैं। उनकी सरलता और सहजता के कारण समाज के विभिन्न वर्गों में उनके प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है। श्रावणी मेले में इसी लोक-आस्था का विराट रूप देखने को मिलता है। आध्यात्मिक दृष्टि से कांवर यात्रा केवल जल लेकर चलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संकल्प, संयम और श्रद्धा की यात्रा भी है। सुल्तानगंज से देवघर तक आस्था की पदयात्रा पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा है। गंगा से जल लेकर श्रद्धालु कठिन पैदल यात्रा करते हैं। रास्ते में ‘बोल बम’ और ‘बम शंकर’ के जयघोष गूंजते हैं। इस यात्रा में उम्र, जाति, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति का अंतर काफी हद तक पीछे छूट जाता है और श्रद्धालु एक समान धार्मिक भावना से जुड़ते दिखाई देते हैं। विषय-सूची में ‘गंगा-धाम से शुरू होती है बाबा-धाम की कांवर-यात्रा’ , ‘बाबा की डगर पर हर कोई बम शंकर’ और ‘गूंजती है कांवरिया-पथ पर मनमोहक कांवरों की रुन-झुन’ जैसे शीर्षक इस यात्रा की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। कांवरियों के लिए यह केवल पैदल चलना नहीं, बल्कि तपस्या और संकल्प की यात्रा है। बाबा बैद्यनाथ धाम की धार्मिक प्रतिष्ठा देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम श्रावणी मेले का प्रमुख केंद्र है। पुस्तक में बाबा मंदिर की धार्मिक प्रतिष्ठा, उससे जुड़े लोकविश्वास और परंपराओं का उल्लेख मिलता है। ‘चन्द्रकांत मणि से शोभित है देवघर का बाबा मंदिर’ तथा ‘परम कल्याणकारी हैं भगवान भोले शंकर’ जैसे अध्याय मंदिर की धार्मिक महत्ता को रेखांकित करते हैं। बाबा बैद्यनाथ धाम में सावन के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले भक्त यहां जलाभिषेक करते हैं। इस विशाल जनसमागम के कारण देवघर केवल तीर्थस्थल नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र का रूप ले लेता है। अंगभूमि की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव पुस्तक का एक उल्लेखनीय पक्ष भागलपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को श्रावणी परंपरा से जोड़ना है। ‘शिवमय है भागलपुर की अंग-भूमि’ शीर्षक इस दृष्टि को स्पष्ट करता है। भागलपुर और सुल्तानगंज प्राचीन अंगभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। यहां की धार्मिक परंपराएं, लोकविश्वास और गंगा से जुड़ा जीवन कांवर यात्रा को विशेष सांस्कृतिक आधार प्रदान करते हैं। सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से शुरू होकर देवघर तक पहुंचने वाली यह यात्रा अंग और संताल परगना की सांस्कृतिक स्मृतियों को भी जोड़ती है। पुस्तक में शिव-शक्ति पीठ, गणपति की उपस्थिति, अजगैबीनाथ मंदिर और बेलपत्र की परंपरा जैसे विषय भी शामिल हैं। इससे पुस्तक का दृष्टिकोण व्यापक दिखाई देता है। ‘श्रावणी सोमवारी को लगती है बाबा मंदिर में बेल-पत्रों की प्रदर्शनी’ जैसे विषय लोकाचार और धार्मिक परंपरा के संबंध को सामने लाते हैं। इतिहास और लोकविश्वास का संतुलन पुस्तक इतिहास और लोकविश्वास के बीच संबंध स्थापित करने का भी प्रयास करती है। बाबा बैद्यनाथ मंदिर की परंपरा, अंग्रेजी शासन से जुड़े प्रसंग, सिंधु-लिपि के संदर्भ तथा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं से जुड़े अध्याय इसे केवल यात्रा-वर्णन से आगे ले जाते हैं। हालांकि ऐसे विषयों को पढ़ते समय लोककथा, धार्मिक मान्यता और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। यही पुस्तक के आलोचनात्मक अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। श्रावणी मेला सामाजिक एकता का भी बड़ा उदाहरण है। हजारों-लाखों लोग एक ही उद्देश्य से यात्रा करते हैं। रास्ते में स्थानीय लोग कांवरियों के लिए भोजन, पानी, चिकित्सा और विश्राम की व्यवस्था करते हैं। अनेक स्थानों पर सेवा शिविर लगाए जाते हैं। इस प्रकार कांवर यात्रा धार्मिक आस्था के साथ सेवा, सहयोग और सामाजिक सहभागिता की भावना को भी मजबूत करती है। क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मिलती है मजबूती मेले का आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। स्थानीय दुकानदार, परिवहन सेवा, भोजनालय, होटल, छोटे व्यापारी और विभिन्न सेवा प्रदाता इससे जुड़े होते हैं। श्रावणी मेला क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। पुस्तक में इस पक्ष को और अधिक विस्तार देने की गुंजाइश जरूर है। इससे मेले के समग्र प्रभाव का अधिक स्पष्ट आर्थिक अध्ययन सामने आ सकता था। पुस्तक की विषय-सूची के अध्याय-शीर्षक सरल, प्रभावशाली और भावनात्मक हैं। ‘हर कोई बम शंकर’ , ‘मनमोहक कांवरों की रुन-झुन’ और ‘शिव-भक्तों के पीछे-पीछे चलते हैं भगवान श्रीकृष्ण’ जैसे शीर्षक पाठक में जिज्ञासा पैदा करते हैं। प्रस्तुति में पत्रकारिता और लोकभाषा का प्रभाव दिखाई देता है। चित्रावली भी पुस्तक की उपयोगिता बढ़ाती है। धार्मिक स्थलों, कांवरिया पथ और मेले से जुड़े चित्र विषय को दृश्यात्मक रूप से समझने में मदद करते हैं। विषय चयन ही पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका विषय चयन है। श्रावणी मेला भारतीय लोक-आस्था का विराट रूप है, लेकिन इसके धार्मिक पक्ष के साथ सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अध्ययन की भी आवश्यकता है। यह पुस्तक इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास करती है। आधुनिक संदर्भ में कांवरिया मार्ग की वर्तमान स्थिति, यातायात व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्वच्छता, पर्यावरणीय प्रभाव, प्रशासनिक प्रबंधन, महिला श्रद्धालुओं की भागीदारी और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे विषयों का विस्तृत विश्लेषण पुस्तक को और अधिक समकालीन बना सकता था। फिर भी इसका मूल उद्देश्य धार्मिक आस्था और लोकपरंपरा का दस्तावेज तैयार करना है, जिसे पुस्तक प्रभावी ढंग से सामने रखती है। आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को मिलता है आत्मीय स्पर्श परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के मौखिक आशीर्वाद का प्रसंग पुस्तक की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को एक निजी और आत्मीय स्पर्श देता है। पुस्तक भेंट करने के अवसर पर मिले उनके आशीर्वचन को इस संदर्भ में याद किया जा सकता है कि श्रावणी मेला केवल एक विशाल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि साधना, सेवा, अनुशासन और लोकमंगल की चेतना का भी प्रतीक है। सुल्तानगंज से देवघर तक कांवर लेकर चलने वाला श्रद्धालु अपने साथ केवल गंगाजल नहीं, बल्कि विश्वास, संकल्प और शिव के प्रति आस्था लेकर चलता है। इस दृष्टि से स्वामी निरंजनानंद सरस्वती का आशीर्वाद पुस्तक की विषय-भावना के साथ एक स्वाभाविक आध्यात्मिक संवाद जैसा प्रतीत होता है। आस्था, संस्कृति और लोकजीवन का महाग्रंथ कुल मिलाकर ‘श्रावणी मेला : लोक-आस्था का महाकुंभ’ श्रावणी मेले, कांवर यात्रा और बाबा बैद्यनाथ धाम की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को समझने वाली उपयोगी पुस्तक है। यह बताती है कि सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या, अनुशासन, सेवा, सामाजिक एकता और लोक-संस्कृति का विराट संगम है।पुस्तक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इसमें सुल्तानगंज की गंगा, भागलपुर की अंगभूमि और देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम को एक सांस्कृतिक यात्रा के सूत्र में जोड़कर देखने का प्रयास किया गया है। यह भारत की उस लोकपरंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रास्तों, गांवों, बाजारों, सेवा शिविरों और आम लोगों के जीवन में उतर आता है।