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नई दिल्ली। माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को मानवता के लिए अभूतपूर्व अवसर के साथ बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, साइबर अपराध और सामाजिक संकट का बड़ा खतरा बताते हुए इसके वैश्विक नियमन, कुछ नौकरियां केवल इंसानों के लिए आरक्षित रखने तथा एआई टोकन और रोबोट पर कर लगाने की वकालत की है। गेट्स ने अपने ब्लॉग पोस्ट 'द टर्बुलेंट एआई एरा इज हियर' में कहा कि एआई मानव इतिहास की सबसे बड़ी बराबरी लाने वाली तकनीक बन सकती है या अमीर और गरीब के बीच खाई को पहले से कहीं ज्यादा चौड़ा कर सकती है। इसका परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें, कंपनियां और समाज अभी क्या फैसले लेते हैं। ‘इस बार बदलाव पहले जैसा नहीं होगा’ श्री गेट्स ने एआई की तुलना कंप्यूटर क्रांति से करने को भ्रामक बताया और कहा कि पर्सनल कंप्यूटर को कामकाज का तरीका बदलने में करीब 20 वर्ष लगे थे क्योंकि उसके लिए सॉफ्टवेयर, कम कीमत और प्रशिक्षण की जरूरत थी। इसके विपरीत एआई पहले से मौजूद मोबाइल और कंप्यूटर पर चलता है, सामान्य भाषा समझता है और इंसानों के अनुसार खुद को ढाल सकता है। यही वजह है कि इसका असर कई पीढ़ियों में नहीं बल्कि अगले एक दशक में ही बड़े पैमाने पर दिखाई दे सकता है। कानून से लेकर अस्पताल तक, हर सेक्टर पर असर माइक्रोसॉफ्ट के फाउंडर का अनुमान है कि एआई का प्रभाव किसी एक पेशे तक सीमित नहीं रहेगा। कानून, ग्राहक सेवा, चिकित्सा, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग, डेटा विश्लेषण और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में इसका असर तेजी से बढ़ेगा। बिक्री, कस्टमर सपोर्ट, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और पैरालीगल जैसे काम शुरुआती दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। कर्ज के आवेदनों की जांच, मरीजों की प्राथमिकता तय करने और डेटा विश्लेषण जैसे प्रशिक्षित कर्मचारियों वाले काम भी एआई के दायरे में आ सकते हैं। युवाओं और शुरुआती नौकरियों पर सबसे बड़ा संकट श्री गेट्स ने युवा कर्मचारियों को लेकर खास चिंता जताई है। उनका कहना है कि एआई से सबसे पहले प्रवेश और मध्य स्तर की नौकरियां प्रभावित होंगी जबकि बनने वाली नई नौकरियों के लिए ऐसी विशेषज्ञता की जरूरत हो सकती है, जिसे हासिल करने में कई साल लगते हैं। एआई जब लगभग त्रुटिरहित काम करने लगेगा और उसे इंसानी निगरानी की जरूरत नहीं होगी तब कंपनियों के पास कर्मचारियों की जगह मशीनों को चुनने का मजबूत आर्थिक कारण होगा। ऐसे में सवाल केवल नौकरी जाने का नहीं बल्कि आय, सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और मानवीय जुड़ाव पर पड़ने वाले असर का भी है। एआई के तीन बड़े खतरे 1. बड़ी संख्या में नौकरियां हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं श्री गेट्स का मानना है कि एआई से पैदा होने वाली बेरोजगारी सामान्य आर्थिक मंदी जैसी नहीं होगी। मंदी के बाद नौकरियां लौट सकती हैं लेकिन मशीन द्वारा स्थायी रूप से संभाले गए कई काम वापस इंसानों के पास नहीं आएंगे। रोबोट का विकास भी इस चुनौती को बढ़ाएगा। गेट्स का अनुमान है कि दशक के अंत तक स्मार्ट रोबोट निर्माण और आतिथ्य जैसे क्षेत्रों के कुछ शारीरिक कामों में इंसानों से प्रतिस्पर्धा करने लगेंगे। जब कोई कंपनी मशीनों के जरिए लागत घटाएगी तो प्रतिस्पर्धियों पर भी वही तकनीक अपनाने का दबाव बढ़ेगा। इससे रोजगार घटने और आर्थिक लाभ कुछ लोगों तक सीमित होने का खतरा पैदा होगा। 2. अपराधियों के हाथ लगेगी ज्यादा ताकत एआई धोखाधड़ी, डीपफेक, दुष्प्रचार, निगरानी और साइबर हमलों को ज्यादा सस्ता एवं आसान बना सकता है। सीमित तकनीकी जानकारी रखने वाले अपराधी भी लोगों, कंपनियों और सरकारों को बड़े पैमाने पर निशाना बना सकेंगे। अस्पताल, बैंक, जलापूर्ति व्यवस्था, बिजली ग्रिड और सरकारी लाभ पहुंचाने वाली प्रणालियां विशेष रूप से संवेदनशील हो सकती हैं। यही तकनीक नई दवा और वैक्सीन बनाने में मदद करेगी, लेकिन इसके गलत इस्तेमाल से जैविक खतरे पैदा करने की क्षमता भी बढ़ सकती है। श्री गेट्स ने उस दूरगामी जोखिम की ओर भी इशारा किया है, जिसमें ज्यादा शक्तिशाली एआई सिस्टम अपने निर्माताओं की मंशा के विरुद्ध काम करने लगें और इंसानों का नियंत्रण कमजोर पड़ जाए। 3. बच्चों का सामाजिक और मानसिक विकास प्रभावित होने का डर श्री गेट्स के अनुसार, हमेशा उपलब्ध रहने वाले और कभी नाराज न होने वाले एआई साथी बच्चों को वास्तविक मानवीय रिश्तों की चुनौतियों से दूर कर सकते हैं। इन पर भावनात्मक निर्भरता और लत का खतरा भी है। उन्होंने एक अध्ययन का उल्लेख किया, जिसमें 1100 से अधिक एआई साथी उपयोगकर्ताओं के बीच पाया गया कि सीमित सामाजिक संपर्क वाले लोग चैटबॉट की ओर ज्यादा आकर्षित हुए और अत्यधिक निजी एवं भावनात्मक इस्तेमाल के साथ उनकी स्थिति खराब होती गई। एआई शिक्षा में मददगार हो सकता है, लेकिन तैयार उत्तरों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता युवाओं की आलोचनात्मक सोच को कमजोर कर सकती है। डीपफेक और व्यक्तिगत रूप से तैयार किए गए दुष्प्रचार के दौर में यह खतरा और गंभीर हो जाता है। खतरे बड़े, लेकिन फायदे भी जबरदस्त श्री गेट्स ने एआई को केवल खतरे के रूप में देखने से भी सावधान किया है। उनका कहना है कि सही नीतियों और समान पहुंच के साथ यह तकनीक स्वास्थ्य, खेती, शिक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और सरकारी सेवाओं में बड़ा बदलाव ला सकती है। स्वास्थ्य सेवाओं में समय पर पहचान एआई छोटे अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने में मदद कर सकता है। यह स्कैन का विश्लेषण कर स्ट्रोक या दिल के दौरे जैसी गंभीर स्थिति की समय रहते पहचान कर सकता है। श्री गेट्स ने Viz.ai का उदाहरण दिया, जिसका इस्तेमाल अमेरिका के करीब 2000 अस्पतालों में होने की बात कही गई है। एआई प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतर निदान, जांच रिपोर्ट समझने और दवाओं का समय याद रखने में भी उपयोगी हो सकता है। गरीब देशों के किसानों को बेहतर सलाह गेट्स को कम आय वाले देशों में AI का सबसे तेज असर खेती पर दिखाई देता है। छोटे किसानों को मौसम, बीज, मिट्टी, फसल और पशु रोगों से जुड़ी बेहतर जानकारी मिल सकती है। इससे जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी की चुनौती के बीच कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है। सरकारी सेवाएं हो सकती हैं आसान स्वास्थ्य बीमा, छात्र सहायता और खाद्य सहायता जैसी योजनाओं के जटिल फॉर्म भरना AI के जरिए आसान बनाया जा सकता है। इससे जरूरतमंद लोगों को सरकारी सहायता जल्दी मिल सकती है और प्रशासनिक खर्च भी कम हो सकता है। शिक्षा में एआई शिक्षकों का बोझ घटाने, कमजोर विद्यार्थियों की पहचान करने और व्यक्तिगत तरीके से पढ़ाने में मदद कर सकता है—बशर्ते वह विद्यार्थियों की सोचने की प्रक्रिया को खत्म न करे। गेट्स ने दिए तीन बड़े समाधान 1. एआई ट्रांजिशन संभालने के लिए नई वैश्विक व्यवस्था श्री गेट्स के मुताबिक, मौजूदा सरकारी संस्थाएं ऐसी तकनीक के लिए बनी ही नहीं हैं, जो इतनी तेजी से फैलकर रोजगार, शिक्षा, कर व्यवस्था, ऊर्जा, चुनाव, स्वास्थ्य, वित्त, कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा—सभी को प्रभावित करे। उन्होंने देशों में ऐसी केंद्रीय संस्थाएं बनाने का सुझाव दिया है, जो अलग-अलग विभागों के बीच एआई नीति का समन्वय कर सकें। इसके साथ परमाणु निरीक्षण, अंतरराष्ट्रीय विमानन नियमों और ओजोन संरक्षण समझौतों जैसी वैश्विक व्यवस्था की तर्ज पर नई अंतरराष्ट्रीय AI संस्था बनाने की जरूरत भी बताई है। 2. कुछ काम सिर्फ इंसानों के लिए आरक्षित हों गेट्स ने ‘ह्यूमन रिजर्व्ड’ का विचार पेश किया है। इसके तहत कुछ पेशे ऐसे रखे जा सकते हैं, जिनमें तकनीकी रूप से संभव होने के बावजूद मशीनों को इंसानों की जगह लेने की अनुमति न हो। उन्होंने बुजुर्गों की देखभाल और गंभीर बीमारी की खबर मरीज को देने जैसे कामों का उदाहरण दिया, जहां मानवीय संवेदना को मशीन से बदलना उचित नहीं होगा। शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में AI सहायक की भूमिका निभा सकता है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी इंसान के पास रहनी चाहिए। 3. एआई टोकन और रोबोट पर लगे टैक्स श्री गेट्स ने श्रम और पूंजी पर कर व्यवस्था में संतुलन लाने की मांग की है। उनके अनुसार, किसी कर्मचारी को नौकरी देने पर कंपनी को पेरोल टैक्स देना पड़ता है, जबकि रोबोट खरीदने की लागत को कारोबारी खर्च दिखाकर कर लाभ लिया जा सकता है। मौजूदा व्यवस्था इस तरह कंपनियों को इंसानों की जगह मशीन चुनने के लिए प्रोत्साहित करती है। उन्होंने एआई टोकन और रोबोट पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव दिया है। इससे मशीनों के कारण रोजगार खत्म करने की रफ्तार कुछ धीमी हो सकती है और प्राप्त राशि का इस्तेमाल कर्मचारियों के प्रशिक्षण तथा मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के लिए किया जा सकता है। गेट्स फाउंडेशन खर्च करेगा 200 अरब डॉलर गेट्स ने बताया कि उनकी फाउंडेशन के पास अपनी शेष 200 अरब डॉलर की संपत्ति खर्च करने के लिए 19 वर्ष हैं। एआई की मदद से एचआईवी, टीबी, मलेरिया और कुपोषण के लिए दवाओं एवं टीकों की खोज तेज करने की योजना है। फाउंडेशन का लक्ष्य 2000 से 2024 के बीच बच्चों की वार्षिक मौतों में आई कमी को आगे बढ़ाते हुए इस संख्या को फिर आधा करना है। खेती, शिक्षा और स्थानीय भाषाओं में एआई मॉडल उपलब्ध कराने पर भी काम किया जाएगा। OpenAI, Anthropic, Google और Microsoft जैसी प्रमुख AI कंपनियां इन पहलों में फाउंडेशन के साथ सहयोग कर रही हैं। ‘फैसले अभी नहीं लिए तो देर हो जाएगी’ श्री गेट्स ने विश्व नेताओं से बेरोजगारी बढ़ने, समुदायों के संकट में आने और जनता का भरोसा टूटने से पहले कदम उठाने की अपील की है। उनका कहना है कि AI का भविष्य केवल तकनीकी कंपनियों या चुनिंदा विशेषज्ञों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। इस बहस में कर्मचारियों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों, धार्मिक एवं सामुदायिक नेताओं और नीति-निर्माताओं को शामिल करना होगा। श्री गेट्स का संदेश साफ है कि एआई को रोक पाना शायद संभव नहीं, लेकिन इसे किस दिशा में ले जाना है, यह तय करने का मौका अभी दुनिया के पास है; सही फैसले इसे मानवता के लिए अभूतपूर्व वरदान बना सकते हैं और चूक इसे असमानता तथा अस्थिरता के नए दौर में धकेल सकती है।