Full Story
नई दिल्ली। करमा के अखड़े में जब मांदर बजता है तो केवल एक त्योहार की शुरुआत नहीं होती। जैसे धरती अपनी कोई पुरानी बात याद करती है। खेत की मेड़, जंगल का करम वृक्ष, नदी का पानी, बहन की प्रार्थना और युवाओं का सामूहिक नृत्य—सब एक साथ उस स्मृति में लौट आते हैं। करमा इसलिए केवल पूजा का पर्व नहीं है। वह मनुष्य और प्रकृति के बीच उस पुराने रिश्ते की याद है, जिसमें मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका हिस्सा था। भादो की हवा में जब करमा का गीत उठता है, तो लगता है जैसे खेत, जंगल और गांव एक ही लय में सांस ले रहे हों। सीमाओं से परे करमा की सांस्कृतिक स्मृति नागपुरी लोकगीत की पंक्ति है, “भादो कर एकादशी करमा गड़ाय रे...”। इस एक पंक्ति में मौसम भी है, कृषि भी है और सामुदायिक जीवन भी। झारखंड में करमा पर्व का सबसे व्यापक सांस्कृतिक विस्तार दिखाई देता है, लेकिन इसकी स्मृति झारखंड की सीमाओं में बंद नहीं है। ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्य प्रदेश और असम के अनेक आदिवासी और ग्रामीण समुदायों में भी करमा की परंपराएं अलग-अलग रूपों में मिलती हैं। मुंडा, उरांव, खड़िया, हो, संताल और दूसरे समुदायों की भाषाएं अलग हैं, उनके गीतों की धुन अलग है, लेकिन धरती, जंगल, पानी और सामुदायिक जीवन के प्रति उनकी संवेदना में एक गहरी समानता दिखाई देती है। भाषाएं अलग, लोक की बेचैनी एक मुंडारी लोक परंपरा में करमा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, जीवन के अनेक पक्षों को जोड़ने वाला लोक-स्मृति संसार है। खेती, श्रम, प्रेम, परिवार, जंगल और सामुदायिक संबंध उसके गीतों में साथ-साथ चलते हैं। कुड़ुख की करमा परंपरा में भी गीत केवल मनोरंजन नहीं, रिश्तों और स्मृतियों को जीवित रखने का माध्यम हैं। लोकगीत की पंक्ति, “ओ! ईदीनिन्ता करम चांदो भैयेर...” में अपने लोगों से मिलने की आकांक्षा और आत्मीयता की ध्वनि सुनी जा सकती है। संथाली समाज में करम सेरेंग की परंपरा है, जहां गीत केवल गाया नहीं जाता, जीवन के अनुभवों से रचा जाता है। नागपुरी में करमा का गीत गांव को फिर से सामूहिक लय में लौटने का निमंत्रण देता है, “करम-करम कहले हो दादा, करमा के दिन कईसे आवे...”। भाषाएं बदलती हैं, लेकिन लोक की बेचैनी एक ही रहती है, गांव फिर कब गाएगा, जंगल फिर कब हंसेगा और मनुष्य फिर कब अपने लोगों के बीच लौटेगा। जावा के अंकुर में छुपा कृषि-दर्शन करमा का समय भी अपने भीतर कृषि का पूरा दर्शन लिए हुए है। भाद्रपद शुक्ल एकादशी के आसपास मनाया जाने वाला यह पर्व उस समय आता है जब धान की रोपाई के बाद खेत में नई उम्मीद आकार लेने लगती है। जावा बोने की परंपरा इसी उम्मीद को घर और आंगन तक ले आती है। बालू या मिट्टी से भरी टोकरी में धान, जौ, मक्का, कुरथी और दूसरी फसलों के बीज डाले जाते हैं। कुछ दिनों में उनमें अंकुर फूटते हैं। वह छोटा-सा अंकुर अपने भीतर एक बड़ा सच रखता है—अन्न बाजार में पैदा नहीं होता। वह मिट्टी और पानी के मिलन से जन्म लेता है। उसके पीछे बीज है, श्रम है, धूप है, हवा है और सबसे बढ़कर पानी है। जंगल और पानी, एक ही जीवन की दो दिशाएं यहीं से करमा का रिश्ता जल से जुड़ जाता है। पानी इस लोकजीवन में कोई अलग वस्तु नहीं है जिसे खेत की जरूरत के हिसाब से कहीं से लाकर डाल दिया जाए। पानी बीज में है, मिट्टी में है, जंगल में है, नदी में है और उस जीवन-चक्र में है जिसमें मनुष्य भी शामिल है। जंगल वर्षा को थामता है, मिट्टी नमी को बचाती है, छोटी धाराएं उसे गांव तक लाती हैं और खेत उस पानी को अन्न में बदल देता है। इसलिए आदिवासी जीवन में जंगल बचाना और पानी बचाना दो अलग-अलग काम नहीं हैं। दोनों एक ही जीवन को बचाने की दो दिशाएं हैं। जंगल से नदी तक करम की यात्रा करम की डाली का जंगल से अखड़े तक आना और फिर उसे नदी या जलधारा में विसर्जित करना इस जीवन-चक्र की सुंदर लोक-छवि बनाता है। नागपुरी लोक परंपरा में गाया जाता है, “काइल तोरे करम राजा घरे दुआरे, आईझ तोरे करम राजा शंख नदी तिरे...”। कल जो करम राजा घर-द्वार पर था, आज नदी के किनारे पहुंच गया। जंगल से गांव और गांव से नदी तक की यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, प्रकृति के एक चक्र की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। करम की डाली मानो यह याद दिलाती है कि गांव जंगल से अलग नहीं है और खेत नदी से अलग नहीं है। इनके बीच का संबंध टूटेगा तो लोकजीवन की वह लय भी टूटेगी, जिसे सदियों से गीतों ने बचाकर रखा है। जब प्रकृति ‘संसाधन’ में बदल गई लेकिन आधुनिक विकास की भाषा ने इस रिश्ते को धीरे-धीरे दूसरी भाषा में बदल दिया है। नदी अब जल-संसाधन है, जंगल वन-संपदा है, जमीन संपत्ति है और पानी परियोजना का इनपुट। इन शब्दों की अपनी उपयोगिता है, लेकिन लोक की भाषा कुछ और कहती है। उसके लिए नदी केवल पानी की धारा नहीं, रास्ता भी है, स्मृति भी है और जीवन भी। जंगल केवल लकड़ी या वन-उत्पाद का भंडार नहीं, वर्षा और जल का घर है। खेत केवल उत्पादन की इकाई नहीं, पीढ़ियों की मेहनत और स्मृति का विस्तार है। करमा इसी अंतर को समझने का अवसर देता है—प्रकृति को वस्तु की तरह देखने और जीवन की तरह देखने के बीच का अंतर। अखड़ा यानी लोक का खुला विद्यालय करमा का अखड़ा इसीलिए महत्वपूर्ण है। वह केवल नाचने की जगह नहीं, लोक का खुला विद्यालय है। बुजुर्ग वहां कथा सुनाते हैं, युवा मांदर बजाते हैं, महिलाएं गीतों को आगे बढ़ाती हैं और बच्चे देखते-सुनते हुए अपनी सांस्कृतिक स्मृति सीखते हैं। यह शिक्षा किताब से नहीं, भागीदारी से मिलती है। लोक परंपरा में कहा गया है, “सेनगी सुसुन, काजिगी दुरंग” चलना ही नृत्य है, बोलना ही गीत। यानी जीवन स्वयं एक कला है और समुदाय उसका मंच। जब अखड़ा सूना होता है तो केवल नृत्य बंद नहीं होता, पीढ़ियों के बीच संवाद भी कमजोर पड़ता है। रिश्तों को फिर जोड़ता करमा करमा में भाई-बहन का संबंध भी इसी सामुदायिक संसार का हिस्सा है। बहन भाई की मंगलकामना करती है, विवाहित बेटियां मायके लौटती हैं, बचपन की स्मृतियां फिर से जीवित होती हैं और रिश्तों की दूरी कुछ समय के लिए मिट जाती है। करमा इसलिए परिवार को भी जोड़ता है और गांव को भी। इसकी सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि इसमें व्यक्ति अकेला नहीं रहता। उसकी खुशी सामूहिक होती है और उसका दुख भी। जंगल, खेत, नदी, परिवार और समुदाय—सब एक ही सांस्कृतिक वृत्त में दिखाई देते हैं। करमा की कथाओं में जीवन का संदेश करमा की कथाओं के भी अनेक स्थानीय रूप हैं। कहीं करम और धरम की कथा है, कहीं सात भाइयों की कहानी, कहीं भाई-बहन के संबंध की स्मृति। कथाओं के रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन उनमें एक साझा नैतिक संकेत मिलता है—अहंकार, उपेक्षा और संतुलन के टूटने का परिणाम अच्छा नहीं होता; सम्मान, श्रम और सामुदायिक सहयोग जीवन को फिर से संतुलित करते हैं। करम वृक्ष के प्रति सम्मान को केवल धार्मिक आस्था मानकर छोड़ देना इस लोकबुद्धि को छोटा कर देना होगा। पेड़ के प्रति आदर और जीवन के प्रति आदर एक ही चेतना के दो रूप हैं। हर बीज भविष्य की एक संभावना इसीलिए करमा की कृषि-स्मृति भी महत्वपूर्ण है। जावा के अंकुर केवल शुभता के प्रतीक नहीं हैं। वे किसान के उस अनुभव को सामने लाते हैं जिसमें हर बीज भविष्य की एक संभावना है। बीज के अंकुरण के लिए मिट्टी चाहिए, नमी चाहिए, हवा चाहिए, तापमान चाहिए और समय चाहिए। इनमें से किसी एक को भी पूरी तरह अलग करके खेती को नहीं समझा जा सकता। आज जब खेती को उत्पादन, बाजार और मूल्य की भाषा में अधिक देखा जाता है, तब करमा याद दिलाता है कि खेती सबसे पहले प्रकृति के साथ साझेदारी है। किसान मिट्टी पर आदेश नहीं चलाता; वह मौसम, पानी और बीज के साथ तालमेल बनाता है। जल-संकट की एक-दूसरे से जुड़ी कड़ियां यही बात आज के जल-संकट पर भी लागू होती है। पानी की सुरक्षा केवल बड़े बांध, नहरों और पाइपलाइनों से नहीं हो सकती। जंगल, छोटी नदियां, पहाड़ी धाराएं, तालाब, आहर-पईन, मिट्टी की नमी, पारंपरिक बीज और स्थानीय समुदाय का ज्ञान—ये सभी जल-सुरक्षा की कड़ियां हैं। जंगल कटेगा तो पानी का रास्ता बदलेगा। मिट्टी की नमी जाएगी तो बीज प्रभावित होगा। खेत सूखेगा तो किसान प्रभावित होगा। किसान बदलेगा तो गांव बदलेगा। गांव बदलेगा तो अखड़ा बदलेगा। अखड़ा बदलेगा तो गीत बदलेगा। और जब गीत बदल जाएगा तो करमा भी केवल कैलेंडर की एक तारीख बनकर रह सकता है। एक ओर सम्मेलन, दूसरी ओर मांदर की थाप आज जब दुनिया पानी की चिंता कर रही है, तब करमा की लोक-दृष्टि को सुनना उपयोगी हो सकता है। 22 से 26 सितंबर के बीच भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह के माध्यम से जल-संबंधी वैश्विक और नीतिगत विमर्श को सामने रखता है। दूसरी ओर, लगभग उसी समय करमा का लोकपर्व गांवों और जंगलों में यह बात अपनी सहज भाषा में कहता है कि पानी जीवन है। एक ओर सम्मेलन की भाषा है, दूसरी ओर मांदर की थाप। एक ओर विशेषज्ञ हैं, दूसरी ओर किसान, आदिवासी समाज और लोकगीत। दोनों की भाषा अलग है, लेकिन मूल प्रश्न एक है—पानी को हम किस रूप में देखते हैं? पाइप में बहता पदार्थ भर नहीं है जल आधुनिक जल-नीति यदि केवल पानी की उपलब्ध मात्रा देखेगी तो वह उसके सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ को अधूरा समझेगी। किसी नदी का पानी कितना है, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे कम महत्वपूर्ण यह नहीं कि उस नदी पर निर्भर कितने खेत हैं, कितने गांव हैं, कितने जंगल हैं, कितने जीव-जंतु हैं और कितनी सांस्कृतिक स्मृतियां हैं। जल केवल पाइप में बहता हुआ पदार्थ नहीं है। वह खेत की नमी है, जंगल की हरियाली है, पशु-पक्षियों का जीवन है, गांव की अर्थव्यवस्था है और लोकगीत की पृष्ठभूमि भी है। अगर जंगल नहीं बचा तो करमा की डाली कहां से आएगी तभी करमा से कुछ असुविधाजनक सवाल भी पूछे जा सकते हैं। यदि जंगल ही नहीं बचेंगे तो करमा की डाली कहां से आएगी? यदि धान के खेत में पानी नहीं रहेगा तो जावा के गीत में वह हरियाली कहां से आएगी? यदि नदी सूख जाएगी तो नदी किनारे विसर्जन की वह सांस्कृतिक स्मृति किस रूप में बचेगी? और यदि अखड़े में युवा ही नहीं रहेंगे तो मांदर की थाप अगली पीढ़ी तक कौन पहुंचाएगा? इन सवालों का उत्तर केवल संस्कृति विभाग या किसी उत्सव के आयोजन से नहीं मिलेगा। इसका उत्तर जमीन, जंगल, पानी और गांव के जीवन को बचाने में मिलेगा। लोकगीत अपनी जमीन से बचते हैं लोकगीत केवल शब्दों से नहीं बचते। वे अपनी जमीन से बचते हैं। मांदर केवल वाद्य नहीं है; वह उस समुदाय की सामूहिक धड़कन है जो उसके चारों ओर इकट्ठा होता है। जावा केवल अंकुर नहीं है; वह खेत और घर के बीच बने उस रिश्ते का प्रतीक है जिसमें अन्न को देवता और श्रम को सम्मान मिलता है। करम की डाली केवल एक शाखा नहीं है; वह जंगल का गांव में प्रवेश है। और उसका नदी तक जाना इस बात की याद है कि जंगल, खेत और जल एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखे जा सकते। अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ जाएगा विकास इस अर्थ में करमा आज के समय का केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं, प्रकृति के साथ एक सार्वजनिक समझौता भी है। वह हमें बताता है कि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन, अधिक निर्माण और अधिक उपभोग नहीं हो सकता। विकास का अर्थ यह भी है कि अगली पीढ़ी के लिए पानी बचे, जंगल बचे, मिट्टी की उर्वरता बचे, बीजों की विविधता बचे और गांव की सामुदायिक स्मृति बची रहे। जिस समाज की नदियां सूख जाती हैं, वहां केवल पानी नहीं जाता; वहां धीरे-धीरे गीत, स्मृति और जीवन की एक पूरी भाषा भी सूखने लगती है। पानी हमारे भीतर भी बहता है करमा के अखड़े में खड़ी करम की डाली को देखें तो लगता है जैसे जंगल गांव में आ गया हो। जावा के अंकुरों को देखें तो लगता है जैसे खेत घर के आंगन में उग आया हो। मांदर की थाप सुनें तो लगता है जैसे धरती अपनी धड़कन सुना रही हो। यही करमा का सबसे बड़ा संदेश है—प्रकृति बाहर की कोई चीज नहीं है। हम उसी के भीतर हैं। पानी हमारे बाहर नहीं बहता; वह हमारे भीतर भी बहता है। इसलिए पानी को केवल संसाधन कहना उसके अर्थ को छोटा करना है। लोक उसे जीवन कहता है। प्रकृति बचेगी तो गीत भी बचेगा प्रकृति बचेगी तो पानी बचेगा। पानी बचेगा तो खेत बचेगा। खेत बचेगा तो किसान और गांव बचेंगे। गांव बचेंगे तो अखड़ा बचेगा। अखड़ा बचेगा तो गीत बचेगा। और गीत बचेगा तो करमा अगली पीढ़ी तक पहुंचेगा। शायद इसी कारण किसी बच्चे के पूछने पर कि “करमा कब आएगा?” किसी बुजुर्ग की आवाज में यह उत्तर सुनाई देता है— “करमा कहीं जाता नहीं, बेटा। जब तक धरती में नमी है, जंगल में हरियाली है और मनुष्य के भीतर प्रकृति के लिए जगह है, करमा यहीं है।” ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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