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(परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के संन्यास दिवस 12 सितंबर पर विशेष ) नई दिल्ली। 12 सितंबर 1947 को ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने बीस वर्ष के युवा सत्यानंद को संन्यास की दीक्षा दी थी। यह केवल वस्त्र बदलने या सांसारिक जीवन से विरक्ति का संस्कार नहीं था। यह स्वयं को समष्टि के लिए समर्पित करने की शुरुआत थी। आगे चलकर इसी संकल्प ने एक ऐसे योग आंदोलन का रूप लिया, जिसने भारत की प्राचीन योग परंपरा को दुनिया के अनेक देशों तक पहुंचाया। साधना और सेवा के बीच बना जीवंत सेतु परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के जीवन को समझने के लिए संन्यास को केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उनका संन्यास सेवा, साधना, योग और मानव कल्याण के बीच एक सेतु था। उन्होंने अध्यात्म को जीवन से अलग किसी गुफा या मठ की वस्तु नहीं माना। उनके लिए योग शरीर, मन और चेतना के परिष्कार की ऐसी प्रक्रिया था, जिसका अंतिम उद्देश्य मनुष्य को स्वयं से जोड़ना और फिर समाज से जोड़ना था। परमगुरु के प्रति परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती का भाव इसी व्यापक अर्थ को सामने लाता है। उनके अनुसार गुरु केवल कोई व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि एक शाश्वत गुरुतत्त्व और चेतना का प्रवाह है। स्वामी सत्यानंद उनके लिए केवल एक गुरु नहीं, उस परंपरा के जीवंत वाहक थे, जिसने योग को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नया रूप दिया। गुरु का आदेश बना जीवन की साधना परमहंस स्वामी निरंजनानंद के अनुसार स्वामी सत्यानंद ने अपनी असीम संकल्पशक्ति के बल पर मुंगेर से लेकर पूरी दुनिया में योग परंपरा का प्रसार किया। 2009 में महासमाधि से पूर्व स्वामी सत्यानंद ने उन्हें योगविद्या के संरक्षण और संन्यास जीवन के पुनरुद्धार का जो आदेश दिया था, वे उसी दायित्व को अपनी साधना का हिस्सा मानकर आगे बढ़ाते रहे हैं। स्वामी निरंजनानंद के अनुसार 2023 से 2031 तक स्वामी सत्यानंद की पद्म जयंती मनाई जा रही है। यहां ‘पद्म’ केवल कमल का प्रतीक नहीं है, बल्कि जागरूकता का भी प्रतीक है। कमल जिस तरह कीचड़ में रहते हुए भी अपनी निर्मलता बनाए रखता है, उसी तरह साधना का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार के बीच चेतना की निर्मलता को बनाए रखना है। किताबी नहीं, जीवन में उतरता वेदांत स्वामी सत्यानंद के जीवन में योग और वेदांत इसी व्यवहारिक धरातल पर दिखाई देते हैं। उनका वेदांत शास्त्रीय या किताबी नहीं था। वह प्रयोगात्मक, उपयोगी और मानवतावादी था। उनका मानवतावाद आत्मभाव पर आधारित था। उन्होंने योग को व्यक्तित्व के शोधन, परिष्कार, उन्नयन और आत्मिक विकास का माध्यम बनाया, तो दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के लिए भी उसे एक प्रभावी साधन के रूप में देखा। उनकी दृष्टि में मनुष्य केवल शरीर नहीं है। वह प्राण, चित्त और आत्मा का सम्मिश्रण है। इसलिए स्वास्थ्य भी केवल रोग के अभाव का नाम नहीं, बल्कि शरीर, मन और चेतना के संतुलन की स्थिति है। इसी व्यापक दृष्टि से उन्होंने योग को आधुनिक समाज के सामने प्रस्तुत किया। अल्मोड़ा से ऋषिकेश तक आत्मखोज की यात्रा 25 दिसंबर 1923 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे सत्यानंद का जीवन आरंभ से ही साधारण सांसारिक जीवन की सीमाओं से बाहर जाने की बेचैनी से भरा था। पढ़-लिखकर एक भरे-पूरे परिवार से निकलने वाला यह युवक लगभग बीस वर्ष की आयु में अध्यात्म की राह पर चला और ऋषिकेश पहुंचा। वहां स्वामी शिवानंद सरस्वती की सेवा और साधना में बारह वर्ष बिताए। गुरु के आदेश ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी—योगविद्या का प्रचार-प्रसार, द्वारे-द्वारे, तीरे-तीरे। यह वह समय था जब योग को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां थीं। योग को मुख्यतः साधु-संन्यासियों की साधना माना जाता था। गृहस्थों और महिलाओं के लिए इसे अनुपयुक्त समझने की मानसिकता भी कम नहीं थी। स्वामी सत्यानंद ने इस धारणा को चुनौती दी। उन्होंने योग को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से जोड़ने का प्रयास किया। मुंगेर की धरती पर साधना का नया अध्याय परिव्राजक जीवन के दौरान बिहार की यात्रा करते हुए वे 6 मई 1956 में पहली बार मुंगेर आए। गंगा के किनारे बसे इस शहर की प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें आकर्षित किया। यहां उन्होंने चातुर्मास भी बिताया। मुंगेर का कर्णचौरा उनके जीवन में विशेष महत्व रखता है। स्थानीय परंपरा में इसे राजा कर्ण से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इसी स्थान पर बैठकर राजा कर्ण दान किया करते थे। इसी चबूतरे पर स्वामी सत्यानंद ने कई रातें बिताईं और साधना की। यहीं उनके भीतर एक संकल्प आकार लेने लगा—जहां कभी दान की परंपरा थी, वहां से योग और शांति का संदेश दुनिया तक पहुंचाया जाए। यह संकल्प बाद में मुंगेर को विश्व के प्रमुख योग केंद्रों में बदलने की दिशा में निर्णायक सिद्ध हुआ। वसंत पंचमी पर योग की नई ज्योति 1961 में अंतरराष्ट्रीय योग मित्र मंडल की स्थापना और योग संबंधी पुस्तकों के प्रकाशन का सिलसिला शुरू हुआ। 19 जनवरी 1964, वसंत पंचमी के दिन, बिहार योग विद्यालय की स्थापना हुई। यह केवल एक संस्था की स्थापना नहीं थी। यह आधुनिक संदर्भ में योग को व्यवस्थित, वैज्ञानिक और अनुशासित ढंग से प्रस्तुत करने की एक बड़ी पहल थी। योगनिद्रा, प्राणायाम, त्राटक, सूर्य नमस्कार, योगासन, मुद्रा और बंध जैसे विषयों पर उनके लेखन और प्रशिक्षण ने योग को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाया। उन्होंने लगभग पांच दशकों के अपने सार्वजनिक जीवन में अनेक देशों की यात्राएं कीं। यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ग्रीस, कुवैत, ईरान, इराक, केन्या और घाना सहित अनेक देशों में उन्होंने योग के बीज बोए। फ्रांस, इटली, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया में सत्यानंद योग की मजबूत पहचान बनी। विश्व योग यात्रा के अनाम तपस्वियों का स्मरण आज जब योग दुनिया के करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है और संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता दी है, तब इस वैश्विक यात्रा के पीछे उन साधकों के श्रम को याद करना जरूरी है, जिन्होंने योग को आधुनिक जीवन की भाषा में समझाने का काम किया लेकिन स्वामी सत्यानंद की यात्रा केवल योग के वैश्वीकरण तक सीमित नहीं थी। 1988 में मुंगेर से विदा लेने के बाद उन्होंने झारखंड के देवघर के निकट रिखिया को अपनी साधना का केंद्र बनाया। सितंबर 1989 में जब वे रिखिया पहुंचे, तब वहां घना जंगल था। आसपास आदिवासी और अत्यंत गरीब गांव थे। सड़क, बिजली और आधुनिक सुविधाओं का अभाव था। उन्होंने यहां तप, साधना और सेवा को अपने जीवन का नया अध्याय बनाया। रिखिया में उन्होंने यह देखा कि आध्यात्मिक साधना की बात उस व्यक्ति के लिए कितनी अधूरी है जिसके घर में भोजन नहीं, बच्चों के लिए शिक्षा नहीं और परिवार के लिए न्यूनतम संसाधन नहीं। यहीं से उनकी साधना सेवा में बदलती गई। सेवा ने जगाई शिक्षा और आत्मनिर्भरता की लौ 1991 के बाद रिखिया और आसपास के ग्रामीणों के शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक उत्थान का काम आगे बढ़ा। 1995 में सीता कल्याणम् और शतचंडी महायज्ञ की परंपरा शुरू हुई। इसके साथ सेवा का एक विस्तृत तंत्र विकसित हुआ। बच्चों को पुस्तकें, कॉपियां, कपड़े और जूते दिए जाने लगे। महिलाओं और बच्चों को वस्त्र, बेटियों के विवाह में सहयोग और जरूरत का सामान उपलब्ध कराया गया। वृद्धाओं और विधवाओं के लिए सहायता की व्यवस्था हुई। गरीब परिवारों को रिक्शा, ठेला और अन्य साधन देकर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया गया। बालिकाओं को साइकिल और जरूरतमंद विद्यार्थियों को कंप्यूटर तथा लैपटॉप उपलब्ध कराए गए। रिखियापीठ की विशिष्टता यह रही कि वहां सेवा को केवल दया या दान के रूप में नहीं देखा गया। उद्देश्य था—मनुष्य को सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ खड़ा करना। इसलिए रिखिया में योग और सेवा एक-दूसरे के पूरक बन गए। स्वामी सत्यानंद की दृष्टि में अध्यात्म का अर्थ केवल भीतर की यात्रा नहीं था। यदि भीतर का ईश्वर जागता है तो उसकी रोशनी बाहर भी दिखाई देनी चाहिए। रिखिया इस विचार का जीवंत उदाहरण बना। तपस्या से निकली ऊर्जा गांव के बच्चों की शिक्षा, महिलाओं के सम्मान और गरीब परिवारों की आत्मनिर्भरता में दिखाई देने लगी। योग का शाश्वत सूत्र—जोड़ना यहीं उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक सूत्र समझ में आता है—योग जोड़ता है। वह शरीर को मन से, मन को चेतना से और व्यक्ति को समाज से जोड़ता है। स्वामी सत्यानंद के लिए योग का अंतिम अर्थ केवल आसन या प्राणायाम नहीं था। वह मनुष्य को उसके भीतर छिपी व्यापक मानवीय चेतना से जोड़ने की प्रक्रिया था। 5 दिसंबर 2009 को स्वामी सत्यानंद महासमाधि में लीन हुए। लेकिन किसी संत का जीवन उसके शरीर के समाप्त होने के साथ समाप्त नहीं होता। उसकी वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि उसके बाद उसकी साधना कितने जीवनों को छूती है। आज मुंगेर का बिहार योग विद्यालय, रिखियापीठ की सेवा परंपरा और दुनिया के अनेक हिस्सों में सत्यानंद योग की उपस्थिति उनके जीवन-संकल्प की निरंतरता है। उनके परमशिष्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए योगविद्या, संन्यास और सेवा को नए संदर्भों में विकसित किया है। 12 सितंबर का संन्यास दिवस इसलिए केवल एक महान संत को स्मरण करने की तिथि नहीं है। यह उस संकल्प को याद करने का अवसर है जिसमें एक युवा ने स्वयं को अपने लिए नहीं, व्यापक मानवता के लिए समर्पित किया था। संसार से विरक्ति नहीं, संसार को देखने की नई दृष्टि संन्यास का अर्थ यदि केवल संसार छोड़ देना होता, तो स्वामी सत्यानंद की यात्रा इतनी दूर तक नहीं जाती। उन्होंने संसार छोड़ा नहीं, बल्कि उसे एक दूसरी दृष्टि से देखा। उन्होंने योग को जीवन से जोड़ा, अध्यात्म को सेवा से जोड़ा और साधना को मानव कल्याण से जोड़ा। आज की दुनिया में जब मनुष्य तकनीक से जुड़ते हुए भी भीतर से अकेला होता जा रहा है, जब विकास के बीच असमानता बढ़ रही है और मानसिक अशांति आधुनिक जीवन की बड़ी चुनौती बन रही है, तब स्वामी सत्यानंद का संदेश फिर प्रासंगिक हो उठता है।संन्यास अंततः वस्त्र का परिवर्तन नहीं, दृष्टि का परिवर्तन है। स्वयं से समष्टि की ओर बढ़ना ही उसकी सार्थकता है। स्वामी सत्यानंद ने अपने जीवन से यही दिखाया—योग केवल शरीर को मोड़ने की विद्या नहीं, जीवन को सही दिशा में मोड़ने की साधना है। और शायद इसी अर्थ में उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने योग को केवल सिखाया नहीं, उसे जीया—और अपनी साधना की उस ज्योति को दुनिया के अनेक कोनों तक पहुंचा दिया। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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