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नई दिल्ली। झारखंड में एक साथ 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द करने का फैसला पहली नजर में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई दिखाई देता है लेकिन इसके भीतर एक गहरा नैतिक, प्रशासनिक और कानूनी संकट छुपा है- यदि परीक्षा कराने वाली व्यवस्था विफल हुई, एजेंसी संदिग्ध थी, निगरानी कमजोर थी और अधिकारियों ने समय रहते गड़बड़ी नहीं रोकी तो इसकी पूरी कीमत उन अभ्यर्थियों से क्यों वसूली जाए जिन्होंने परीक्षा दी, चयन पाया, नियुक्ति पत्र लिया और महीनों तक सरकारी सेवा भी की? सरकार ने 22 परीक्षाएं रद्द करने, छह प्रक्रियाएं स्थगित रखने और 17 पुरानी परीक्षाओं की अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) से जांच कराने का फैसला किया है; इस तरह कुल 45 परीक्षाएं कार्रवाई के दायरे में आ गई हैं। यह कार्रवाई अपने विस्तार में अभूतपूर्व जरूर है लेकिन किसी निर्णय की कठोरता ही उसे न्यायपूर्ण साबित नहीं करती। भ्रष्टाचार पर प्रहार जरूरी, पर न्याय भी उतना ही जरूरी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, सीटों की कथित खरीद-फरोख्त, एजेंसियों की संदिग्ध भूमिका और चयन प्रक्रिया में अनियमितता लोकतंत्र के लिए गंभीर अपराध हैं। सरकारी नौकरी केवल वेतन का साधन नहीं होती; यह लाखों युवाओं के लिए सामाजिक सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और वर्षों की मेहनत का परिणाम होती है। इसलिए, परीक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार सामने आने पर सरकार का चुप रहना स्वीकार्य नहीं होता। जांच, गिरफ्तारी, दोषियों पर मुकदमा और अवैध चयन रद्द करना जरूरी है लेकिन सवाल यह है कि क्या हर सफल अभ्यर्थी को बिना अलग-अलग जांच के दोषी मान लेना भी उतना ही खतरनाक नहीं है? एक आदेश और हजारों जीवन उलट गए झारखंड में कई परीक्षाओं की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और उनसे नियुक्त करीब 2394 अधिकारी अलग-अलग विभागों में कार्यरत थे, जिनकी नियुक्तियां सरकार के फैसले के बाद समाप्त मानी जा रही हैं। वहीं, जेएसएससी-सीजीएल से 1932 अभ्यर्थियों का चयन हो चुका है। सरकार के एक फैसले से हजारों लोगों का जीवन रातों-रात उलट गया कल तक अधिकारी, आज बेरोजगार नियुक्त अभ्यर्थियों की पीड़ा को केवल “परीक्षा रद्द” जैसे प्रशासनिक शब्दों में नहीं समझा जा सकता। इनमें ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने दूसरी स्थायी नौकरियां छोड़कर झारखंड सरकार की सेवा स्वीकार की। एक नियुक्त अधिकारी ने बताया कि वह पहले एलआईसी और भारतीय खाद्य निगम में काम कर चुके थे लेकिन नई नौकरी के लिए पुराने पद छोड़ दिए और अब अचानक सेवा समाप्त होने के बाद उनके पास लौटने का रास्ता नहीं बचा। किसी युवा ने वर्षों तैयारी की होगी, परिवार ने कर्ज लिया होगा, नौकरी मिलने पर विवाह या मकान की योजना बनाई होगी, बच्चों की पढ़ाई शुरू की होगी और वृद्ध माता-पिता की जिम्मेदारी संभाली होगी। आठ महीने वेतन देने के बाद अचानक यह कहना कि पूरी चयन प्रक्रिया ही समाप्त है, केवल रोजगार का नुकसान नहीं-यह व्यक्ति की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्थिरता पर सीधा प्रहार है। क्या नियुक्त कर्मियों को सुनने का मौका मिला? सफल अभ्यर्थियों का मुख्य आरोप यह है कि सरकार ने उनका पक्ष सुने बिना फैसला कर दिया। कानून के अनुसार, नियुक्ति के बाद बिना अभ्यर्थियों को सुनवाई का अवसर दिए नौकरी रद्द करना न्याय के विरुद्ध है। यहीं प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत सामने आता है कि किसी व्यक्ति को दंडित करने से पहले उसे सुनना जरूरी है। यदि कुछ अभ्यर्थियों ने धोखाधड़ी की तो उनकी पहचान की जानी चाहिए। यदि किसी रोल नंबर, केंद्र, मूल्यांकन प्रक्रिया या दस्तावेज में गड़बड़ी हुई तो उस हिस्से को अलग किया जाना चाहिए। पूरे बैच को एक समान दोषी मानना प्रशासन के लिए आसान हो सकता है, पर न्याय के लिए पर्याप्त नहीं। देश में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हुई कार्रवाई देश ने व्यापमं घोटाला देखा, आरईईटी पेपर लीक देखा, उत्तर प्रदेश की पुलिस भर्ती और आरओ-एआरओ परीक्षा रद्द होते देखी लेकिन झारखंड का मामला इन सबसे अलग है। यहां केवल एक परीक्षा नहीं बल्कि पूरे भर्ती तंत्र को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया गया है। सरकार ने 22 परीक्षाएं रद्द कर दीं, 17 पुरानी परीक्षाओं की सीआईडी जांच शुरू कर दी और 6 परीक्षाओं को रोक दिया यानी 45 परीक्षाएं अब जांच और कार्रवाई के दायरे में हैं। यह निश्चित रूप से देश के भर्ती इतिहास की सबसे बड़ी प्रशासनिक कार्रवाइयों में से एक है। दूसरे राज्यों ने भी परीक्षाएं रद्द कीं, लेकिन झारखंड का पैमाना सबसे बड़ा पेपर लीक और भर्ती घोटालों के मामलों में अन्य राज्यों ने भी कड़े फैसले लिए हैं। उत्तराखंड में वर्ष 2022 के यूकेएसएसएससी पेपर लीक मामले के बाद 13 विभागों की 5363 भर्तियां निरस्त कर दी गईं और उन्हें लोक सेवा आयोग को सौंप दिया गया। राजस्थान में आरईईटी-2021 का लेवल-2 पेपर रद्द हुआ और बाद में आरपीएससी वरिष्ठ अध्यापक भर्ती का सामान्य ज्ञान पेपर भी दोबारा कराया गया। उत्तर प्रदेश में 2024 की पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा रद्द करनी पड़ी, जिसमें 60,244 पदों के लिए 48 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे। उसी वर्ष आरओ/एआरओ परीक्षा भी रद्द हुई, जिसमें 411 पदों के लिए 10.76 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। हरियाणा में ग्राम सचिव और पुरुष कांस्टेबल भर्ती परीक्षाएं भी पेपर लीक के बाद रद्द करनी पड़ीं। लेकिन, इन सभी मामलों में कार्रवाई कुछ चुनिंदा परीक्षाओं तक सीमित रही जबकि झारखंड में पूरा भर्ती तंत्र ही जांच के घेरे में आ गया है। गलती किसकी है इस पूरे विवाद में जिम्मेदारी को तीन स्तरों पर देखना होगा। पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी परीक्षा व्यवस्था की परीक्षा कराने वाली एजेंसी खासकर टीडीपीएल किस आधार पर चुनी गई? उसके पिछले रिकॉर्ड की जांच किसने की? प्रश्नपत्र की सुरक्षा, डिजिटल डेटा, मूल्यांकन, परीक्षा केंद्र और परिणाम प्रक्रिया की निगरानी किसके जिम्मे थी? यदि एजेंसी संदिग्ध थी, तो उसे काम देने वाले अधिकारी जवाबदेही से बाहर कैसे रह सकते हैं? सरकार ने अब छह परीक्षाओं से जुड़ी एजेंसियों के प्रमाण और विश्वसनीयता की जांच सीआईडी को सौंपी है। यह कदम जरूरी है लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि ऐसी जांच एजेंसी के चयन से पहले क्यों नहीं हुई। ज्ञात हो कि झारखंड में परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी टीडीपीएल (टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड) पर पहले भी गंभीर आरोप लग चुके हैं। जांच रिपोर्ट के अनुसार, यह उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 में तीन साल के लिए ब्लैकलिस्टेड की जा चुकी थी। अब सवाल उठता है कि झारखंड सरकार ने एक ब्लैकलिस्टेड एजेंसी से सेवाएं क्यों ली या उसकी सेवाएं बहाल क्यों रखी? दूसरी जिम्मेदारी आयोगों और निगरानी तंत्र की जेपीएससी और जेएसएससी भर्ती प्रक्रिया के संवैधानिक तथा संस्थागत संरक्षक हैं। यदि बड़े पैमाने पर अनियमितता हुई, तो यह केवल बाहरी एजेंसी की विफलता नहीं, बल्कि निगरानी, सत्यापन और नियंत्रण की भी विफलता है। सरकार ने अब दोनों आयोगों में आंतरिक निगरानी प्रकोष्ठ बनाने और परीक्षा सुधार समिति गठित करने का निर्णय लिया है। इसका अर्थ है कि मौजूदा निगरानी ढांचा पर्याप्त नहीं था। इस संस्थागत कमजोरी की कीमत केवल अभ्यर्थियों से नहीं वसूली जा सकती। तीसरी जिम्मेदारी उन व्यक्तियों की, जिन्होंने गड़बड़ी की यदि किसी अभ्यर्थी ने पैसे देकर सीट खरीदी, नकल कराई, लीक प्रश्नपत्र हासिल किया या फर्जी दस्तावेज दिया, तो वह निर्दोष नहीं है। ऐसे लोगों की नियुक्ति रद्द होनी चाहिए, वेतन की वसूली हो सकती है और उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन, दोष सिद्ध करने का दायित्व जांच एजेंसी का है। “कुछ लोगों ने गड़बड़ी की होगी” के आधार पर “सभी दोषी हैं” का निष्कर्ष न्याय नहीं, सामूहिक दंड है। सरकार का फैसला: सही नीयत, अधूरी प्रक्रिया? सरकार का उद्देश्य भर्ती प्रणाली में विश्वास बहाल करना बताया गया है। नीयत पारदर्शिता की हो सकती है, लेकिन प्रक्रिया में संतुलन जरूरी है। पूरी परीक्षा रद्द करना तब उचित हो सकता है जब गड़बड़ी इतनी व्यापक हो कि सही और गलत चयन को अलग करना संभव न हो लेकिन इसके लिए सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि गड़बड़ी किन चरणों में हुई, कितने केंद्र या अभ्यर्थी प्रभावित पाए गए, क्या मेरिट सूची पूरी तरह दूषित थी, क्या डिजिटल या दस्तावेजी रिकॉर्ड से दोषियों की पहचान संभव नहीं थी, नियुक्त कर्मियों को व्यक्तिगत सुनवाई क्यों नहीं दी गई? इन प्रश्नों के उत्तर के बिना फैसला प्रशासनिक शक्ति का प्रदर्शन तो बन सकता है, न्याय का आदर्श नहीं। सीबीआई बनाम सीआईडी की लड़ाई से आगे बढ़ना होगा आंदोलनरत छात्रों का एक वर्ग सीबीआई जांच की मांग पर अड़ा है जबकि सरकार ने सीआईडी जांच और सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी की बात कही है। जांच किस संस्था से हो, यह महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि जांच समयबद्ध, स्वतंत्र, पारदर्शी और परिणाममुखी हो। वर्षों तक जांच चलती रही और निर्दोष कर्मचारी बेरोजगार बैठे रहे, तो न्याय का कोई अर्थ नहीं बचेगा। फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रस्ताव इसी कारण महत्वपूर्ण है, पर उसका गठन और वास्तविक संचालन जल्द होना चाहिए। हाई कोर्ट में अब परीक्षा से बड़ा सवाल सफल अभ्यर्थियों ने जेपीएससी की संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और अन्य भर्तियों को रद्द करने के फैसले के खिलाफ झारखंड हाई कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की हैं। उनका कहना है कि जांच से आपत्ति नहीं, लेकिन बिना व्यक्तिगत दोष तय किए पूरी परीक्षा रद्द करना अनुचित है। अब अदालत के सामने केवल यह प्रश्न नहीं होगा कि परीक्षा में गड़बड़ी हुई या नहीं। बड़ा प्रश्न यह होगा कि प्रशासनिक शुचिता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्या हो सकता है न्यायसंगत रास्ता सबसे संतुलित रास्ता यह हो सकता है कि सरकार नियुक्तियों को तत्काल अंतिम रूप से समाप्त करने के बजाय जांच पूरी होने तक सशर्त स्थिति में रखे। जिन अभ्यर्थियों के खिलाफ ठोस सबूत मिले, उनकी सेवा समाप्त हो; जिनका चयन साफ पाया जाए, उन्हें संरक्षण मिले। साथ ही नियुक्त कर्मियों को व्यक्तिगत नोटिस और सुनवाई का मौका दिया जाए, संदिग्ध रोल नंबर, परीक्षा केंद्र और मूल्यांकन समूह अलग किए जाएं, दोषी एजेंसी और अधिकारियों की संपत्ति तथा भूमिका की जांच हो, जांच के लिए निश्चित समय-सीमा तय हो, निर्दोष पाए गए कर्मचारियों की सेवा, वरिष्ठता और वेतन सुरक्षित रहे तथा मानसिक और आर्थिक संकट झेल रहे परिवारों के लिए अंतरिम व्यवस्था बने। अंतिम फैसला: गलती अभ्यर्थियों की नहीं, व्यवस्था की है—जब तक व्यक्तिगत दोष सिद्ध न हो उपलब्ध तथ्यों के आधार पर प्राथमिक और सबसे बड़ी गलती भर्ती व्यवस्था, आयोगों, परीक्षा एजेंसियों और उनकी निगरानी करने वाले सरकारी तंत्र की दिखाई देती है। सरकार ने जिस प्रणाली के जरिए आवेदन लिया, परीक्षा कराई, परिणाम घोषित किया, दस्तावेज जांचे, नियुक्ति पत्र दिए और महीनों वेतन दिया, उस पूरी प्रक्रिया की वैधता की जिम्मेदारी राज्य की थी। निर्दोष अभ्यर्थी उस व्यवस्था के निर्माता नहीं थे; वे उसके भरोसे परीक्षा देने वाले नागरिक थे। इसलिए भ्रष्टाचारियों को बचाना गलत होगा लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था की विफलता का बोझ सभी सफल उम्मीदवारों पर डाल देना भी उतना ही गलत है। न्याय का अर्थ केवल परीक्षा रद्द करना नहीं बल्कि दोषी को पहचानना और निर्दोष को बचाना है। झारखंड सरकार की कार्रवाई इतिहास में साहसिक कदम के रूप में दर्ज हो सकती है लेकिन तभी जब इसके बाद असली दोषी जेल जाएं, जिम्मेदार अधिकारी जवाब दें और ईमानदारी से नौकरी पाने वाले युवाओं का जीवन बर्बाद न हो। अन्यथा यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ न्याय से अधिक, व्यवस्था की गलती की सजा निर्दोषों को देने का उदाहरण बन जाएगा।