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भागलपुर। गंगा को बांधकर उसका पानी नियंत्रित करने की कोशिशों का सवाल अब केवल फरक्का बैराज तक सीमित नहीं रह गया है। नदी की अविरलता, गाद, कटाव, बाढ़, मछलियों और जलीय जीवों का संकट, जलवायु परिवर्तन तथा नदी-आश्रित समुदायों की आजीविका—इन सभी सवालों को एक साथ देखने की जरूरत है। इसी व्यापक संदर्भ में गंगा मुक्ति आंदोलन की ओर से 29 और 30 अगस्त को भागलपुर में भारत-बांग्लादेश फरक्का जल समझौते पर दो दिवसीय राष्ट्रीय जन संवाद आयोजित किया गया। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से आए नदीकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद और साहित्य-संस्कृति से जुड़े लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। फरक्का हटाने की मांग, जल बंटवारा जारी रखने का प्रस्ताव संवाद का सबसे स्पष्ट निष्कर्ष था कि फरक्का बैराज को हटाया जाए लेकिन जब तक फरक्का नहीं हटता, तब तक भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे की व्यवस्था जारी रहनी चाहिए। इस दृष्टिकोण के साथ पारित ‘भागलपुर घोषणा पत्र’ में नदी को राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक साझा प्राकृतिक धरोहर के रूप में देखने की बात कही गई। वरिष्ठ समाजसेवी एवं संस्कृति कर्मी उदय ने जन संवाद की भूमिका रखते हुए कहा कि आंदोलन की लड़ाई केवल फरक्का के खिलाफ नहीं रही है। देश और दुनिया में नदियों पर बने बांधों और बैराजों ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है। दिसंबर में भारत-बांग्लादेश फरक्का जल समझौते की वर्तमान अवधि समाप्त होने की पृष्ठभूमि में यह संवाद अपना सामूहिक पक्ष तय करने के लिए आयोजित किया गया है। जलवायु संकट और विकास नीति पर चिंता चर्चा में वर्तमान विकास नीति और जलवायु संकट प्रमुख विषय रहे। प्रतिभागियों ने कहा कि पर्यावरण किसी एक देश या क्षेत्र का प्रश्न नहीं है। नेपाल की प्राकृतिक विभीषिका का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। प्रकृति को मनुष्य अपनी सुविधा के मुताबिक नियंत्रित नहीं कर सकता। बिजली उत्पादन के नाम पर पहाड़ी नदियों पर बड़े बांध बनाने का असर नीचे रहने वाले समुदायों को भुगतना पड़ता है। बाढ़, सुखाड़, भूस्खलन और भूकंप जैसी आपदाओं को नदी और पहाड़ों में बढ़ते हस्तक्षेप के संदर्भ में देखने की जरूरत है। फरक्का समझौते और नदी पारिस्थितिकी पर चर्चा कोसी क्षेत्र के नदी वैज्ञानिक महेंद्र यादव ने फरक्का बैराज और भारत-बांग्लादेश के बीच हुए जल समझौते के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा। उनका जोर नदी को एक अविच्छिन्न पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखने पर था। ऑनलाइन जुड़े गंगा मुक्ति आंदोलन के अनिल प्रकाश, नदी घाटी मंच के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय और नदीकर्मी-साहित्यकार जया मित्र ने भी अपने विचार रखे। उनका कहना था कि नदियों को बांधना केवल नदी के प्रवाह को रोकना नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी सभ्यता, जैव-विविधता और लोगों की आजीविका को प्रभावित करना है। 1200 बांधों और बैराजों पर उठे सवाल जन संवाद में कहा गया कि हिमालय से लेकर गंगा के मैदान तक गंगा और उसकी सहायक नदियों पर लगभग 1200 छोटे-बड़े बांध और बैराज बनाए जा चुके हैं। इनके कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ है और जलीय जीवों के आवास तथा उनके आवागमन के रास्ते नष्ट हुए हैं। नदी को जीवित रखने के लिए उसके प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखना जरूरी है। दूसरे दिन की अध्यक्षता वरिष्ठ समाजकर्मी और तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व डीएसडब्ल्यू डॉ. योगेंद्र ने की और संचालन उदय ने किया। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार से आए कार्यकर्ताओं ने कहा कि फरक्का से पैदा हुई समस्याओं को अलग-थलग करके देखना ठीक नहीं होगा। गंगा और उसकी सहायक नदियों को बंधनों से मुक्त किए बिना गंगा को मुक्त नहीं किया जा सकता। मछुआरों, किसानों और दियारा क्षेत्रों की चिंता मछुआरे, किसान, दियारा और चौर क्षेत्र के लोग बांधों और बैराजों के सबसे बड़े प्रभावित समुदायों में हैं। वक्ताओं ने कहा कि गाद जमा होने से गंगा कई जगह उथली हुई है और इससे बाढ़ की विभीषिका बढ़ी है। मालदा से आए गौतम पाल और खिदिर बॉक्स ने पश्चिम बंगाल में गंगा कटाव की गंभीर स्थिति का उल्लेख किया। उनके अनुसार मालदा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कटाव ने लोगों के घर, जमीन और आजीविका को प्रभावित किया है। फरक्का और जल संधि को अलग-अलग देखने की जरूरत जया मित्र ने एक महत्वपूर्ण भेद की ओर ध्यान दिलाया—फरक्का बैराज और भारत-बांग्लादेश जल संधि दो अलग प्रश्न हैं। नदी कई राज्यों और देशों से होकर गुजरती है। उसका पानी किसी एक राष्ट्र की संपत्ति नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जब आधुनिक राष्ट्र और राज्य अस्तित्व में नहीं थे, तब भी नदियां थीं। आज पानी को सामरिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। पानी का राष्ट्रवाद एक नई राजनीतिक प्रक्रिया है। बांग्लादेश का गंगा के पानी पर उतना ही हक है जितना भारत का, और भारत के भीतर जितना हक उत्तर प्रदेश और बिहार का है, उतना ही झारखंड और पश्चिम बंगाल का भी होना चाहिए। नेपाल को भी शामिल करने की मांग पर्यावरणविद घनश्याम ने कहा कि भविष्य में नदी और जल को लेकर होने वाले किसी भी संवाद में नेपाल को शामिल करना जरूरी है। फरक्का और भारत-बांग्लादेश जल व्यवस्था से संबंधित किसी भी समिति में सभी हितधारकों की भागीदारी होनी चाहिए। महेंद्र यादव और तापस दास ने ‘विजन ड्राफ्ट’ पेश किया, जिसे सर्वसम्मति से पारित किया गया। डॉ. रुचि श्री, गौतम, खिदिर बॉक्स, प्रसून लतांत, मनोज मीता, रोहित कुमार और उज्ज्वल घोष सहित कई प्रतिभागियों ने संवाद को आगे बढ़ाया। नदी बचाओ-जीवन बचाओ आंदोलन, बंगाल के तापस दास, कोसी क्षेत्र में सक्रिय महेंद्र यादव, रत्ना और डॉ. योगेंद्र ने भी अपने विचार रखे। योगेंद्र सहनी, निर्मल, गौतम कुमार, नरेश सिंह, रोहित कुमार, अनिरुद्ध, कुमार कृष्णन, मोहम्मद बाकिर और मनोज मीता ने नदी की अविरलता के सवाल पर जोर दिया। 'भागलपुर घोषणा पत्र' की प्रमुख बातें जन संवाद के बाद जारी ‘भागलपुर घोषणा पत्र’ ने 1982 में गंगा मुक्ति आंदोलन के आरंभिक दौर के नारे “फरक्का को तोड़ दो, नदियों को अविरल बहने दो, अविरल गंगा, निर्मल गंगा” को फिर दोहराया। इसमें 26 फरवरी 2017 को बिहार सरकार द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में लिए गए ‘अविरल गंगा’ संबंधी संकल्प का भी उल्लेख किया गया। घोषणा-पत्र में कहा गया कि फरक्का बैराज के निर्माण के पीछे प्रमुख उद्देश्यों में हुगली नदी को पानी उपलब्ध कराना और हल्दिया बंदरगाह के लिए गाद को समुद्र की ओर फ्लश करना शामिल था। लेकिन बैराज के परिणामों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए। आंदोलन के अनुसार फरक्का के ऊपरी हिस्से में जमा गाद, बिहार में गंगा और उसकी सहायक नदियों में बाढ़ तथा कटाव की समस्या से जुड़ी है, जबकि फरक्का के नीचे पश्चिम बंगाल को भी गंभीर कटाव का सामना करना पड़ा है। नदियों और जैव-विविधता पर असर घोषणा में कहा गया कि कई छोटी नदियां मृतप्राय हो गई हैं। फीडर कैनाल के माध्यम से पानी के प्रवाह में बदलाव के कारण सुंदरबन तक मीठे पानी और गाद के पहुंचने पर भी असर पड़ा है। हिलसा सहित अनेक मछली प्रजातियों की संख्या घटने, जलीय जीव-जंतुओं और पौधों के नष्ट होने को नदी के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के रूप में रेखांकित किया गया। घोषणा पत्र में सरकार से फरक्का बैराज को हटाने के लिए डिकमीशन टीम गठित करने की मांग की गई है। साथ ही कहा गया है कि बैराज हटने की स्थिति में उस पर निर्भर शहरी आबादी और अन्य लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था विकसित की जाए। दामोदर घाटी निगम की परियोजना से जुड़े नदी और पर्यावरणीय प्रभावों की स्वतंत्र समीक्षा, गंगा पर बने अन्य बांधों के लाभ-हानि का निष्पक्ष मूल्यांकन तथा बिहार में कोसी सहित अन्य नदियों पर बने तटबंधों और बैराजों की भी समीक्षा की मांग की गई है। आंदोलन ने देश और दुनिया में बने बांधों, बैराजों और तटबंधों की भूमिका पर पुनर्विचार तथा मुनाफा-केंद्रित और कॉरपोरेट-परस्त विकास नीति के स्थान पर जलवायु और पर्यावरण के अनुकूल सतत विकास नीति अपनाने की मांग की है। जल संधि पर स्पष्ट रुख जल संधि को लेकर जन संवाद का रुख यह नहीं था कि बांग्लादेश को पानी देने से इनकार किया जाए। इसके उलट घोषणा-पत्र में नदी के उद्गम से समुद्र तक उसके पानी के न्यायपूर्ण बंटवारे का समर्थन किया गया। इसमें कहा गया कि नदी मानव सभ्यता और आधुनिक राष्ट्र-राज्यों से पहले से अस्तित्व में है। इसलिए पानी को राष्ट्रवाद, उप-राष्ट्रवाद या सामरिक संघर्ष का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। घोषणा पत्र में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में गंगा में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसलिए जल बंटवारा वास्तविक जल उपलब्धता के वैज्ञानिक आकलन पर आधारित होना चाहिए। जब तक फरक्का बैराज हटाया नहीं जाता, तब तक दोनों देशों के बीच जल बंटवारे की व्यवस्था जारी रखने की मांग की गई है। भारत-बांग्लादेश संयुक्त नदी आयोग में दोनों देशों के मछुआरों, किसानों और अन्य हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग भी रखी गई है। साथ ही बिहार के भीतर गंगा के पानी के न्यायपूर्ण बंटवारे का प्रश्न उठाया गया। आंदोलन का तर्क है कि गंगा की सहायक नदियों के पानी और ऊपरी राज्यों में जल उपयोग का भार बिहार के हिस्से आता है, जबकि राज्य को अपनी विकास आवश्यकताएं भी पूरी करनी हैं। नेपाल आपदा के पीड़ितों को श्रद्धांजलि समापन पर रामशरण ने कहा कि नदी और पानी को न तो ‘वाटर बम’ की तरह इस्तेमाल होने दिया जाएगा और न ही सामाजिक ध्रुवीकरण का हथियार बनने दिया जाएगा। अंत में नेपाल की त्रासदी में मारे गए लोगों की स्मृति में एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई। भागलपुर का यह जन संवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने फरक्का विवाद को केवल भारत-बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे का सवाल मानने से इनकार किया है। उसने इसे नदी के अस्तित्व, पर्यावरण, जलवायु, आजीविका और न्याय के बड़े सवाल से जोड़ा है। असली प्रश्न यही है कि क्या नदी को केवल पानी की पाइपलाइन मानकर उसके प्रवाह को नियंत्रित किया जा सकता है, या उसे एक जीवित पारिस्थितिकी के रूप में समझना होगा? गंगा मुक्ति आंदोलन का उत्तर स्पष्ट है—नदी अविरल होगी तभी जीवन बचेगा; पानी साझा होगा तभी पड़ोसी संबंध टिकेंगे; और विकास तभी टिकाऊ होगा जब वह नदी और नदी पर निर्भर समाज के पक्ष में होगा।



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