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मुंबई। कॉमेडी में हंसी के बड़े मौके पुरुष किरदारों के हिस्से और महिलाओं के खाते में सिर्फ सपोर्टिंग रोल—इस पुराने फॉर्मूले से अलग हटती कहानी ने संदीपा धर को ‘चुंबक’ की ओर खींचा, जहां उनके मुताबिक महिला किरदार न तो स्टीरियोटाइप में बंधे हैं और न ही पारंपरिक जेंडर रोल्स तक सीमित, बल्कि उन्हें कहानी और कॉमेडी दोनों में खुलकर अपनी जगह दी गई है। आखिर ‘चुंबक’ में ऐसा क्या था कि संदीपा ने कहा हां? किसी भी कलाकार के लिए नया प्रोजेक्ट चुनने की अपनी वजह होती है। संदीपा धर के लिए ‘चुंबक’ की सबसे बड़ी खूबी इसकी कहानी में महिलाओं को देखने का नजरिया रहा। संदीपा के मुताबिक, कॉमेडी के आम फॉर्मेट में अक्सर पुरुष किरदारों के हिस्से ज्यादातर कॉमिक मोमेंट्स आते हैं और महिलाओं को उनके आसपास सपोर्टिंग किरदारों के रूप में पेश किया जाता है लेकिन ‘चुंबक’ में उन्हें तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आई। संदीपा कहती हैं, “मैं इस शो को लेकर इसलिए उत्साहित थी क्योंकि इसमें महिलाओं को स्टीरियोटाइपिकल तरीके से नहीं दिखाया गया है।” ‘पुरुषों के पास सारे कॉमिक पार्ट्स... लेकिन यहां ऐसा नहीं’ संदीपा ने कॉमेडी में महिला और पुरुष किरदारों को मिलने वाले स्पेस पर भी खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “आमतौर पर कॉमेडी में पुरुषों के पास सारे कॉमिक पार्ट्स होते हैं, जबकि महिलाएं सिर्फ सपोर्टिंग कैरेक्टर्स होती हैं। लेकिन यहां ऐसा बिल्कुल नहीं है।” यानी ‘चुंबक’ में महिला किरदार सिर्फ किसी पुरुष किरदार की कहानी पूरी करने के लिए मौजूद नहीं हैं। उन्हें अपना कॉमिक स्पेस और कहानी में सक्रिय मौजूदगी दी गई है। ‘ट्विंकल’ का नाम लेकर संदीपा ने बताई खासियत अपनी बात समझाने के लिए संदीपा ने हेली शाह के किरदार ‘ट्विंकल’ का उदाहरण दिया। संदीपा के मुताबिक, “यहां हमारे पास ट्विंकल (हेली शाह) है, जिनकी कॉमेडी शो में सबसे अव्वल है।” उनका यह उदाहरण बताता है कि ‘चुंबक’ में हंसी पैदा करने की जिम्मेदारी केवल पुरुष किरदारों के कंधों पर नहीं रखी गई है। महिला किरदार भी कॉमेडी के केंद्र में हैं। न सिर्फ रसोई, न सिर्फ खाना परोसती महिलाएं संदीपा को शो की एक और बात खास लगी- पारंपरिक जेंडर रोल्स से दूरी। उन्होंने कहा, “हम महिलाओं को सिर्फ बैठकर खाना बनाते या पुरुषों को खाना परोसते हुए नहीं दिखा रहे हैं।” महिला किरदारों की दुनिया को घर के पारंपरिक कामकाज तक समेटने के बजाय उन्हें कहानी में ज्यादा सक्रिय भूमिका देने की कोशिश की गई है। ‘आतिश ने यह बहुत सोच-समझकर किया’ संदीपा ने इसका श्रेय आतिश को भी दिया। उनके मुताबिक, महिला किरदारों को पारंपरिक खांचे से बाहर रखने का फैसला संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे सोच थी। संदीपा ने कहा, “दरअसल, आतिश ने यह बहुत सोच-समझकर किया है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हम पारंपरिक जेंडर रोल्स को फॉलो न करें।” ‘चुंबक’ की कॉमेडी सिर्फ पंचलाइन और मजेदार हालात पैदा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके किरदारों को गढ़ने के तरीके में भी अलग नजरिया अपनाने की कोशिश की गई है। स्क्रिप्ट पढ़ते-पढ़ते ही संदीपा को हुआ कुछ अलग होने का एहसास दिलचस्प बात यह है कि संदीपा को इस अलग ट्रीटमेंट का अहसास शूटिंग के दौरान नहीं, बल्कि स्क्रिप्ट पढ़ते समय ही हो गया था। राइटिंग में महिलाओं के लिए जिस तरह जगह बनाई गई थी, उसने उनका ध्यान खींच लिया। उन्होंने कहा, “जब मैं स्क्रिप्ट पढ़ रही थी, तभी मुझे लगा कि किसी को महिलाओं के किरदारों को इस तरह लिखते देखना वाकई काफी रिफ्रेशिंग है।” ‘चुंबक’ की कॉमेडी का यही है अलग स्वाद संदीपा धर की बातों से ‘चुंबक’ की एक तस्वीर साफ उभरती है—यहां महिला किरदार सिर्फ कहानी की सजावट या पुरुष किरदारों के सपोर्ट सिस्टम बनकर नहीं रहते। उन्हें हंसने-हंसाने, कहानी में सक्रिय रहने और अपनी अलग मौजूदगी दर्ज कराने का स्पेस मिला है और यही वह बात थी जिसने पहली बार स्क्रिप्ट पढ़ते हुए संदीपा का ध्यान खींच लिया।



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