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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को यात्रियों को "सेकेंड क्लास पैसेंजर" कहना बंद करने की सलाह देते हुए आज कहा कि श्रेणी किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि केवल कोच की हो सकती है और इस तरह की शब्दावली संविधान की समानता और गरिमा की भावना के अनुरूप नहीं है। 'सेकेंड क्लास पैसेंजर' शब्द पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि रेलवे को अपनी शब्दावली पर पुनर्विचार करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि "सेकेंड क्लास" जैसी श्रेणी केवल डिब्बे (कोच) के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए न कि उसमें यात्रा करने वाले व्यक्ति के लिए। पीठ ने टिप्पणी की है कि किसी यात्री को इस तरह संबोधित करना "भारतीय संविधान की भावना के प्रतिकूल" है। ट्रेन हादसे के मामले में आया फैसला यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें वर्ष 2015 में रायपुर से अहमदाबाद जा रही ट्रेन से गिरकर चंद्रकांत ठक्कर की मौत हो गई थी। हादसे के बाद उनका यात्रा बैग और टिकट नहीं मिल सका। उनकी पत्नी लता ने रेलवे से मुआवजे की मांग की थी। सिर्फ टिकट नहीं मिलने से यात्री अवैध नहीं माना जा सकता रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मुआवजा देने से इनकार कर दिया था कि मृतक के पास वैध टिकट होने का प्रमाण नहीं है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों फैसलों को पलटते हुए कहा कि केवल टिकट बरामद न होने से यह नहीं माना जा सकता कि व्यक्ति बिना टिकट यात्रा कर रहा था। अदालत ने कहा कि यदि दावेदार शपथपत्र (एफिडेविट) के जरिए आवश्यक तथ्य प्रस्तुत कर देता है तो उसके बाद यह साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की होती है कि यात्री वैध नहीं था। मानवीय दृष्टिकोण से हो कानून की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे दुर्घटना मुआवजा संबंधी प्रावधान पीड़ितों के हित में बनाए गए हैं इसलिए उनकी व्याख्या उदार और मानवीय दृष्टिकोण से की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रमाण का स्तर आपराधिक मामलों जैसा "संदेह से परे" नहीं बल्कि "संभावनाओं के आधार" पर तय किया जाता है। रेलवे की व्यवस्था पर भी उठाए सवाल सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे के सुरक्षा नियमों, टिकट जांच व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और फुटबोर्ड यात्रा से जुड़े दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि नियमों में दूरदर्शिता तो दिखाई देती है लेकिन उनका क्रियान्वयन संतोषजनक नहीं है। यात्रियों की भी बराबर जिम्मेदारी अदालत ने यह भी कहा कि हादसों के लिए केवल रेलवे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यात्रियों की भी बराबर जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि लोग जोखिम जानते हुए भी चलती ट्रेन पकड़ने और खतरनाक तरीके से यात्रा करने से बाज नहीं आते, जिससे कई बार जानलेवा हादसे होते हैं। रेलवे में युवाओं की भर्ती बढ़ाने का सुझाव सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को अधिक संख्या में युवाओं की भर्ती करने का भी सुझाव दिया। अदालत ने कहा कि इससे एक ओर युवाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा वहीं दूसरी ओर सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होगी और दुर्घटनाओं में कमी आएगी। चार सप्ताह में 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने अंततः रेलवे को निर्देश दिया कि वह मृतक की पत्नी लता को चार सप्ताह के भीतर 8 लाख रुपये का मुआवजा अदा करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में तकनीकी आधार पर राहत से इनकार करने के बजाय न्याय और मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।



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