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नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने दिल्ली के जंतर-मंतर और अन्य राज्यों में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलनों से जुड़े प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए 18 वर्ष से कम उम्र के हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है वहीं यह राहत आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को नहीं मिलेगी और दर्ज एफआईआर की जांच जारी रहेगी। जांच पर रोक नहीं, लेकिन गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई से राहत मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि दिल्ली सरकार और अन्य राज्य आंदोलन से जुड़े मामलों की जांच जारी रख सकते हैं लेकिन सामान्य प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कोई कठोर या दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड है, उन्हें इस संरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। इस तरह कोर्ट ने एक ओर छात्रों को तत्काल राहत दी वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियों के अधिकारों को पूरी तरह रोका भी नहीं। हिरासत में लिए गए नाबालिगों को तुरंत छोड़ने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि आंदोलन के सिलसिले में गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए ऐसे बच्चों को तत्काल रिहा किया जाए, जिनकी उम्र 18 वर्ष से कम है और जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि बिहार में करीब 150 लोग अब भी हिरासत में हैं और उनमें कई नाबालिग हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से दावा किया गया कि कुछ बच्चों की उम्र महज 13 वर्ष है। पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति के संकेत पीठ ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादती के आरोप प्रथम दृष्टया निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जरूरत बताते हैं। अदालत ने संकेत दिया कि इन घटनाओं की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जा सकती है। हालांकि समिति बनाने से पहले केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और संबंधित राज्यों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया है। कोर्ट ने दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, केरल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया है। सीसीटीवी, ड्रोन और वायरलेस रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण साक्ष्य सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। इनमें सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा वीडियो, वायरलेस संदेश, पीसीआर कॉल और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड शामिल हैं। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा एकत्र किए गए प्रदर्शनकारियों के निजी और डिजिटल डेटा को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। किसी भी प्रदर्शनकारी का व्यक्तिगत विवरण या पहचान सार्वजनिक करने पर रोक रहेगी। पैलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन और कील लगी लाठियों के आरोप सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन, रबर की गोलियां, इलेक्ट्रिक बैटन और कथित तौर पर कील लगी लाठियों का इस्तेमाल किया गया। कोर्ट ने उस आरोप का भी संज्ञान लिया, जिसमें एक छात्र की आंखों की रोशनी चले जाने की बात कही गई है। इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के दौरान सादी वर्दी में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। अदालत ने इन आरोपों को अपने आदेश में दर्ज किया लेकिन फिलहाल उनकी सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया। सरकार बोली—आंदोलन में घुसे थे आपराधिक तत्व केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन छात्रों का अधिकार है और यदि पुलिस ज्यादती हुई है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन में कुछ असामाजिक और आपराधिक तत्व घुस आए थे, जिन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला किया। सरकार की ओर से दावा किया गया कि कुछ ऐसे लोग भी प्रदर्शन में मौजूद थे, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने पूछा—क्या पुलिस पर हमला करने वाले वास्तव में छात्र थे? मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि निष्पक्ष जांच में यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि पुलिस पर हमले और हिंसा में शामिल लोग वास्तव में आंदोलनकारी छात्र थे या बाहरी तत्व। पीठ ने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसा के नाम पर बदनाम किए जाने का खतरा हमेशा रहता है, इसलिए पूरी सच्चाई सामने आना जरूरी है। प्रदर्शन के नियमों में बदलाव की जरूरत पर जोर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन और विरोध प्रदर्शन होते रहेंगे लेकिन ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए स्पष्ट और संतुलित व्यवस्था की आवश्यकता है। पीठ ने संकेत दिया कि विरोध प्रदर्शनों को लेकर पूर्व के फैसलों में तय दिशानिर्देशों की समीक्षा या संशोधन जरूरी हो सकता है ताकि एक ओर नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा हो और दूसरी ओर कानून-व्यवस्था भी बनी रहे। पेपर लीक के खिलाफ जून में शुरू हुआ था आंदोलन गौरतलब है कि सीजेपी के आह्वान पर जून में बार-बार प्रश्नपत्र लीक होने के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए थे। आंदोलनकारियों ने तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल में शामिल होने के बाद आंदोलन ने और जोर पकड़ा। बाद में स्वास्थ्य बिगड़ने पर दिल्ली पुलिस उन्हें प्रदर्शन स्थल से अस्पताल ले गई और उन्होंने 23 जुलाई की रात 26 दिन लंबी भूख हड़ताल समाप्त की। ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हिंसा के आरोप 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए। बिहार में भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन हुए और पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठे। याचिकाओं में दिल्ली और बिहार की घटनाओं का उल्लेख करते हुए देशभर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। अगले सप्ताह फिर होगी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल प्रदर्शनकारियों को अंतरिम राहत देते हुए राज्यों और केंद्र से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी, जब अदालत उच्चस्तरीय जांच समिति और भविष्य के लिए व्यापक विरोध-प्रदर्शन दिशानिर्देशों पर आगे विचार कर सकती है।



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