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नई दिल्ली। नागरिक को बहुत कुछ नहीं चाहिए। थाली में सुरक्षित खाना, सड़क पर सुरक्षित चलना, घर के आसपास पानी की निकासी, बीमारी में समय पर जांच और संकट में इलाज लेकिन हमारी व्यवस्था ने शायद नागरिक की जरूरतों को कुछ ज्यादा ही साधारण समझ लिया है इसलिए जहां नाली चाहिए वहां योजना है, जहां जांच चाहिए वहां तारीख है, जहां मच्छर रोकना है वहां अपील है और जहां जाम हटाना है वहां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)! लगता है व्यवस्था ने तय कर लिया है कि पहले समस्या को बड़ा करो, फिर उसके लिए तकनीक का उद्घाटन करो। थाली में मंचूरियन, किस्मत में मातम बिहार के आरा में विषाक्त मंचूरियन खाने के बाद एक परिवार पर जो बीती, वह सिर्फ एक खाद्य हादसा नहीं, खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा बड़ा सवाल है। एक मासूम बच्ची की मौत के बाद उपचाररत दादी ने भी दम तोड़ दिया जबकि परिवार के अन्य सदस्य बीमार बताए गए हैं। बाजार में स्वाद की कीमत कुछ रुपये हो सकती है लेकिन गलत निगरानी की कीमत कभी-कभी जिंदगी होती है।खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था का असली परीक्षण सरकारी फाइल में नहीं, उसी ठेले और दुकान पर होना चाहिए जहां आम आदमी अपने बच्चों के लिए खाना खरीदता है। मेन्यू में मंचूरियन था, लेकिन निगरानी की सूची में शायद उसका नाम नहीं था। गोलगप्पा खाया, 29 लोग अस्पताल पहुंचे : स्वाद की ऐसी ‘सर्विस’ किसे चाहिए पश्चिम चंपारण जिले के बगहा में गोलगप्पे खाने के बाद 29 लोगों के बीमार पड़ने की घटना ने स्ट्रीट फूड की निगरानी पर फिर सवाल खड़ा किया है। गोलगप्पा हमारे शहरों की पहचान है। समस्या गोलगप्पे से नहीं, उसकी स्वच्छता और निगरानी की कमी से है। ठेले पर स्वाद की गारंटी देने वाला मिल जाता है, मगर पानी की गुणवत्ता की गारंटी कौन देगा? नागरिक के सामने विकल्प बड़ा विचित्र है, भूख लगे तो खाइए, डर लगे तो मत खाइए। व्यवस्था का तीसरा विकल्प अभी तक दिखाई नहीं देता। पनीर में स्टार्च, दूध में फॉर्मेलिन : मुनाफे की मलाई, सेहत की मलाईदार हत्या डेयरी उत्पादों की जांच में पनीर में स्टार्च और दूध में फॉर्मेलिन पाए जाने की रिपोर्ट मिलावट के पुराने संकट की याद दिलाती है। सबसे गंभीर सवाल तब पैदा होता है जब कार्रवाई के बावजूद मिलावट की शिकायतें या उल्लंघन दोबारा सामने आते हैं। यानी बाजार का संदेश साफ है, पकड़े गए तो जुर्माना देंगे, नहीं पकड़े गए तो मुनाफा कमाएंगे! अगर जांच केवल छापे तक और कार्रवाई केवल कागज तक सीमित रही, तो मिलावटखोर कानून से नहीं, सिर्फ अगली जांच की तारीख से डरेंगे। नल था, जल भी था, नाली छुट्टी पर थी पूर्वी चंपारण में सड़क पर बहा पानी, फिर विवाद में बहा खून। पूर्वी चंपारण के एक जिहुली गांव में सड़क पर जमा पानी को लेकर हुआ विवाद दो लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की त्रासदी तक पहुंच गया। आपसी विवाद के अपने कारण और जिम्मेदारियां हो सकती हैं। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि अगर पानी की निकासी की व्यवस्था पहले से होती तो क्या विवाद की जमीन इतनी आसानी से तैयार होती? विकास का गणित कभी-कभी बड़ा दिलचस्प होता है। नल लग गया, काम पूरा। पानी आ गया, योजना सफल। नाली नहीं बनी, वह शायद अगले वित्तीय वर्ष की कहानी थी लेकिन पानी बजट की तारीख नहीं देखता। वह रास्ता खोजता है और जब रास्ता नहीं मिलता तो सड़क पर जमा होता है, फिर कभी-कभी विवादों का रास्ता भी खोल कर खून के रूप में बह निकलता है। इस त्रासदी के बाद जांच, न्याय और राहत की प्रक्रिया अपना काम करे लेकिन विकास योजनाओं की गुणवत्ता और पूर्णता पर भी सवाल उठना चाहिए। मच्छर बनाम सरकार : सालाना मुकाबला डेंगू का मौसम आया नहीं कि मच्छर प्रशासन को उपस्थिति दर्ज करा देता है। पटना हो या मोतिहारी, डेंगू का संकट नया नहीं है। हर साल मच्छर लौटता है और उसके साथ लौटती हैं—फॉगिंग, जलजमाव, जागरूकता अभियान और सावधानी बरतने की अपीलें। मच्छर शायद इतना समझदार हो चुका है कि उसे सरकारी कैलेंडर की जानकारी रहती है। बारिश आई, पानी जमा। पानी जमा, मच्छर आया। मच्छर आया, डेंगू आया। डेंगू आया, बैठक हुई और अगले साल फिर होगी बैठक! मच्छर को नियंत्रित करना केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं। जलनिकासी, नगर निकाय, स्वच्छता और शहरी नियोजन, सबका साझा काम है। मच्छर छोटा जरूर है, लेकिन उसने हमारी व्यवस्था का आकार नापने का अच्छा तरीका खोज लिया है। बीमारी तेज, जांच की तारीख पर तय होगा इलाज मरीज पूछता है, ‘डॉक्टर साहब, जांच कब होगी?’ जवाब आता है, ‘तारीख देखकर आइए।’ पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान ( आईजीआईएमएस ) जैसे प्रमुख संस्थान में अल्ट्रासाउंड और एमआरआई जैसी बेसिक जांचों के लिए लंबी प्रतीक्षा मरीजों की परेशानी को सामने लाती है। मरीज के लिए तारीख महज तारीख नहीं होती। उस तारीख तक बीमारी भी साथ चलती है। कैलेंडर को बीमारी की गंभीरता समझ में नहीं आती। जिस मरीज को आज जांच चाहिए, उसके लिए कई सप्ताह बाद की तारीख प्रशासनिक व्यवस्था में सामान्य हो सकती है लेकिन बीमारी के लिए वह बहुत लंबा वक्त हो सकता है। अस्पताल की इमारत कितनी बड़ी है, यह महत्वपूर्ण है लेकिन उससे बड़ा सवाल है, मरीज का इंतजार कितना छोटा है? अस्पताल बड़ा-भरोसा छोटा इमारत ऊंची, उम्मीद बड़ी, फिर भी रुकते नहीं डॉक्टर। पटना चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल ( पीएमसीएच ) को दुनिया के सबसे बड़े अस्पतालों में शामिल करने की महत्वाकांक्षी योजना निश्चित रूप से बड़ी है लेकिन चिकित्सा संस्थान सिर्फ भवन, बेड और मंजिलों से महान नहीं बनता। वह बनता है, डॉक्टरों, नर्सों, तकनीशियनों, संसाधनों, सुरक्षा और मरीजों के भरोसे से। अगर युवा चिकित्सक बेहतर सुविधाओं और कार्य-परिस्थितियों की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं, तो यह संकेत है कि अस्पताल का भविष्य केवल नक्शे पर नहीं, कार्यस्थल पर भी बनता है। सरकार चाहे तो दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बना दे लेकिन डॉक्टर को वहां काम करने के लिए सिर्फ छत नहीं, भरोसा चाहिए। पटना में जाम: अब एआई हटाएगा सड़क वही, अतिक्रमण वही, ट्रैफिक वही, बस बुद्धिमत्ता कृत्रिम हो जाएगी। पटना की सड़कों पर जाम कोई खबर नहीं, रोज का अनुभव है। सुबह दफ्तर जाने वाला, स्कूल जाने वाला, मरीज लेकर निकलने वाला और एम्बुलेंस में जिंदगी बचाने वाला, सब सड़क पर एक ही सवाल पूछते हैं, “कब खुलेगा?” अब एआई जाम की पहचान करेगा, पूर्वानुमान लगाएगा और यातायात प्रबंधन में मदद करेगा। तकनीक का इस्तेमाल स्वागतयोग्य है लेकिन एक छोटा-सा सवाल है, क्या एआई फुटपाथ पर खड़ी गाड़ी भी हटाएगा? क्या वह अतिक्रमणकारी को समझाएगा? क्या वह गलत दिशा में चल रहे वाहन को रोकेगा? क्या वह सड़क पर नियम तोड़ने वाले को चालान थमाएगा? अगर जवाब ‘नहीं’ है तो एआई मददगार जरूर है, जादू की छड़ी नहीं। जाम को पहले सड़क पर पैदा होने से रोकिए, फिर कंप्यूटर पर उसकी भविष्यवाणी कीजिए। जब नाली की जरूरत हो, तब एआई का उद्घाटन क्यों असल सवाल तकनीक का विरोध नहीं, प्राथमिकताओं का है। एआई यातायात सुधार सकता है। डेटा अस्पतालों को बेहतर बना सकता है। डिजिटल निगरानी खाद्य सुरक्षा मजबूत कर सकती है। तकनीक आपदा प्रबंधन में मदद कर सकती है लेकिन एआई नाली नहीं बनाता। एआई मिलावट नहीं रोकता। एआई अस्पताल में मशीनों की संख्या नहीं बढ़ाता। एआई मच्छरों के प्रजनन स्थल साफ नहीं करता। एआई सड़क पर अनुशासन लागू नहीं करता। इन सबके लिए चाहिए, प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जवाबदेही, संसाधन और निरंतर निगरानी। तकनीक तब वरदान है जब वह व्यवस्था को मजबूत करे लेकिन अगर बुनियादी नाकामी को ढंकने के लिए तकनीक का इस्तेमाल होने लगे तो वह समाधान से ज्यादा सजावटी पर्दा बन जाती है। स्मार्ट सिटी या स्मार्ट व्यवस्था आज का सबसे बड़ा व्यंग्य शायद यही है कि नागरिक को बार-बार बताया जा रहा है कि भविष्य स्मार्ट होगा लेकिन नागरिक का वर्तमान पूछ रहा है, खाना सुरक्षित कब होगा? पानी निकलेगा कब? डेंगू रुकेगा कब? जांच होगी कब? जाम खुलेगा कब? इन सवालों का उत्तर किसी ऐप की स्क्रीन पर नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए क्योंकि नागरिक को यह प्रमाणपत्र नहीं चाहिए कि उसकी सरकार तकनीकी रूप से आधुनिक है। उसे बस इतना चाहिए कि उसकी थाली में खाना हो, खतरा नहीं। उसकी सड़क पर पानी हो तो निकासी भी हो। अस्पताल में बीमारी के साथ उम्मीद भी हो। और जाम में फंसी एम्बुलेंस के लिए रास्ता भी। वरना कल को शायद व्यवस्था यह भी बताएगी कि, “जाम की समस्या का एआई ने सफलतापूर्वक पता लगा लिया है।” और सड़क पर खड़ी एम्बुलेंस पूछती रह जाएगी, “साहब, पता तो चल गया… अब रास्ता कब मिलेगा?” ( संजय कौशिक -वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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