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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) मोतिहारी। “मन से बिकता है तन या जरूरतें छीन लेती हैं हया!” यह सिर्फ एक पंक्ति नहीं बल्कि उन चेहरों की अनकही कहानी है, जो अपनी इच्छा से नहीं, परिस्थितियों के धक्के से किसी अंधेरे दरवाजे तक पहुंचा दिए जाते हैं। हाल के दिनों में पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में देह-व्यापार से जुड़ी घटनाओं की खबरें जिस तरह सामने आई हैं, उन्होंने शहर की चमकती सड़कों और सामान्य दिखती जिंदगी के पीछे छुपे एक ऐसे अंधेरे की ओर ध्यान खींचा है, जिसे देखना समाज अक्सर नहीं चाहता। सवाल सिर्फ यह नहीं कि देह का यह कारोबार कहां चल रहा था। सवाल यह है कि जरूरतों को बाजार में बदलकर मुनाफा कौन कमा रहा था? बुधवार को बैंक रोड स्थित विद्या राज होटल के एक कमरे का दरवाजा खुला तो वहां चार नाबालिग लड़कियां मिलीं। उन बच्चियों को शायद यह भी मालूम नहीं था कि जिस कमरे तक उन्हें लाया गया है, उसके भीतर उनके लिए क्या इंतजार कर रहा है। पुलिस के अनुसार, उन्हें बहला-फुसलाकर देह व्यापार में धकेलने के उद्देश्य से वहां लाया गया था। छापेमारी के बाद चारों बच्चियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। होटल संचालक समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने सात मोबाइल फोन और होटल का एंट्री रजिस्टर भी जब्त किया। चार बच्चियां उस कमरे से बाहर आ गईं। लेकिन सवाल यह है कि उस कमरे तक उन्हें पहुंचाने वाली सोच और व्यवस्था कितनी दूर तक फैली है? एक कमरे से बड़ी है यह कहानी बुधवार की कार्रवाई को केवल एक होटल पर हुई छापेमारी मान लेना शायद इस पूरे मामले को बहुत छोटा कर देना होगा। यह कार्रवाई उस अदृश्य अर्थव्यवस्था की एक झलक भी है, जहां गरीबी, लालच, कथित मानव तस्करी, शोषण और महिलाओं-बच्चों की असुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। देह का कारोबार अक्सर वहां दिखाई देता है जहां दरवाजा बंद होता है। लेकिन उसकी जड़ें कई बार उस दरवाजे से बहुत पहले फैल चुकी होती हैं, किसी झूठे रोजगार के वादे में, किसी आर्थिक मजबूरी में, किसी भरोसे के दुरुपयोग में या किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में, जो किसी कमजोर इंसान को अवसर नहीं, बल्कि कमाई का साधन समझता है। एक थाना क्षेत्र, तीन घटनाएं और बढ़ती चिंता फरवरी से सितंबर के बीच छतौनी थाना क्षेत्र में देह व्यापार से जुड़े तीन मामले सामने आए। 11 फरवरी की देर शाम को छोटा बरियारपुर में चीनी मिल के पास एक झोपड़ीनुमा घर में पुलिस ने छापेमारी की। चार महिलाओं और दो पुरुषों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने आपत्तिजनक सामग्री, नकदी, स्कैनर मशीन और कई आधार कार्ड बरामद किए जाने की जानकारी दी थी। इसके करीब ढाई महीने बाद, 2 मई को बरियारपुर में रेलवे लाइन के किनारे एक झोपड़ी में कथित देह व्यापार के अड्डे का खुलासा हुआ। पुलिस के अनुसार, वहां ग्राहकों से डिजिटल माध्यम से भुगतान लिया जा रहा था। मोबाइल फोन में क्यूआर कोड के जरिए रकम मंगाने और भुगतान के बाद ग्राहकों को ठिकाने तक बुलाने की बात सामने आई। फिर सितंबर में कहानी ने एक और भयावह मोड़ लिया। इस बार वहां चार नाबालिग बच्चियां थीं। इन तीनों घटनाओं के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध है या नहीं, यह जांच का विषय है। अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक ही थाना क्षेत्र में बार-बार ऐसी घटनाओं का सामने आना निगरानी व्यवस्था और मानव तस्करी के संभावित नेटवर्क की गहन जांच की जरूरत जरूर बताता है। डिजिटल दुनिया में बदलता अपराध का चेहरा 2 मई की घटना में क्यूआर कोड के जरिए भुगतान की बात सामने आना यह भी बताता है कि अपराध का तरीका बदल रहा है। नकदी की जगह डिजिटल भुगतान आ सकता है। संपर्क के लिए मोबाइल फोन इस्तेमाल हो सकता है। और किसी बंद कमरे की कहानी का एक हिस्सा अब किसी डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज हो सकता है। यही डिजिटल निशान जांच, उस अदृश्य तंत्र की तस्वीर सामने ला सकते हैं, उस व्यक्ति तक ले जा सकते हैं जो मौके पर मौजूद नहीं था। झोपड़ी बदली, होटल आया अपराध जगह बदल सकता है। रेलवे लाइन के किनारे की झोपड़ी से होटल का कमरा कुछ ही दूरी पर हो सकता है लेकिन दोनों के बीच छुपी कहानी कहीं अधिक लंबी हो सकती है। कभी अस्थायी झोपड़ी। कभी किराये का कमरा। कभी होटल का बंद दरवाजा। ठिकाने बदलते रहते हैं। जरूरी यह देखना है कि क्या उन्हें चलाने वाला तंत्र भी हर बार बदलता है? बुधवार की कार्रवाई में जब्त सात मोबाइल फोन और होटल का एंट्री रजिस्टर इसलिए महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं। किसी अपराध की असली कहानी कई बार उस व्यक्ति के चेहरे पर नहीं होती जो मौके पर पकड़ा जाता है। वह उस मोबाइल की कॉल सूची, किसी डिजिटल भुगतान, किसी रजिस्टर की एक प्रविष्टि या किसी ऐसे संपर्क में छिपी हो सकती है, जो घटनास्थल पर कभी दिखाई ही नहीं दिया। सीमा के करीब शहर, आवाजाही और अदृश्य खतरे पूर्वी चंपारण की भौगोलिक स्थिति इस चुनौती को और जटिल बनाती है। नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगा यह जिला व्यापार, रोजगार और सामान्य आवाजाही के लिहाज से महत्वपूर्ण है। रक्सौल जैसे सीमावर्ती क्षेत्र से देश के अलग-अलग हिस्सों तक सड़क और रेल संपर्क जुड़े हैं। यह आवाजाही सामान्य जीवन की जरूरत है।लेकिन यही गतिशीलता मानव तस्करी जैसे अपराधों की जांच को भी चुनौतीपूर्ण बनाती है। ऐसे अपराध हमेशा शोर के साथ नहीं होते। कई बार वे किसी यात्रा, किसी नौकरी के वादे या किसी परिचित के भरोसे की आड़ में शुरू होते हैं। फिर एक शहर से दूसरा शहर, एक कमरे से दूसरा कमरा और अंततः ऐसी जगह, जहां पीड़ित के पास लौटने का रास्ता भी आसान नहीं रहता। इसीलिए ऐसे मामलों की जांच किसी एक थाना या किसी एक ठिकाने की सीमा में बंद नहीं रह सकती। जब पीड़ित बच्चियां हों, तो अपराध की तस्वीर बदल जाती है बुधवार की कार्रवाई का सबसे मार्मिक पक्ष यही है, चार बच्चियां। उनकी उम्र भले कम हो, जीवन का सफर लम्बा है और उससे उस कमरे में जो खतरा मौजूद था, वह उससे बहुत बड़ा था। बच्चियां किसी सौदे की पक्षकार नहीं होतीं। वे उस अपराध की सबसे कमजोर कड़ी होती हैं, जिसमें किसी दूसरे का लाभ उनके बचपन की कीमत पर हासिल किया जाता है। उनकी पहचान सार्वजनिक न करना महज कानूनी औपचारिकता नहीं, उनकी गरिमा और भविष्य की रक्षा है। पुलिस की कार्रवाई ने उन्हें कमरे से बाहर निकाला है। अब जरूरत है कि वे भय से भी बाहर निकलें। सुरक्षित वातावरण, परिवार से संपर्क, मनोवैज्ञानिक सहायता, कानूनी संरक्षण और पुनर्वास, ये सभी उस बचाव का हिस्सा हैं। क्योंकि किसी बच्ची को अपराध के ठिकाने से निकाल लेना एक राहत है, लेकिन उसके मन से उस अपराध की परछाई मिटाना एक लंबी जिम्मेदारी। कटघरे में अंतरात्मा ऐसे घृणित कार्य से दूरी रखने वाले शहर में "देह" को कारोबार का हिस्सा बताने वाली सुर्खियां विस्मयकारी हैं। यहां समाज के भीतर कुछ लोग कमजोरियों को पहचानकर उन्हें कमाई का जरिया बनाने लगे हैं। जहां किसी की मजबूरी किसी दूसरे का कारोबार बन जाए, वहां सिर्फ कानून नहीं, समाज की अंतरात्मा भी कटघरे में खड़ी होती है। “मन से बिकता है तन, या जरूरतें छीन लेती हैं हया?” इस सवाल का उत्तर भी सामाजिक जिम्मेवारी का हिस्सा है। किसी बच्ची को अंधेरे कमरे से बाहर निकाल देना बचाव है, उस अंधेरे को पैदा करने वाली सोच, जरूरत और लालच के गठजोड़ को तोड़ देना न्याय।



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