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पटना। बिहार सरकार ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए गया के डोभी में सीआईएसएफ़ केंद्र की स्थापना, वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे के लिए भूमि अधिग्रहण और जल संसाधन विभाग के निरीक्षण भवनों को आधुनिक गेस्ट हाउस के रूप में विकसित करने सहित कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है। मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के सूत्रों ने बुधवार को यहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में लिए गए निर्णयों की जानकारी देते हुए बताया कि गया जिले के डोभी में सीआईएसएफ़ केंद्र की स्थापना के लिए जमीन हस्तांतरण, वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे के लिए भूमि अधिग्रहण और जल संसाधन विभाग के पुराने निरीक्षण भवनों को आधुनिक गेस्ट हाउस में बदलने जैसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है। डोभी में बनेगा सीआईएसएफ़ केंद्र, 50 एकड़ जमीन केंद्र सरकार को मिलेगी मंत्रिमंडल ने गया जिले के डोभी अंचल के मुरियावल मौजा में सीआईएसएफ़ (आरक्षित वाहिनी) की स्थापना के लिए 50 एकड़ गैर-मजरुआ सरकारी भूमि भारत सरकार के गृह मंत्रालय को नि:शुल्क स्थायी हस्तांतरण करने की मंजूरी दी है। यह जमीन थाना संख्या-207, खाता संख्या-66 और खेसरा संख्या-2194 में स्थित है। इसके लिए बिहार वित्त नियमावली, 1950 के नियम-441 में आवश्यक शिथिलता भी दी गई है। सरकार का मानना है कि इससे सुरक्षा ढांचे को मजबूती मिलेगी और क्षेत्र में केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ेगी। वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे के लिए भूमि अधिग्रहण को मंजूरी केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए बिहार सरकार ने कैमूर जिले में भूमि अधिग्रहण की मंजूरी दे दी है। अंचल चांद और चैनपुर के विभिन्न मौजों में कुल 781.18 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। इसके लिए 230 करोड़ 64 लाख 97 हजार 9 रुपये की अनुमानित राशि स्वीकृत की गई है। सरकार का कहना है कि एक्सप्रेसवे बनने से कैमूर जिले में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और क्षेत्र की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिलेगी। पुराने निरीक्षण भवनों की बदलेगी तस्वीर, बनेंगे आधुनिक गेस्ट हाउस जल संसाधन विभाग के तहत विभिन्न शहरों, अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों, बांधों, बराजों और जलाशयों के पास बने निरीक्षण भवनों को आधुनिक सुविधाओं से लैस गेस्ट हाउस में बदलने का फैसला भी लिया गया है। विभाग के अनुसार समय के साथ इन परिसंपत्तियों में भौतिक क्षरण हुआ है और इनके रखरखाव पर हर साल लगभग 15 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। ऐसे में अब इन भवनों का आधुनिकीकरण सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत किया जाएगा। योजना के तहत राज्यभर में मौजूद 217 श्रेणीबद्ध निरीक्षण भवनों को चरणबद्ध तरीके से डीबीओम (डिजाइन-बिल्ड-ऑपरेट-मेंटेन) मॉडल पर विकसित किया जाएगा। चयनित निवेशकों को इन परिसंपत्तियों के संचालन के लिए 30 वर्ष की लीज दी जाएगी, जिसे आपसी सहमति से आगे भी बढ़ाया जा सकेगा। पर्यटन और राजस्व दोनों को होगा फायदा सरकार का मानना है कि बांधों, बराजों और जलाशयों के आसपास स्थित इन भवनों को इको-टूरिज्म और आधुनिक आवास सुविधाओं के रूप में विकसित करने से पर्यटकों को बेहतर ठहरने की सुविधा मिलेगी। साथ ही सरकारी परिसंपत्तियों का बेहतर उपयोग होगा, रखरखाव का बोझ कम होगा और अतिरिक्त राजस्व भी प्राप्त होगा।