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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू/मोतिहारी। नेपाल अभी भोटेकोशी की भयावह तबाही से उबर भी नहीं पाया है कि हिमालय की एक और घाटी में पानी ने तबाही की नई कहानी लिखने लगी है। उत्तरी गोरखा के दुर्गम चुमानुवरी ग्रामीण नगरपालिका के नामरुंग में रविवार को थेरंग खोला और बूढ़ीगंडकी नदी में अचानक आई बाढ़ ने घरों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को अपनी धारा में समेट लिया। कुछ ही समय में वह इलाका, जहां पहाड़ों के बीच जीवन और पर्यटन साथ-साथ चलते हैं, सड़कों से नहीं बल्कि टूटे हुए रास्तों और उफनती नदियों से घिर गया। चुमानुवरी ग्रामीण नगरपालिका-4 के नामरुंग में थेरंग खोला में भूस्खलन का मलबा लेकर आई बाढ़ ने चार स्थानीय परिवारों के घर पूरी तरह बहा दिए। प्रभावित घर नुर्वु ओङ्ग्याल (नुर्वु छिरिङ), उर्गेन छयोदेन, लाक्पा भुटी और दोर्जे ग्याल्जेन/मिंगमार लामा के बताए गए हैं। पहाड़ों के बीच बसे इन घरों के सामने अब उस जीवन के निशान तक मुश्किल से बचे हैं, जिसे नदी कुछ मिनटों में अपने साथ बहा ले गई। दो पुल टूटे, मनास्लू की राह बंद बाढ़ का सबसे बड़ा असर उस संपर्क तंत्र पर पड़ा है, जो नामरुंग और मनास्लू क्षेत्र को जोड़ता था। थेरंग नदी पर बना एक सस्पेंशन पुल बाढ़ में बह गया, जबकि नामरुंग के निचले हिस्से में बूढ़ीगंडकी नदी के उफान ने एक अन्य पुल को भी नष्ट कर दिया। स्थानीय निवासी लकपा दुंडुप के शब्दों में यह संकट अब केवल रास्ता टूटने का नहीं, चारों तरफ से रास्ता बंद हो जाने का है। उन्होंने कहा कि बाढ़ और भूस्खलन ने ऊपर और नीचे, दोनों दिशाओं में जाने वाले पुलों को बहा दिया है और अब किसी भी दिशा में आवागमन संभव नहीं है। मनास्लू ट्रेकिंग मार्ग और लार्क पास के आवागमन पर रोक जिला प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए मनास्लू ट्रेकिंग मार्ग और लार्क पास की ओर आवागमन अगली सूचना तक रोक दिया है। यात्रा की तैयारी कर रहे और पहले से यात्रा पर निकले लोगों को भी प्रशासन ने नई सूचना जारी होने तक आगे नहीं बढ़ने की सलाह दी है। पहाड़ की गुल हुई बत्ती, अंधेरे में संचार तबाही सिर्फ घरों और पुलों तक सीमित नहीं रही। बाढ़ ने स्थानीय समुदाय की ऊर्जा व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली दो माइक्रो-हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भी पूरी तरह नष्ट कर दिया। इनमें एक पुरानी 22 किलोवाट परियोजना और करीब सात करोड़ रुपये की लागत से हाल में तैयार 100 किलोवाट की नई परियोजना शामिल है। दोनों परियोजनाओं के नष्ट होने के बाद इलाके में बिजली आपूर्ति ठप हो गई है। इसके साथ ही मोबाइल और अन्य संचार सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। पहाड़ों में जहां पहले ही पहुंचना कठिन है, वहां संचार का टूटना आपदा को और गहरा बना देता है—मदद मांगने, सूचना पहुंचाने और लोगों का हाल जानने के रास्ते भी अंधेरे में चले जाते हैं। कुछ मिनटों ने बचा ली कई जिंदगियां इस पूरी तबाही के बीच सबसे बड़ी राहत यह है कि अब तक किसी मानवीय हताहत की सूचना नहीं है। जिला पुलिस कार्यालय गोरखा के अनुसार, बाढ़ आने के संकेत मिलते ही स्थानीय लोग समय रहते सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए। पहाड़ ने अपने घर खो दिए, रास्ते खो दिए और बिजली खो दी, लेकिन फिलहाल उसने अपने लोगों की जान नहीं ली। यह राहत उस भयावह संभावना को भी सामने लाती है कि यदि बाढ़ कुछ मिनट पहले या रात के अंधेरे में आती, तो इस घटना की कहानी कहीं अधिक दर्दनाक हो सकती थी। बूढ़ीगंडकी के नीचे बसे इलाकों के लिए चेतावनी थेरंग खोला आगे जाकर बूढ़ीगंडकी नदी में मिलती है। यही कारण है कि प्रशासन की चिंता अब नामरुंग से आगे नदी के निचले तटीय क्षेत्रों तक पहुंच गई है। धार्चे और आरुघाट समेत बूढ़ीगंडकी के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को उच्च सतर्कता बरतने की चेतावनी दी गई है। प्रशासन नदी के जलस्तर और संभावित बाढ़ के प्रभाव पर नजर रख रहा है। मनास्लू के रास्ते में फंसा पर्यटन का मौसम इस आपदा का असर स्थानीय आबादी के साथ नेपाल के पर्वतीय पर्यटन पर भी पड़ सकता है। मनास्लू क्षेत्र में शरद ऋतु पर्वतारोहण और ट्रेकिंग का मौसम शुरू होने वाला है। पर्यटन विभाग के अनुसार, इस शरद ऋतु में माउंट मनास्लू के लिए 29 टीमों के 348 पर्वतारोहियों को परमिट जारी किए जा चुके हैं। कुल मिलाकर सितंबर से नवंबर के मौसम के लिए 32 टीमों के 367 पर्वतारोहियों ने पर्वतारोहण परमिट प्राप्त किया है। ऐसे समय में दो महत्वपूर्ण पुलों का बह जाना केवल स्थानीय आवागमन का संकट नहीं है। यह उस पर्यटन गलियारे पर सीधा प्रहार है, जहां हर वर्ष दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से पर्वतारोही और पर्यटक हिमालय की ऊंचाइयों की ओर बढ़ते हैं। लार्क पास की ओर जाने वाले सैकड़ों पर्यटकों की आवाजाही भी प्रभावित होने की आशंका है। जिस रास्ते पर कुछ दिन पहले तक पर्वतारोहियों के कदम पड़ने थे, वहां अब बाढ़ के निशान और टूटे हुए पुल खड़े हैं। राहत के लिए अब पहाड़ को फिर से रास्ता बनाना होगा चुमानुवरी ग्रामीण नगरपालिका के अध्यक्ष निमा लामा के अनुसार प्रभावित परिवारों को तत्काल भोजन और कपड़ों के लिए 20 हजार नेपाली रुपये की आपातकालीन राहत उपलब्ध कराई जा रही है। पर्यटकों और स्थानीय लोगों के आवागमन के लिए वैकल्पिक एवं अस्थायी मार्ग तैयार करने का प्रयास भी शुरू किया गया है। लेकिन इस हिमालयी भूगोल में रास्ता बनाना सिर्फ मलबा हटाने का काम नहीं है। जहां नदी ने पुल बहा दिए हों, बिजलीघर निगल लिए हों और पहाड़ों ने भूस्खलन से रास्ते रोक दिए हों, वहां राहत दलों को पहले उस भूगोल तक पहुंचना होगा जहां अब सामान्य रास्ते मौजूद ही नहीं हैं। बदलती तस्वीर, बढ़ता जोखिम भोटेकोशी के बाद थेरंग और बूढ़ीगंडकी की यह बाढ़ नेपाल के हिमालयी इलाकों में बढ़ते आपदा जोखिम की एक और कठोर तस्वीर है। यहां नदियां सिर्फ पानी नहीं ढो रहीं, वे पहाड़ों से टूटकर आए मलबे, बदलते मौसम और कमजोर होती संपर्क व्यवस्था का पूरा बोझ अपने साथ ला रही हैं। और नामरुंग में इस रविवार की शाम, जब बिजली की रोशनी बुझ चुकी है और मोबाइल नेटवर्क खामोश है, हिमालय की उस घाटी में सबसे जरूरी चीज फिलहाल कोई मशीन या पुल नहीं, बल्कि एक सुरक्षित रास्ता है, वह रास्ता जो लोगों को एक-दूसरे तक फिर से पहुंचा सके।