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नई दिल्ली। जामिया मिलिया इस्लामिया का स्थापना दिवस केवल एक विश्वविद्यालय का जन्मदिन नहीं बल्कि उस ऐतिहासिक संकल्प को याद करने का अवसर है, जिसकी बुनियाद आजादी के जज्बे, आत्मसम्मान, त्याग और कौमी एकता पर रखी गई थी। यह उस दौर की कहानी है, जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने अंग्रेजी हुकूमत की शैक्षणिक व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय अपनी तालीमी राह बनाने का फैसला किया था। उनके लिए शिक्षा महज रोजगार हासिल करने का जरिया नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान, सामाजिक बदलाव और स्वतंत्र चिंतन की बुनियाद थी। 106 साल का सफर, संघर्षों से बनी पहचान आज जामिया मिलिया इस्लामिया देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शामिल है लेकिन इसकी मौजूदा पहचान को समझने के लिए हमें 1920 के उस दौर में लौटना होगा, जब खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन ने ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देने के साथ-साथ भारतीय समाज के सामने शिक्षा और आत्मनिर्भरता के नए सवाल भी खड़े किए थे। जामिया की स्थापना 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में हुई थी। इस वर्ष (29 अक्टूबर 2026 को) इसका 106वां स्थापना दिवस है। इसकी कहानी बताती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए नहीं बल्कि अपने समाज के भविष्य को अपने विचारों और मूल्यों के अनुरूप गढ़ने के लिए भी लड़ी गई थी। गुलामी की शिक्षा व्यवस्था को चुनौती जामिया की स्थापना के पीछे यह विचार था कि औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से मुक्त ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की जाए, जो भारतीय समाज की जरूरतों के अनुरूप हो। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार और वैकल्पिक संस्थाओं के निर्माण का आह्वान किया था। इस आह्वान ने उन राष्ट्रवादी शिक्षकों, विद्यार्थियों और नेताओं को प्रेरित किया, जो शिक्षा को राष्ट्रीय मुक्ति के व्यापक संघर्ष से जोड़कर देखते थे। जामिया इसी ऐतिहासिक चेतना का परिणाम था। साझा संकल्प से रखी गई जामिया की नींव इसके निर्माण में मौलाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद हसन, हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा सहित अनेक राष्ट्रवादी नेताओं तथा विद्वानों की भूमिका रही। इन लोगों की पृष्ठभूमि और विचारों में भिन्नताएं थीं लेकिन शिक्षा के माध्यम से समाज को आत्मनिर्भर बनाने और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने का संकल्प उन्हें एक सूत्र में जोड़ता था। जामिया का जन्म इसी साझी आकांक्षा से हुआ। मौलाना महमूद हसन: इल्म और संघर्ष की मिसाल मौलाना महमूद हसन का नाम जामिया की स्थापना की ऐतिहासिक स्मृति में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान केवल धार्मिक विद्वता तक सीमित नहीं था। वे औपनिवेशिक शासन के विरोध और राष्ट्रीय मुक्ति के प्रयासों से जुड़े रहे। जामिया की आधारशिला रखने की परंपरा में उनका स्थान इस बात का प्रतीक है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में धार्मिक विद्वानों ने भी अपनी भूमिका निभाई। उनके लिए इल्म और अमल, विचार और संघर्ष तथा शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी एक-दूसरे से अलग नहीं थे। आर्थिक संकट के बीच हौसले की जीत जामिया की यात्रा शुरुआत से ही आसान नहीं रही। संसाधनों की कमी, आर्थिक संकट और संस्थान को बनाए रखने की चुनौती बार-बार सामने आई। 22 नवंबर, 1920 को हकीम अजमल खान इसके पहले चांसलर चुने गए और मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने पहले वाइस चांसलर की जिम्मेदारी संभाली। हकीम अजमल खान ने संस्थान को आर्थिक सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा ने भी जामिया को बचाए रखने और उसके लिए सहयोग जुटाने में उल्लेखनीय प्रयास किए। अलीगढ़ से दिल्ली तक संघर्षों भरा सफर वर्ष 1925 में जामिया को अलीगढ़ से दिल्ली के करोलबाग स्थानांतरित किया गया। इसके बाद ओखला में नए परिसर के निर्माण की दिशा में कदम उठे। 1935 में वहां एक विद्यालय भवन की आधारशिला रखी गई और 1936 में जामिया के अधिकांश संस्थान नए परिसर में स्थानांतरित हो गए। यह बदलाव केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने का मामला नहीं था। इसके पीछे उस शैक्षणिक आंदोलन को जीवित रखने का संघर्ष था, जिसकी सबसे बड़ी पूंजी उसके संस्थापकों की प्रतिबद्धता, शिक्षकों की मेहनत और समर्थकों का त्याग थी। गांधी का साथ, स्वावलंबन का संदेश जामिया के शुरुआती इतिहास में महात्मा गांधी का सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने इस संस्थान को राष्ट्रीय शिक्षा के प्रयोग के रूप में देखा और कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद इसे जारी रखने की जरूरत पर बल दिया। जामिया का चरखा, स्वावलंबन और श्रम के सम्मान पर जोर देना इसी व्यापक विचार से जुड़ा था कि शिक्षा को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से अलग नहीं किया जा सकता। संस्थान के सामने संकट आए लेकिन उसके समर्थकों ने इसे केवल एक शैक्षणिक इमारत नहीं बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत माना। डॉ. जाकिर हुसैन ने संवारी जामिया की तकदीर डॉ. जाकिर हुसैन ने जामिया को नई शैक्षणिक पहचान देने में निर्णायक योगदान किया। वे 1926 में इसके वाइस चांसलर बने और लंबे समय तक संस्थान का नेतृत्व करते रहे। जब आर्थिक कठिनाइयों ने जामिया के अस्तित्व को चुनौती दी तब उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ संस्थान को संभालने का बीड़ा उठाया। उनके नेतृत्व में शिक्षकों के एक समूह ने लंबे समय तक सीमित वेतन पर काम करने और जामिया के प्रति समर्पित रहने का संकल्प लिया। यह केवल त्याग की मिसाल नहीं थी बल्कि इस विश्वास का प्रमाण भी था कि शिक्षा का उद्देश्य किसी संस्था की प्रतिष्ठा बढ़ाने से आगे समाज के भविष्य का निर्माण करना है। डिग्री नहीं, इंसान गढ़ने वाली तालीम डॉ. ज़ाकिर हुसैन की शैक्षणिक दृष्टि में शिक्षा, श्रम और सामाजिक जिम्मेदारी का गहरा संबंध था। वे ऐसी तालीम चाहते थे, जो विद्यार्थियों को केवल परीक्षा पास करने या नौकरी हासिल करने के लिए तैयार न करे बल्कि उनमें आत्मनिर्भरता, अनुशासन, विवेक और मानवीय संवेदना भी विकसित करे। उनके लिए शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के संपूर्ण विकास से था। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह जीवन से जुड़े, समाज की जरूरतों को समझे और मनुष्य को अपने दायित्वों का बोध कराए। मजहब से ऊपर साझा संस्कृति की पहचान जामिया की शैक्षणिक परिकल्पना में धार्मिक परंपरा और आधुनिक ज्ञान के बीच संवाद, भारतीय संस्कृति की बहुलता और राष्ट्रीय जीवन के प्रति प्रतिबद्धता शामिल रही। इसके संस्थापकों का प्रारंभिक उद्देश्य मुसलमानों के लिए शिक्षा के स्वतंत्र अवसर तैयार करना था लेकिन संस्थान की पहचान समय के साथ व्यापक राष्ट्रीय संदर्भों से जुड़ती गई। जामिया ने अपनी विरासत को किसी एक समुदाय की सीमा में कैद नहीं रहने दिया। वह भारतीय समाज की साझा संस्कृति और विविधता के बीच शिक्षा की भूमिका को रेखांकित करने वाला संस्थान बना। खिलाफत और असहयोग आंदोलन से गहरा नाता जामिया की कहानी को खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। खिलाफत आंदोलन में मौलाना मुहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली की भूमिका महत्वपूर्ण थी। महात्मा गांधी ने भी इस आंदोलन के साथ सहयोग करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध साझा संघर्ष को व्यापक आधार देने की कोशिश की। इस दौर में अनेक राष्ट्रवादी उलेमा ने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध किया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद और अन्य राष्ट्रवादी धाराओं से जुड़े विद्वानों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। कई लोगों ने जेल की सजाएं भुगतीं, सुविधाओं का त्याग किया और शिक्षा तथा सामाजिक जागरण के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। आजादी की लड़ाई में सबकी साझा कुर्बानी इतिहास के साथ न्याय करने का अर्थ किसी एक नेता या समुदाय के योगदान को कम करना नहीं बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष की व्यापकता को स्वीकार करना है। महात्मा गांधी का नेतृत्व भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में केंद्रीय महत्व रखता है लेकिन आजादी की लड़ाई अनेक विचारधाराओं, सामाजिक समूहों, धार्मिक विद्वानों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, किसानों, मजदूरों और समाज सुधारकों के सम्मिलित प्रयासों से आगे बढ़ी। जामिया इसी साझा संघर्ष की जीवंत निशानी है। इसकी स्थापना बताती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई सड़कों, जेलों और राजनीतिक सभाओं के साथ-साथ कक्षाओं, पुस्तकों, विचारों और शैक्षणिक संस्थानों में भी लड़ी गई थी। आज की शिक्षा के सामने इतिहास के सवाल आज जामिया मिलिया इस्लामिया का स्थापना दिवस मनाते हुए उसके संस्थापकों के सपनों और संघर्षों पर विचार करना जरूरी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियां बांटना या रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना नहीं है। शिक्षा नागरिकों में स्वतंत्र चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता विकसित करने का माध्यम भी है। जिस संस्थान की नींव औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देने वाले दौर में पड़ी हो, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह अन्याय, असमानता और संकीर्णता के प्रश्नों पर विवेकपूर्ण दृष्टि विकसित करे। कुर्बानियों की विरासत, आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी जामिया उन लोगों की मेहनत और त्याग की विरासत है, जिन्होंने देश के भविष्य के लिए अपना वर्तमान दांव पर लगाया। उनकी कुर्बानियों को याद करना केवल अतीत के प्रति सम्मान व्यक्त करना नहीं बल्कि वर्तमान के प्रति अपनी जिम्मेदारी पहचानना भी है। आज इस विरासत को जीवित रखने का अर्थ है ऐसी शिक्षा को मजबूत करना, जो समाज में संवाद बढ़ाए, विविधता का सम्मान करे और मनुष्य को बेहतर नागरिक बनने की प्रेरणा दे। जामिया की असली पहचान: आजादी, इंसानियत और तालीम जामिया की बुनियाद में सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं बल्कि आजादी का ख्वाब, आत्मसम्मान का जज्बा और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर तालीम देने का संकल्प शामिल है। डॉ. जाकिर हुसैन ने इस स्वप्न को शैक्षणिक दृष्टि, संस्थागत प्रतिबद्धता और श्रम के सम्मान से आगे बढ़ाया। आज जामिया की ऐतिहासिक विरासत हमें याद दिलाती है कि शिक्षा तभी रोशनी बनती है, जब वह व्यक्ति को स्वतंत्र बनाती है, समाज को जोड़ती है और राष्ट्रीय जीवन को अधिक न्यायपूर्ण तथा मानवीय बनाने में योगदान देती है। यही जामिया की असली पहचान है और यही वह संदेश है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारा ऐतिहासिक दायित्व है।



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