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मोतिहारी। जिस बिस्तर पर किसी मरीज को जिंदगी की उम्मीद मिलनी चाहिए, उसी पर हथकड़ी और पैरों में बंधन से जकड़े एक अचेत व्यक्ति की तस्वीर सामने आयी है। यह तस्वीर पूर्वी चंपारण में न्यायिक अभिरक्षा में 52 वर्षीय सुधीश राम की मौत के बाद कई ऐसे सवाल छोड़ गयी है, जिनका जवाब अब केवल उनकी मौत की जांच से नहीं बल्कि अस्पताल में उनके साथ हुए बर्ताव और इलाज की भी निष्पक्ष पड़ताल से मिल सकता है। कोटवा थाना क्षेत्र के बड़हरवा कला निवासी सुधीश की सोमवार को मोतिहारी सदर अस्पताल में उपचार के दौरान मौत हो गयी थी। उन्हें कोटवा थाना कांड संख्या 405/25 में उत्पाद अधिनियम के तहत 29 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद 30 सितंबर को न्यायिक अभिरक्षा में भेजे गये सुधीश उपचार के लिए अस्पताल पहुंचे लेकिन जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे उनके शरीर की जो तस्वीर सामने आयी, उसमें दोनों हाथ हथकड़ी से और दोनों पैर बंधन में दिखाई दे रहे हैं। तस्वीर बहुत कुछ कहती है लेकिन अपने आप में पूरी कहानी नहीं बताती। यह नहीं बताती कि हथकड़ी और पैरों में बंधन लगाने का आदेश किसने दिया, कितनी देर तक रखा गया, उस समय सुधीश की चिकित्सकीय स्थिति क्या थी और क्या उनके भागने अथवा किसी को नुकसान पहुंचाने का कोई वास्तविक और असाधारण खतरा था। यही वे सवाल हैं, जिनका उत्तर अब जांच से मिलना चाहिए। क्या सर्वोच्च न्यायालय की बंदिशों से मुक्त हैं अस्पताल न्यायिक अभिरक्षा में होने से किसी व्यक्ति का मानवीय अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। वरिष्ठ अधिवक्ता रामजय प्रताप सिंह इसे न्याय की सर्वोच्च व्यवस्था की अवमानना मानते हैं। इन्होंने " आईएनआई " को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रेमशंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन मामले में स्पष्ट किया गया था कि विचाराधीन कैदियों को नियमित रूप से हथकड़ी लगाना संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 की कसौटी पर टिकाऊ नहीं है। बाद में सिटीजन फ़ॉर डेमोक्रेसी बनाम राज्य असम मामले में अदालत ने कहा कि पुलिस और जेल प्रशासन अपने स्तर पर सामान्य रूप से हथकड़ी लगाने का आदेश नहीं दे सकते। यदि किसी बंदी के भागने या हिंसक होने का ठोस आधार हो तो न्यायिक अधिकारी के समक्ष कारण रखकर अनुमति लेने की व्यवस्था बतायी गयी है।" उन्होंने बताया, “इसी फैसले में अस्पताल में उपचार करा रहे बंदियों को हथकड़ी और रस्सी से बांधे जाने को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि अस्पताल में उपचाररत मरीज-बंदी की सुरक्षा के लिए अन्य उपाय जैसे अतिरिक्त सुरक्षा बल की तैनाती, अपनाये जा सकते हैं और अस्पताल में हथकड़ी तथा रस्सी से बांधना अमानवीय और कानून के विरुद्ध है। अदालत ने अपने निर्देशों के उल्लंघन को अवमानना सहित अन्य कानूनी परिणामों की चेतावनी भी दी थी।" ऐसे में सुधीश के मामले में सबसे मानवीय सवाल यही है कि क्या जिस व्यक्ति का इलाज अस्पताल के बिस्तर पर चल रहा था, उसके हाथ और पैर बांधना वास्तव में आवश्यक था? यदि सुरक्षा कारणों से ऐसा किया गया था तो उन कारणों का रिकॉर्ड कहां है? क्या किसी सक्षम अधिकारी ने इसका आदेश दिया था? क्या न्यायिक अधिकारी को इसकी जानकारी दी गयी थी? क्या सुरक्षा के दूसरे कम कठोर उपाय उपलब्ध नहीं थे? और क्या बंधन की आवश्यकता की समय-समय पर समीक्षा की गयी? इन सवालों के उत्तर इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अस्पताल में भर्ती व्यक्ति सामान्य बंदी की तरह नहीं, बल्कि एक उपचाराधीन मरीज भी होता है। कांपते शरीर को किस खतरे से बांधा गया था सुधीश के उपचार के दौरान उनकी चिकित्सकीय स्थिति भी जांच का महत्वपूर्ण विषय है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्हें गंभीर "सीवियर अल्कोहलिक ट्रेमर" जैसी स्थिति थी। ऐसी अवस्था में उनकी चेतना, शारीरिक क्षमता और चिकित्सकीय जोखिम का वास्तविक आकलन क्या था, यह मेडिकल रिकॉर्ड से स्पष्ट होना चाहिए। यदि उस समय वह अचेत या गंभीर रूप से अस्वस्थ थे तो उनके भागने की आशंका कितनी वास्तविक थी? क्या वह स्वयं अपने पैरों पर खड़े होने की स्थिति में थे? क्या उनसे किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाने की आशंका के संबंध में कोई चिकित्सकीय अथवा सुरक्षा रिपोर्ट थी? यह स्वीकार्य नहीं : डीआईजी सुधीश की सार्वजनिक हुई अमानवीय व्यवहार की तस्वीर से पैदा हुए सवालों का जवाब अनुमान से नहीं दिया जा सकता। मेडिकल रिकॉर्ड, चिकित्सकों की राय, सुरक्षा कर्मियों की ड्यूटी रिपोर्ट और उस समय की परिस्थितियां ही इसका उत्तर दे सकती हैं। चम्पारण रेंज के डीआईजी हरिकिशोर राय ने इसे अति गम्भीर और संवेदनशील मामला मानते हुए " आईएनआई " को बताया, "यह स्वीकार्य नहीं है। एसपी मोतिहारी को इस अमानवीय व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति से पूछताछ करने और उस पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।" हथकड़ी से बड़ा सवाल है, आदेश किसका था? जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी होगा कि सुधीश को हथकड़ी और पैरों में बंधन में रखने का कोई लिखित आदेश था या नहीं। यदि था तो उसमें क्या कारण दर्ज थे और उसकी अवधि क्या थी। यदि कोई विशेष न्यायिक अनुमति ली गयी थी तो उसका रिकॉर्ड क्या है और यदि कोई आदेश नहीं था तो सुरक्षा संबंधी निर्णय किस स्तर पर लिया गया था। किसी बंदी को असाधारण परिस्थिति में बांधे जाने और उसे अस्पताल के बिस्तर पर लगातार बंधन में रखने के बीच भी अंतर है इसलिए जांच को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि हथकड़ी लगायी गयी थी या नहीं बल्कि यह भी देखना चाहिए कि क्यों, कितनी देर, किस आदेश से और किसकी निगरानी में लगायी गयी थी। कैदी होने से कम नहीं हो जाती मानवीय गरिमा पूर्व पत्रकार और मानवाधिकार मामलों के जानकार रमाकांत पाण्डेय , इसे घोर अमानवीय मानते हैं। उन्होंने " आईएनआई " को बताया, "संयुक्त राष्ट्र के नेल्सन मंडेला नियम भी कैदियों के साथ मानवीय गरिमा के अनुरूप व्यवहार पर जोर देते हैं। नियम 47 में ऐसे बंधन उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक की बात कही गयी है, जो स्वभावतः अपमानजनक या पीड़ादायक हों। नियम 48 में अनुमत परिस्थितियों में भी कम कठोर उपायों को प्राथमिकता देने और बंधन को आवश्यक न्यूनतम स्तर तक सीमित रखने का प्रावधान है।" इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि सुधीश कैदी थे। सवाल यह भी है कि क्या कैदी होने के कारण उनके उपचार के दौरान उनकी मानवीय गरिमा कम हो गयी थी? कानून का उद्देश्य सजा देना है, इलाज के दौरान किसी बीमार व्यक्ति से उसकी मनुष्यता छीन लेना नहीं। आखिरी घड़ियों में उठता मानवीय गरिमा का सवाल सुधीश की मौत के कारणों की जांच पुलिस कर रही है लेकिन उनके उपचार के दौरान अपनायी गयी सुरक्षा व्यवस्था पर स्वतंत्र जांच की आवश्यकता का सवाल अलग है। अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड, ड्यूटी रजिस्टर, सीसीटीवी फुटेज, सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, हथकड़ी लगाने का आदेश, न्यायिक अनुमति से जुड़े दस्तावेज और चिकित्सकों की टिप्पणियां इस जांच के महत्वपूर्ण आधार हो सकते हैं। सुधीश अब जवाब देने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी जगह उनकी एक तस्वीर रह गयी है, अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा एक बीमार शरीर, हाथों में हथकड़ी और पैरों में बंधन। उस तस्वीर को देखकर भावनाएं सवाल पूछ सकती हैं, लेकिन न्याय को जवाब तथ्यों से चाहिए। क्या सुधीश को बांधना वास्तव में जरूरी था? किसने यह निर्णय लिया? क्या इसकी कानूनी और चिकित्सकीय जरूरत थी? और क्या उनकी आखिरी घड़ियों में सुरक्षा और मानवीय गरिमा के बीच उचित संतुलन रखा गया? इन सवालों का जवाब किसी आरोप से नहीं, निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है। क्योंकि सुधीश की मौत की सच्चाई केवल यह जानने में नहीं है कि उनका जीवन कैसे खत्म हुआ, बल्कि यह जानने में भी है कि उनके जीवन के अंतिम पलों में उनके साथ कैसा व्यवहार हुआ और क्या वह मानवीय था?



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